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AI के दौर में इंजीनियरिंग शिक्षा को खुद को नए सिरे से गढ़ने की जरूरत है: प्रो. संदीप के. शुक्ला

AI के दौर में इंजीनियरिंग शिक्षा को खुद को नए सिरे से गढ़ने की जरूरत है: प्रो. संदीप के. शुक्ला

AI के दौर में इंजीनियरिंग शिक्षा को खुद को नए सिरे से गढ़ने की जरूरत है: प्रो. संदीप के. शुक्ला

IIIT-H के निदेशक प्रो. संदीप के. शुक्ला से बातचीत 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जिस तेजी से कक्षाओं, मूल्यांकन के तरीकों और करियर के रास्तों को बदल रहा है, उसे देखते हुए भारत भर के इंजीनियरिंग संस्थानों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे अपनी पढ़ाने और छात्रों के मूल्यांकन की पद्धतियों को तुरंत नया रूप दें। एक बातचीत में इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी हैदराबाद (IIIT-H) के निदेशक प्रो. संदीप के. शुक्ला बताते हैं कि किस तरह AI इंजीनियरिंग शिक्षा की पुरानी मान्यताओं को तोड़ रहा है, पारंपरिक मूल्यांकन मॉडल पर दबाव बढ़ा रहा है और क्यों संस्थानों को रिसर्च आधारित लर्निंग, व्यूहा लैब्स जैसे साइबर सुरक्षा प्रोजेक्ट्स और उद्योग के साथ गहरी साझेदारी के जरिए खुद को बदलना होगा, ताकि अस्थिर तकनीकी भविष्य में टिके रह सकें।

  1. आज AI इंजीनियरिंग शिक्षा और मूल्यांकन को कैसे नया रूप दे रहा है?

प्रो. संदीप के. शुक्ला: AI, खासकर जनरेटिव और एजेंटिक टूल्स ने छात्रों के सीखने के तरीके और उनके काम के आउटपुट को पूरी तरह बदल दिया है। अब कोड लिखना, निबंध तैयार करना या स्ट्रक्चर्ड उत्तर देना AI की मदद से काफी आसान हो गया है। ऐसे में शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे यह समझ सकें कि छात्र ने सिर्फ उत्तर तो नहीं लिख दिया, बल्कि वह कॉन्सेप्ट को समझकर उसे वास्तविक परिस्थितियों में लागू भी कर पा रहा है या नहीं।

यही वजह है कि भारत सहित पूरी दुनिया में पारंपरिक मूल्यांकन मॉडल पर भारी दबाव है और संस्थान अब न सिर्फ पाठ्यक्रम के डिजाइन पर, बल्कि मूल्यांकन के तरीकों पर भी दोबारा सोचने को मजबूर हैं।

  1. AI के दौर में भारतीय इंजीनियरिंग कॉलेजों को अपने पाठ्यक्रम और मूल्यांकन में क्या बदलाव करने चाहिए?

प्रो. शुक्ला: कुछ संस्थान ऐसे प्रयोग कर रहे हैं, जहां परीक्षा और असाइनमेंट में AI के इस्तेमाल की अनुमति दी जा रही है, साथ ही छात्रों से यह भी कहा जा रहा है कि वे अपने प्रॉम्प्ट्स जमा करें। सवालों का फोकस अब कॉन्सेप्ट की स्पष्ट समझ और रचनात्मक उपयोग पर रखा जा रहा है।

फिलहाल किसी एक समाधान पर नहीं पहुंचा गया है, लेकिन दिशा साफ है—रटने वाली पढ़ाई से आगे बढ़कर अनुभव आधारित, हैंड्स-ऑन और कॉन्सेप्ट ड्रिवन शिक्षा की ओर जाना। आने वाले समय में AI पर्सनलाइज्ड लर्निंग और एडैप्टिव असेसमेंट का मजबूत टूल बनेगा। जैसे-जैसे AI आगे बढ़ेगा, पाठ्यक्रमों को भी लगातार अपडेट करना होगा।

  1. व्यूहा लैब्स की शुरुआत के बाद IIIT-H राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा में कैसे योगदान दे रहा है?

प्रो. शुक्ला: भारत में साइबर क्राइम लोगों की चिंता का बड़ा कारण बन चुका है और हर साल स्थिति और गंभीर होती जा रही है। खासकर सोशल इंजीनियरिंग पर आधारित फ्रॉड बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं। व्यूहा लैब्स का मकसद साइबर अपराध के अलग-अलग पहलुओं पर रिसर्च करना है, ताकि अपराधियों की रणनीतियों और तरीकों को बेहतर ढंग से समझा जा सके।

ये अपराध इसलिए भी जटिल हैं क्योंकि अपराधी बड़े डेटा के समुद्र में अपने निशान छुपा लेते हैं, वहीं पीड़ितों के लिए यह समझाना मुश्किल होता है कि उनके साथ किस तरह का टारगेटेड और जटिल हमला हुआ।

साइबरक्राइम नेविगेटर एक ऐसा टूल है, जो पीड़ितों की जानकारी के आधार पर कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अपराध का नक्शा तैयार करने में मदद करता है। डेटा एनालिटिक्स के जरिए पुलिस को अपराध के ट्रेंड और हॉटस्पॉट्स की भी बेहतर समझ मिलती है।

इसके अलावा, लैब साइबरक्राइम हेल्पलाइन पर आने वाली कॉल्स को अलग-अलग भाषाओं में ट्रांसक्राइब करने की तकनीक पर भी काम कर रही है और डिजिटल सबूतों को टेक्स्ट में बदलकर उनका विश्लेषण आसान बना रही है। साथ ही, कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए ट्रेनिंग और स्वदेशी फॉरेंसिक टूल्स के विकास पर भी काम किया जा रहा है, ताकि साइबर अपराधियों से प्रभावी मुकाबला किया जा सके।

  1. IIIT-H रिसर्च, टीचिंग और छात्रों के परिणामों के बीच संतुलन कैसे बनाता है?

प्रो. शुक्ला: IIIT-H की संरचना पारंपरिक विभागों की बजाय रिसर्च लैब्स के इर्द-गिर्द की गई है। यहां फैकल्टी अपनी एक्टिव रिसर्च को सीधे पढ़ाई से जोड़ती है और छात्र दूसरे वर्ष से ही रिसर्च या ट्रांसलेशनल सेंटर्स से जुड़ जाते हैं।

इस शुरुआती एक्सपोजर की वजह से मजबूत रिसर्च आउटपुट, इनोवेशन, बौद्धिक संपदा (IP) का निर्माण और वैश्विक स्तर पर अकादमिक प्रतिस्पर्धा संभव हो पाती है।

  1. तेजी से बदलते तकनीकी दौर में छात्रों को किन कौशलों की जरूरत है?

प्रो. शुक्ला: तकनीकी कौशल एक सीमित समय तक ही प्रासंगिक रहते हैं। सबसे अहम स्किल है—लगातार सीखने, खुद को ढालने और बदलने की क्षमता। लचीलापन, संवाद कौशल, टीमवर्क और बदलाव के साथ बिना घबराए काम करने की क्षमता ही भविष्य में सफलता की असली कुंजी हैं।

  1. आज इंजीनियरिंग शिक्षा में उद्योग साझेदारी कितनी अहम है?

प्रो. शुक्ला: इंडस्ट्री के साथ जुड़ाव बेहद जरूरी है। इससे पाठ्यक्रम प्रासंगिक बनते हैं, रिसर्च वास्तविक समस्याओं पर केंद्रित होती है और इनोवेशन का व्यावहारिक असर दिखता है। मजबूत उद्योग साझेदारी संस्थानों को न सिर्फ आज की नौकरियों के लिए छात्रों को तैयार करने में मदद करती है, बल्कि उन्हें आने वाली चुनौतियों के लिए भी सक्षम बनाती है।

एडइनबॉक्स टीम

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