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डिजिटल और सोशल मीडिया के विस्तार से सूचना से वंचित समाज तक सूचनाओं की पहुँच बढ़ी है: डॉ. हुसैन ताबिश

डिजिटल और सोशल मीडिया के विस्तार से सूचना से वंचित समाज तक सूचनाओं की पहुँच बढ़ी है: डॉ. हुसैन ताबिश

डिजिटल और सोशल मीडिया के विस्तार से सूचना से वंचित समाज तक सूचनाओं की पहुँच बढ़ी है: डॉ. हुसैन ताबिश

डॉ. हुसैन ताबिश एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में दो दशक से अधिक का अनुभव है। फिलवक़्त वह ज़ी सलाम डिजिटल के संपादक हैं। इससे पहले वह एचटी मीडिया, अमर उजाला, दूरदर्शन, फ़ॉरवर्ड प्रेस सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से विभिन्न भूमिकाओं में जुड़े रहे हैं। हुसैन ताबिश अल्पसंख्यक समुदायों, हाशिए पर खड़े समाज और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर संवेदनशील और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। मीडिया एथिक्स और डिजिटल पत्रकारिता पर व्यापक अनुभव रखने वाले हुसैन ताबिश आज भी स्वयं को पत्रकारिता का विद्यार्थी मानते हैं।

एक ऐसे दौर में जब ब्रेकिंग न्यूज़ को सेकंडों में मापा जा रहा है, टीआरपी न्यूज़रूम की प्राथमिकताएं तय कर रही है और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस कंटेंट निर्माण के तरीके बदल रहा है, पत्रकारिता एक अहम मोड़ पर खड़ी है। रफ्तार पहले से कहीं तेज़ है, लेकिन भरोसा पहले से कहीं ज़्यादा नाज़ुक। हुसैन ताबिश मानते हैं कि विश्वसनीयता आज भी मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी है और डिजिटल बदलाव के इस दौर में नैतिक पत्रकारिता ही न्यूज़रूम की मजबूत आधारशिला होनी चाहिए। भारतीय मीडिया के सामने खड़ी बदलती चुनौतियों पर एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए पूजा खन्ना ने डॉ. हुसैन ताबिश से विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश: 

प्रश्न 1: आपने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम किया है। आपके अनुभव में भारतीय पत्रकारिता का सबसे बड़ा बदलाव क्या रहा है?

– दुनिया के हर प्रोफेशन में समय के हिसाब से परिवर्तन होते रहे हैं, कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक. पत्रकारिता कोई अपवाद नहीं है, इसमें भी पिछले दो दशकों में जन सरोकार, कंटेंट और तकनीक के स्तर पर तीन बड़े बदलाव हुए हैं. भारतीय मीडिया से जन सरोकार गायब हुए हैं. अख़बारों में जनहित की ख़बरों की जगह अब उनके प्रसार संख्या और अधिकतम कार्पोरेट या सरकारी विज्ञापन ने ले लिया है. निजी टीवी चैनलों ने अपने शुरुआत से ही जनहित से ज्यादा TRP यानी बिकने और लाभ देने वाली खबरों को प्राथमिकता दी है. डिजिटल में इसका और विस्तार हुआ है. यहाँ प्रसार और TRP की जगह  व्यूज (UVs-PVs) ने ले ली. संपादकीय आज़ादी नाम मात्र की रह गई है. संपादकों के पास सिर्फ प्रबंधन की इच्छा को लागू करने भर का दायित्व शेष रह गया है. ख़बरों की परिभाषा भी बिल्कुल बदल गई है. खबर वो ही है, जो ज्यादा बिके, दिखे या चले; जिससे पैसा आये और मालिकान और हुक्मरान दोनों खुश रहें. पाठक इस सीन में कहीं नहीं हैं. ख़बरों से निष्पक्षता और सत्यनिष्ठता पूरी तरह गायब है. जनता का मीडिया के सभी प्लेटफार्म से भरोसा उठ चुका है.

देश की लगभग 75 करोड़ आबादी के हाथ में आज स्मार्ट फ़ोन है और इन्टरनेट तक उसकी पहुँच है. टीवी न्यूज़ चैनल्स ने अख़बार को चुनौती दी, डिजिटल ने टीवी को चुनौती दी और सोशल मीडिया ने अख़बार, टीवी और डिजिटल तीनों के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है. लोगों की मीडिया कंजम्पशन हैबिट भी बदल रही है.

हालांकि, इन सब में अच्छी बात ये है कि डिजिटल और सोशल मीडिया के विस्तार से सूचना से वंचित समाज तक सूचनाओं की पहुँच बढ़ी है. उनकी बातें सुनी जा रही है, उनकी बातें की जा रही है. मीडिया कारोबार से कार्पोरेट का एकाधिकार समाप्त हुआ है. लेकिन भरोसे का संकट यहाँ भी बरकरार है. यहाँ ख़बरों की गेटकीपिंग खत्म हो चुकी है. AI कंटेंट ने असली और नकली कंटेंट में भेद करने का संकट पैदा कर दिया है. डिजिटल और सोशल न्यूज़ पब्लिशर के सामने भी google और facebook जैसे प्लेटफार्म की मोनोपोली की चुनौतियाँ हैं.

प्रश्न 2: आप माइनोरिटी और हाशिए के समाज की पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। क्या डिजिटल मीडिया ने इन आवाज़ों को सशक्त किया है?

– इसका जवाब हमेशा ‘हाँ’ में होगा. अखबार और इलेक्ट्रोनिक मीडिया दोनों बड़े कॉर्पोरेट पूँजी का हिस्सा हैं. इनका संचालन खर्चीला है, प्रोडक्शन कास्ट महंगा है. यहाँ काम करने वाले लोगों में इस समाज का प्रतिनिधत्व नहीं है. अख़बार में स्पेस तो टीवी में टाइम स्लॉट की भी सीमाएं हैं. बड़े शहरों, बड़ी हस्तियों और बहुसंख्यक समाज की खबरें अक्सर अल्पसंख्यक और वंचित समाज की ख़बरों का स्पेस और टाइम हड़प लेते हैं, लेकिन डिजिटल और सोशल मीडिया में ऐसी बाध्यताएं नहीं है. इसकी पहुँच भी अखबार और टीवी से ज्यादा है, और न्यूज़ प्रोडक्शन का खर्चा भी न के बराबर है. सबसे बड़ी बात ये है कि डिजिटल या सोशल पर खबर पढने के लिए पैसा पाठकों से नहीं वरना गूगल और सोशल मीडिया प्लेटफार्म से आ रहा है.  इस वजह से अब बड़े मीडिया समूहों के भी डिजिटल और सोशल प्लेटफार्म पर अल्पसंख्यकों और वंचित समाज की खबरों को स्पेस मिल रहा है. पिछले 10 सालों में डिजिटल और सोशल प्लेटफार्म पर कई ऐसे मीडिया वेंचर्स शुरू किये गए हैं, जो पूर्ण रूप से अल्पसंख्यक और हाशिये पर पड़े वंचित समाज को समर्पित हैं, और उनकी आवाज़ को बुलंद कर रहे हैं. डिजिटल और सोशल मीडिया ने सूचना से वंचित समाज को नया हथियार सौंप दिया है.

प्रश्न 3: क्या आज की युवा पत्रकारिता ज़मीनी रिपोर्टिंग से दूर हो रही है?

– हो नहीं रही है, बल्कि पूरी तरह दूर हो चुकी है. जब पत्रकारिता से जनहित के मुद्दे, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठता और स्वतंत्रता जैसे ज़रूरी तत्व ही गायब हैं, तो ज़मीनी रिपोर्टिंग कैसे होगी, किसके लिए होगी, कौन करेगा ? रिपोर्टर की ग्राउंड रिपोर्ट भी सतही, पूर्वाग्रह से ग्रस्त और एकतरफा हो रही है. टीवी रिपोर्ट में एकपक्षीय बाइट और विजुअल लाना ही अब ग्राउंड रिपोर्ट का हिस्सा रह गया है. अख़बार के रिपोर्टर फ़ोन पर रिपोर्ट बना रहे हैं. किसी ने कुछ कह दिया वो अब खबर है. ख़बरों को वेरीफाई करने का चलन खत्म होता जा रहा है. बड़े समूह के डिजिटल प्लेटफार्म के लिए अलग से ग्राउंड रिपोर्टिंग का कोई मेकैनिजम नहीं है. छोटे संस्थानों के पास फंड और साधन नहीं है. यूटूबर के पास ट्रेनिंग नहीं है. कोई भी मीडिया संस्थान इस समय खबर नहीं बल्कि सूचनाएं परोस रहा है. खबर और ग्राउंड रिपोर्टिंग कराने वाले न संपादक बचे हैं, न संस्थान और न ही पत्रकार.

प्रश्न 4:आपने रिसर्च और चुनावी रिपोर्टिंग दोनों में काम किया है। दोनों के बीच संतुलन क्यों ज़रूरी है?

– रिसर्च खबरों की रीढ़ है, इसके बिना खबरें सीधी खड़ी नहीं हो पाती और ज्यादा दिनों तक उसका जीवन नहीं होता है. एक सूचना या क्लू को एक सम्पूर्ण खबर या रिपोर्ट में तब्दील होने के पहले कई चरणों से गुज़रना पड़ता है, जिसमें रिसर्च एक महत्वपूर्ण चरण है. रिसर्च बेस्ड ख़बरें पाठकों को किसी मुद्दे की गहन समझ और एक अंतर्दृष्टि देती हैं, जबकि सामान्य खबरें सिर्फ सतही जानकारी देती हैं.

चुनावी रिपोर्टिंग एक मौसमी और भागम-भाग रिपोर्टिंग है, जिसकी मियाद बेहद छोटी है. इसमें हम नेताओं, राजनीतिक दलों के चुनावी सभाओं, भाषणों, रैलियों, बयानों, पक्ष- विपक्ष के आरोप- प्रत्यारोपों, वादे- दावे, घोषणा- पत्रों, टिकट बंटवारे, उमीदवारों, जनता के मत, उनकी पसंद, उनकी परेशानियों, मांगों को रोजाना रिपोर्ट करते हैं. ओपिनियन पोल, एग्जिट पोल और चुनाव परिणाम का कवरेज भी इसका हिस्सा है. ऐसी चुनावी रिपोर्टों से बड़े और सत्तारूढ़ दलों को लाभ मिलता है. सनसनी पैदा होती है.चुनावी इलाके का माहौल तनावपूर्ण और अविश्वास से भर जाता है. इससे जनता और उमीदवारों के बीच भय और निराशा भी  पैदा होती है. कुछ लोग इसे एन्जॉय भी करते हैं. चुनावी रिपोर्टिंग एक टूरिज्म रिपोर्टिंग में तब्दील हो जाती है. लेकिन इसमें जनता के गंभीर सवाल और मसले हमेशा पीछे छूट जाते हैं.     

ऐसे में रिसर्च और investigative रिपोर्टिंग एक संतुलन बनाता है. रिसर्च बेस्ड खबरों में इस बात की पड़ताल की जाती है कि किसी नेता या पार्टी ने पिछले 5 साल में क्या किया है? उसने जनता के हित में कौन- कौन से काम किये हैं, और किसे नज़रंदाज़ किया है? सरकार की सफलताएं और विफलताएं क्या रही हैं? किन वादों पर खड़ी उतरी है, कहाँ उसने वादाखिलाफी की है. उसकी नीतियां कैसी रही है. किसी दल के चुनावी घोषणा पत्र में क्या है, अगर वो सत्ता में आती है और उसे लागू करती है, तो उसका क्या असर होगा? रिसर्च बेस्ड रिपोर्टिंग में इलाके में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, और अन्य आधारभूत संरचनाओं की पड़ताल की जाती है. उसपर जनमत का निर्माण होता है. इससे वोटर्स को असल मुद्दों की जानकारी होती है, वो अपने मताधिकार का इस्तेमाल सही पार्टी और उमीदवार के पक्ष में कर पाता है. रिसर्च बेस्ड रिपोर्टिंग नेता, पार्टी या सरकार को जवाबदेह बनाती हैं, उससे सवाल पूछती है, और एक वाचडॉग की भूमिका निभाती है, जबकि चुनावी रिपोटिंग नेता और राजनीतिक दलों की टूल बन जाती है. 

प्रश्न 5: रीजनल डिजिटल मीडिया की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?

– टीवी, अख़बार और डिजिटल का नेशनल डिजिटल मीडिया अपना स्वर्णकाल भोग चुका है. उनके दिन लद चुके हैं. सही मायनों में अब वो ढहने की कगार पर खड़े हैं. नई उम्मीदें अब सिर्फ रीजनल मीडिया से बची है. ये सभी माध्यमों पर सामान रूप से लागू होता है. वहां अभी भी बहुत कुछ एक्सप्लोर किया जाना बाकी है. अख़बार,टीवी और डिजिटल के पाठक/ दर्शक/ यूजर्स यहीं पर हैं. रेवेन्यू आने की संभावना यहीं से है. छोटे-छोटे रीजनल मीडिया प्लेयर आएँगे तो बड़े मीडिया समूहों की मोनोपोली भी समाप्त होगी, जिसकी वजह से प्रेस की आज़ादी,निष्पक्षता और सत्यनिष्ठता के साथ लोकतंत्र भी जीवित रहेगा.

प्रश्न 6:अनुवाद की पत्रकारिता को आप कैसे परिभाषित करते हैं?

– अनुवाद, दो संस्कृतियों और समाजों के बीच भाषाई आधार पर पैदा हुई ज्ञान और सूचनाओं के आदान-प्रदान और समायोजन की बाधाओं को दूर करता है. अनुवाद के बिना पत्रकारिता की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. इन्टरनेट ने अगर दुनिया की भौगोलिक दूरियों को पाटकर ग्लोबल विलेज बनाया है, तो अनुवाद ने उसे ग्लोबल फैमिली में तब्दील करने का काम किया है. भाषाई और सांस्कृतिक विविधता से भरी इस दुनिया को जानने और समझने की दृष्टि अनुवाद से ही हमें मिली है. भारत जैसे विशाल और बहुभाषी देश में तो Journalistic Translation न सिर्फ भाषाई पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि इंग्लिश जर्नलिज्म का भी इसके बिना काम नहीं चल पाता  है. हिंदी के अखबार, टीवी या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अगर चीन, जापान, इटली, जर्मनी, फ्रांस, पुर्तगाल, या गुजरात और पश्चिम बंगाल की खबर छप रही है, तो इसके पीछे अनुवाद की पत्रकारिता की ही भूमिका है. देश-दुनिया की सभी बड़ी न्यूज़ एजेंसियां अनुवाद पर टिकी हुई है. वो इंग्लिश और लोकल भाषाओँ में खबर लेती है, और समाचार संस्थाओं को उनके इच्छित भाषाओँ में समाचार उपलब्ध कराती है. अनुवाद ने जिस तरह साहित्य को समृद्ध किया है, उसी तरह ये पत्रकारिता को भी समृद्ध कर रहा है. रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की और इंग्लिश के गुजराती लेखक चेतन भगत के उपन्यास अगर हिंदी पाठकों के बीच लोकप्रिय हैं, तो इसका श्रेय अनुवाद की विद्या को जाता है. 

प्रश्न 7: आज मीडिया एथिक्स का सबसे बड़ा संकट क्या है?

– भारतीय मीडिया संस्थानों और उसके पत्रकारों के बीच मीडिया एथिक्स बोध कभी परिपक्व अवस्था में पहुंचा ही नहीं, अखबारों ने उसके हाथ काट दिए, टीवी ने टाँगे तोड़ दी और डिजिटल मीडिया क्रांति ने उसका गला घोंट दिया. साल 2017 में भोपाल में हिंदी पत्रकारों पर किए गए एक सर्वे में सामने आया कि लगभग 37 फीसदी पत्रकार ये भी नहीं जानते हैं कि पत्रकारिता की कोई एथिक्स भी होती है. जो जानते भी हैं, वो उसे लेकर स्पष्ट नहीं हैं. अधिकांश पत्रकारों की नज़र में रेप पीड़िता का नाम और फोटो न छापना और कोर्ट में विचारधीन मामलों पर टीका- टिपण्णी न करना, सिर्फ यही मीडिया एथिक्स है. अखबार, टीवी और डिजिटल सभी माध्यमों में एकतरफा, झूठी, आधी-अधूरी और पूर्वाग्रह से ग्रस्त खबरों का बोलबाला है. जर्नलिज्म से सत्यता, निष्पक्षता, और सम्पूर्णता जैसे बैसिक एलिमेंट गायब हैं. पत्रकार पक्षकार, प्रवक्ता, और राजनीतिक कार्यकर्त्ता की भूमिका में खड़ें हैं. पहले से फेक न्यूज़ के संकट से जूझ रहे भारतीय मीडिया में AI जनरेटेड कंटेंट ने और तबाही ला दी है. तकनीक का इस्तेमाल कर झूठ इतनी सफाई के साथ परोसा जा रहा है कि पाठक/ दर्शक और यूजर्स असली और नकली का भेद नहीं कर पा रहा है. पत्रकारिता से उसका भरोसा उठ चुका है. अगर वो किसी माध्यम से न्यूज़ कन्जूम कर रहा है, तो सूचना या समाचार के लिए नहीं बल्कि मनोरंजन और टाइम पास के लिए कर रहा है. एक खबर को कई स्रोतों से वेरीफाई करने के बाद ही वो उसपर भरोसा कर पा रहा है.

गूगल और वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेक न्यूज़ को रोकने और न्यूज़ पब्लिशर को ज़िम्मेदार बनाने की दिशा में कदम उठा रहा है, जिसका पॉजिटिव असर आने वाले दिनों में डिजिटल और सोशल मीडिया न्यूज़ पर पड़ सकता है, लेकिन अखबार और टीवी की खबरों की सुध कौन और कब लेगा, इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है.

प्रश्न 8:आप खुद को आज भी “पत्रकारिता का इंटर्न” कहते हैं। क्यों?

– अध्यापन, वकालत, इंजीनियरिंग, साइंस एवं तकनीक और पत्रकारिता जैसे बहुत से प्रोफेशन हैं, जहाँ आप कभी मास्टर होने का दावा नहीं कर सकते हैं. आपको हमेशा एक विद्यार्थी, ट्रेनी या इंटर्न की तरह सीखते रहना पड़ता है.  

मेरे पत्रकारिता करिअर की शुरुआत अखबार में एजुकेशन बीट के एक सिटी रिपोर्टर के तौर पर हुई थी. जब इसमें कुछ अनुभव हुआ तो मुझे स्पोर्ट की खबरों में लगा दिया गया, फिर क्राइम, जिला प्रशासन और पोलिटिकल बीट की खबरों की जिम्मेदारी सौंप दी गई. डेस्क पर भी अखबारों के अलग-अलग पन्नों पर काम करना पड़ा. अखबार का काम कुछ सीख गया तो टीवी में आकर लगा, मुझे कुछ नहीं आता है. जब लगा के टीवी का काम थोड़ा- बहुत समझ गया हूँ, तो डिजिटल में आकर फिर खुद को एक ट्रेनी पत्रकार जैसा महसूस किया. डिजिटल मीडिया सबसे परिवर्तनशील माध्यम है, यहाँ जो कुछ आज चल रहा है, अगले दो- तीन महीने बाद भी ऐसा सबकुछ रहेगा इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है. यहाँ संपादक से लेकर एक सब- एडिटर तक सभी इंटर्न हैं, उन्हें रोज़ सीखना पड़ता है. ऐसे में पत्रकारिता का मास्टर, एक्सपर्ट या फिर वरिष्ट पत्रकार होने का रिस्क भला कौन लेगा? यही वजह है कि मैं खुद को ‘पत्रकारिता का इंटर्न’ मानता हूँ!

एडइनबॉक्स टीम

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