
देश के स्कूलों में पढ़ने वाले आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) और वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों को निशुल्क व अवाधित शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने केंद्र सरकार को एक व्यापक नीति प्रस्ताव पेश करने का आदेश दिया है। यह निर्देश उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें मांग की गई थी कि इन बच्चों को डिजिटल गैजेट्स — जैसे मोबाइल, टैबलेट या लैपटॉप — मुहैया कराए जाएँ, ताकि शिक्षा में उन्हें पीछे न रहना पड़े।
कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत की बेंच— जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (Suryakant) और न्यायाधीश जोयमाल्या बागची (Joymalya Bagchi) शामिल थे— ने कहा कि 6 से 16 साल के हर बच्चे को शिक्षा पाने का समान अवसर मिलना चाहिए, चाहे उसकी पृष्ठभूमि कैसी भी हो। इसके लिए, अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) के अंतर्गत यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या केंद्र के पास इस अधिकार को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए कोई नीति है; यदि नहीं है, तो अब तक कौन-सी व्यवस्था रही है। साथ ही, कोर्ट ने केंद्र से दो सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने को कहा है, जिसमें यह स्पष्ट हो कि आने वाले समय में डिजिटल गैजेट्स की व्यवस्था कैसे होगी।
क्यों यह मामला उठा?
यह संघर्ष उस याचिका से शुरू हुआ, जिसे पहली बार Justice for All नामक संगठन ने दाखिल किया था। अधिवक्ता खगेश झा (Khagesh Jha) ने कोर्ट को बताया कि केवल ऑनलाइन कक्षाओं तक ही सीमित नहीं — बल्कि ऑफलाइन समय में भी होमवर्क, स्टडी मटीरियल, असाइनमेंट आदि अक्सर ई-मेल या व्हाट्सएप के जरिए भेजे जाते हैं। ऐसे में जो बच्चे डिजिटल उपकरण नहीं रखते, वे स्वाभाविक रूप से पिछड़ जाते हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह भेदभाव नहीं, बल्कि सीधे तौर पर शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है — खासकर ऐसे वक्त में जब प्रदूषण या अन्य कारणों से स्कूल बंद रहे और ऑनलाइन कक्षा लाइफलाइन बन जाए।
सरकार की दलील और कोर्ट की प्रतिक्रिया
इस मांग के खिलाफ केंद्र सरकार — अदालत में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी (Aishwarya Bhati) की तरफ़ से — कह रही है कि संसाधन सीमित हैं, और इसलिए हर बच्चे को गैजेट्स देना संभव नहीं है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यहाँ “असीमित संसाधन या लक्ज़री” देने की मांग नहीं है, बल्कि सिर्फ इतना कि RTE (Right to Education) अधिनियम के तहत 6–16 साल के बच्चों का शिक्षा पाने का अधिकार बिना किसी वित्तीय बाधा के सुनिश्चित किया जाए।
आगे क्या होगा — भविष्य की राह
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को आदेश दिया है कि दो सप्ताह में नई नीति प्रस्तावित करे। यानी 15 दिसंबर 2025 तक सरकार को साफ करना होगा कि किस तरह से EWS व वंचित बच्चों तक डिजिटल उपकरण पहुंचेंगे।
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 3 फरवरी 2026 को तय की है। यदि सरकार नीति नहीं बनाती या उचित व्यवस्था नहीं करती तो अदालत मजबूरी में अगला आदेश दे सकती है, जो डिजिटल गैजेट्स की अनिवार्य व्यवस्था तय कर सकता है।
यह एक बहुत अहम फैसला है क्योंकि भारत में डिजिटल शिक्षा धीरे-धीरे मुख्यधारा बन चुकी है। चाहे कोरोना महामारी हो, प्रदूषण की वजह हो या अन्य वजह— ऑनलाइन पढ़ाई, होमवर्क, स्टडी मटीरियल आदि का डिजिटल माध्यम से पहुँचना अब सामान्य हो चुका है।
अगर ऐसे में सरकार EWS व वंचित बच्चों को गैजेट्स उपलब्ध करवाती है, तो शिक्षा का असली अधिकार— समान अवसर— साकार होगा। यह कदम सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।
दूसरी ओर, सरकार की ओर से संसाधन-सीमितता की बात की जा रही है। इसलिए यह देखना जरूरी है कि अगली सुनवाई तक सरकार क्या ठोस प्रस्ताव लेकर आती है— और क्या वह वास्तव में उन बच्चों की पढ़ाई के सपने पूरे कर पाएगी, जो आर्थिक मजबूरियों की वजह से पिछड़ जाते हैं।




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