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Strategic Design Education: भविष्य की समस्याओं के लिए सोचने का नया तरीका

उच्च शिक्षा की पुरानी विसंगतियों को खत्म करेगा शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025: प्रो. अनिल सहस्त्रबुद्धे

उच्च शिक्षा की पुरानी विसंगतियों को खत्म करेगा शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025: प्रो. अनिल सहस्त्रबुद्धे

वर्ष 2026 अपने साथ भारतीय शिक्षा जगत में एक बड़ा बदलाव लेकर आया है। लंबे समय से लागू पुरानी शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर नई शिक्षा नीति 2020 को पूरे देश में एकसमान ढंग से लागू करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने पिछले दिनों विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025 संसद में पेश किया है। यह विधेयक शिक्षा ढांचे को सरल, पारदर्शी और आधुनिक बनाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस बदलाव की जरूरत को लेकर केंद्र को समय-समय पर अवगत कराने वालों में नेशनल एजुकेशन टेक्नोलॉजी फोरम (NETF) के चेयरमैन और NAAC कार्यसमिति के अध्यक्ष प्रोफेसर अनिल डी. सहस्त्रबुद्धे भी शामिल रहे हैं। 

प्रो. सहस्त्रबुद्धे का शिक्षा जगत में लंबा अनुभव रहा है। कर्नाटक में जन्मे और पले-बढ़े प्रो. सहस्त्रबुद्धे ने 1980 में कर्नाटक विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्वर्ण पदक के साथ स्नातक किया। IISc बेंगलुरु से स्नातकोत्तर, पीएचडी और नौकरी करने के बाद वे कुछ समय निजी क्षेत्र में भी रहे, लेकिन जल्द ही लौटकर शिक्षा जगत से जुड़ गए। अरुणाचल प्रदेश के NERIST से लेकर IIT गुवाहाटी तक और उसके बाद पुणे इंजीनियरिंग कॉलेज के निदेशक और AICTE अध्यक्ष के रूप में उन्होंने देश की तकनीकी शिक्षा में अनेक काम किए। उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल चुके हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

प्रश्न 1: विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025 की जरूरत क्यों महसूस हुई?

– इस विधेयक की जरूरत इसलिए सामने आई क्योंकि भारत अब विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है, और इस यात्रा में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण आधार है। लंबे समय से चली आ रही मैकाले काल की पुरानी शिक्षा प्रणाली बदलते समय की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रही थी, इसलिए नई शिक्षा नीति 2020 तो लागू कर दी गई, लेकिन उसे पूरे देश में एकसमान और व्यावहारिक रूप में लागू करने के लिए एक मजबूत ढांचे की कमी रही। इसी कमी को दूर करने और शिक्षा व्यवस्था को सुचारू, सरल और भविष्य के अनुरूप बनाने के लिए विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक लाया गया है, जो अनुमति, मान्यता, निरीक्षण और मानक निर्धारण जैसे बुनियादी पहलुओं में फैली जटिलताओं को खत्म कर शिक्षा जगत को आसानी और पारदर्शिता की नई दिशा देता है।

प्रश्न 2: आप इस विधेयक की व्याख्या कैसे करेंगे?

– इस विधेयक को समझने का सबसे आसान तरीका यह है कि जैसे व्यापार को आसान बनाने के लिए ‘Ease of Doing Business’ की अवधारणा आई, ठीक उसी की तरह यह शिक्षा जगत के लिए ‘Ease of Doing Education’ का ढांचा तैयार करता है। पुराने ढांचे में अलग-अलग परिषदों के पास जाकर अनुमति और मान्यता लेना बेहद जटिल प्रक्रिया थी, जबकि नया विधेयक इन सभी प्रक्रियाओं को एक ही छतरी के नीचे लाकर शिक्षा देने और पाने दोनों की राह को सरल करता है और एकरूपता सुनिश्चित करता है।

प्रश्न 3: यह शिक्षा प्रणाली को कैसे आसान बनाएगा?

– पुरानी व्यवस्था में किसी भी कॉलेज या विश्वविद्यालय को अलग-अलग पाठ्यक्रमों के लिए UGC, AICTE, NCTE और COA जैसे कई संस्थानों से अलग-अलग अनुमति लेनी पड़ती थी, जिनके नियम-कानून और मानक एक-दूसरे से भिन्न थे। नया विधेयक इन तीनों प्रमुख परिषदों को विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) के अधीन समाहित कर देता है, जिससे सभी तरह के पाठ्यक्रमों की मान्यता, निरीक्षण और अनुमति एक ही संस्था द्वारा की जा सकेगी। इससे पूरी प्रक्रिया सरल होगी, समय और संसाधन बचेंगे और संस्थानों पर अनावश्यक बोझ कम होगा।

प्रश्न 4: UGC, AICTE और NCTE को एक करने से शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी?

– गुणवत्ता सुधार के लिए इस विधेयक में तीन नई परिषदों—विनियम परिषद, मान्यता परिषद और मानक परिषद—का गठन प्रस्तावित है, जिनके अलग-अलग कार्य होंगे। विनियम परिषद नियम और अनुपालन देखेगी, मान्यता परिषद गुणवत्ता जांच करेगी और मानक परिषद सभी विषयों के मानक एकसमान रूप से तय करेगी। यह ढांचा पूरे देश की उच्च शिक्षा में एकरूपता लाएगा और पुरानी विसंगतियों को खत्म करेगा। अलग-अलग संस्थाओं के अलग नियम होने की वजह से जो उलझनें पैदा होती थीं, अब वे दूर हो जाएंगी और गुणवत्ता में स्थिरता आएगी।

प्रश्न 5: मेडिकल और कानून की शिक्षा को इसमें शामिल क्यों नहीं किया गया?

– फिलहाल मेडिकल और कानून की शिक्षा को इस नए ढांचे में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि दोनों क्षेत्रों के अपने विशेष एवं जटिल मानक हैं। हालांकि भविष्य में आवश्यकता और सहमति के अनुसार इन पर भी विचार किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल उनके अपने नियामक ढांचे ही जारी रहेंगे।

प्रश्न 6: राज्य सरकारों और शिक्षण संस्थानों की इसमें क्या भूमिका होगी?

– नए विधेयक में पहली बार राज्य सरकारों और बड़े शिक्षण संस्थानों को परिषदों का हिस्सा बनाया गया है, जिससे राज्यों की भूमिका औपचारिक और जिम्मेदार बनती है। पहले राज्य सरकारें अपने क्षेत्र के कॉलेजों में होने वाली गड़बड़ियों पर सीधे तौर पर जवाबदेह नहीं थीं, लेकिन अब उन्हें शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता और संचालन में सक्रिय भूमिका निभानी होगी, जिससे स्थानीय स्तर पर सुधार तेजी से हो सकेंगे।

प्रश्न 7: NAAC दौरे बंद होने के बाद संस्थानों की निगरानी कैसे होगी?

– NAAC दौरे अब पूरी तरह समाप्त किए जा रहे हैं और उनकी जगह भरोसा आधारित निगरानी प्रणाली लाई जा रही है, जिसमें हर संस्थान को अपनी वास्तविक सुविधाओं, लैब, शिक्षक संख्या, छात्रों की संख्या, उपकरण, लाइब्रेरी और कक्षाओं की जानकारी स्वयं पोर्टल पर अपलोड करनी होगी। यह जानकारी सभी के लिए खुली होगी—विद्यार्थी, अभिभावक, कंपनियां या नियामक सभी इसे देख सकेंगे। गलत जानकारी देने पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द होने जैसी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान इस व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाता है।

प्रश्न 8: इस विधेयक से शिक्षा व्यवस्था में क्या बड़े बदलाव आएंगे?

– यह विधेयक अंग्रेजी काल की मैकाले प्रणाली को बदलते हुए बच्चों को एकसमान और कठोर ढांचे में बांधने वाली पुरानी सोच से मुक्ति देता है। शिक्षकों के प्रमोशन में शोधपत्र अनिवार्य नहीं रहेगा और उनकी कार्यशैली और नवाचार को महत्व मिलेगा। जब शिक्षक नई तकनीकों से पढ़ाएंगे और बच्चे विषय को बेहतर समझेंगे, तो मूल्यांकन इसी आधार पर होगा। इसका सीधा असर गांवों और छोटे कस्बों तक पहुंचेगा और ड्रॉपआउट दर में कमी आने की उम्मीद है।

प्रश्न 9: शिक्षा के स्तर में क्या सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं?

– नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद देश में स्टार्टअप्स की संख्या 440 से बढ़कर 1.75 लाख पार कर गई है, और भारत सिर्फ सॉफ्टवेयर कौशल ही नहीं बल्कि हार्डवेयर, चिप निर्माण, AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और डीप टेक क्षेत्रों में भी आगे बढ़ रहा है। एक सुव्यवस्थित और पारदर्शी शिक्षा ढांचा इन क्षेत्रों में और भी तेज़ प्रगति का आधार बनेगा।

प्रश्न 10: क्या इस विधेयक से शिक्षा प्रणाली पूरी तरह समस्यामुक्त हो जाएगी?

– पूरी तरह समस्यामुक्त होना संभव नहीं है, क्योंकि किसी भी व्यवस्था में 10–15 प्रतिशत चुनौतियाँ बनी रहती हैं। यह विधेयक भी सभी गड़बड़ियों को एक झटके में समाप्त नहीं कर सकता। लेकिन यह बदलाव एक सतत प्रक्रिया है, और जैसे-जैसे प्रणाली लागू होगी, समस्याएं सामने आते ही उन पर सुधार का काम भी चलता रहेगा।

प्रश्न 11: इसके प्रभाव दिखने में कितना समय लगेगा?

– शिक्षा सुधार त्वरित परिणाम नहीं देते, इसलिए इसके असर जमीन पर दिखने में लगभग पांच से दस साल का समय लग सकता है। लेकिन दिशा सही है और सुधार क्रमिक रूप से दिखाई देंगे।

एडइनबॉक्स टीम

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