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सीखने की कोई उम्र नहीं होती, और जीवन को संतुलन, विवेक व उद्देश्य के साथ जीना ही सच्चा प्रबंधन है: प्रो. श्याम सुंदर बाली

सीखने की कोई उम्र नहीं होती, और जीवन को संतुलन, विवेक व उद्देश्य के साथ जीना ही सच्चा प्रबंधन है: प्रो. श्याम सुंदर बाली

सीखने की कोई उम्र नहीं होती, और जीवन को संतुलन, विवेक व उद्देश्य के साथ जीना ही सच्चा प्रबंधन है: प्रो. श्याम सुंदर बाली

आज के दौर में जब शिक्षा, तकनीक और मानसिक स्वास्थ्य अक्सर अलग-अलग खांचों में देखे जाते हैं, ऐसे समय में प्रो. श्याम सुंदर बाली एक दुर्लभ व्यक्तित्व के रूप में सामने आते हैं, जो इन सभी क्षेत्रों को एक समग्र दृष्टि से जोड़ते हैं। एपीजे यूनिवर्सिटी, सोहना में मैनेजमेंट, कंप्यूटर एनालिटिक्स, साइकोलॉजी और महाभारत जैसे विषय पढ़ाने वाले प्रो. बाली केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि व्यवहारिक मनोविज्ञान, भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक उद्योग अनुभव का अनूठा संगम हैं।

एक ओर वे EMDR, CBT और स्पोर्ट्स साइकोलॉजी जैसे आधुनिक मनोवैज्ञानिक तरीकों में प्रशिक्षित काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट हैं, तो दूसरी ओर महाभारत और भगवद्गीता के गंभीर अध्येता, योग शिक्षक और हिंदू संस्कारों पर लिखने वाले विद्वान। कॉरपोरेट जगत में जापानी मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ से लेकर पावर ग्रिड इंजीनियरों के ट्रेनर तक का उनका सफर, आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

इस विशेष बातचीत में प्रो. श्याम सुंदर बाली से हमने शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, भारतीय दर्शन, तकनीक, नेतृत्व और युवा पीढ़ी के भविष्य को लेकर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश:

  1. आपने इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, साइकोलॉजी, अध्यात्म और कॉरपोरेट नेतृत्व—इन सभी क्षेत्रों में गहराई से काम किया है। आपके जीवन की यह बहुआयामी यात्रा कैसे आकार लेती गई?

– मेरा जन्म भारत के ऐसे समय में हुआ जब संसाधनों की कमी और अस्तित्व के लिए संघर्ष जीवन की सामान्य अवस्था थी। इस वातावरण ने मेरे भीतर गहरी जिज्ञासा, आत्मअनुशासन और निरंतर आगे बढ़ने की मनोवैज्ञानिक दृढ़ता विकसित की। मैंने जीवन को किसी पूर्वनिर्धारित योजना के रूप में नहीं जिया, बल्कि उसे एक स्वाभाविक रूप से विकसित होती यात्रा की तरह अपनाया। जो अवसर सामने आया, मैंने उसे पूरे मन से स्वीकार किया। इंजीनियरिंग से मैनेजमेंट, मनोविज्ञान से अध्यात्म और कॉरपोरेट नेतृत्व तक का विस्तार स्वाभाविक था सीखने की तीव्र इच्छा और हर क्षेत्र में उत्कृष्टता पाने की आकांक्षा ने नए आयाम जोड़े। एक अवसर ने दूसरे को जन्म दिया, और हर अवसर  आत्मचिंतन को और गहरा करता गया। अंततः, हर सेट्बैक ईश्वर की कृपा से मुझे एक कहीं अधिक बेहतर स्थान पर ले गया। मैं इसको केवल एक ईश्वरीय कृपा ही कहूँगा !

  1. एक जापानी मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ पद से अकादमिक दुनिया में आने का निर्णय आसान नहीं रहा होगा। इस बदलाव के पीछे आपकी सोच क्या थी?

– एक जापानी मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ पद से अकादमिक दुनिया में आना निश्चित रूप से आसान निर्णय नहीं था, लेकिन यह मेरे जीवन की स्वाभाविक अगली अवस्था थी। मेरा सफर नेतृत्व से पहले प्रशिक्षण से शुरू हुआ मैं एक ट्रेनर भी था और आज भी पावरग्रिड कॉर्पोरेशन में लाइव लाइन इंस्टॉलेशन के क्षेत्र में नंबर-1 फैकल्टी के रूप में सक्रिय हूँ। जीवन ने मुझे जो ज्ञान, अनुभव और दृष्टि दी, उसे समाज को लौटाने का समय है,  साथ ही, सीखने की प्रक्रिया मेरे लिए कभी रुकी नहीं। युवाओं के भीतर छिपी क्षमता को पहचानना, उनमें सोच की चिंगारी जगाना और उन्हें आत्मविश्वासी बनते देखना मुझे गहरी संतुष्टि देता है।

  1. आप एक प्रैक्टिसिंग काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट भी हैं। आज के भारतीय युवाओं में आप सबसे बड़ी मानसिक चुनौती क्या देखते हैं?

– यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। आज जब लोग एआई को एक बड़ी अवसर के रूप में देख रहे हैं, मैं इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक गंभीर मानसिक खतरे के रूप में भी देखता हूँ। सबसे बड़ी चुनौती है  स्वतंत्र बुद्धि का क्षय। अत्यधिक सूचना-भार (information overload) ने युवाओं की ध्यान-अवधि को बहुत कम कर दिया है। सोचने, विवेक करने और गहराई से समझने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो रही है। हर समय उपलब्ध जानकारी ने निर्णय-क्षमता को कमजोर किया है। इसके साथ ही ग्रीक दर्शन में वर्णित “हेडोनिया”means तात्कालिक सुख की प्रवृत्ति—युवाओं को उद्देश्य, धैर्य और आत्मअनुशासन से दूर ले जा रही है। यह प्रवृत्ति भविष्य की पीढ़ियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी है।

  1. EMDR, CBT जैसी आधुनिक थेरेपी और महाभारत-गीता जैसे ग्रंथ—क्या आपको इनमें कोई साझा सूत्र दिखाई देता है?

– निस्संदेह, आधुनिक थेरेपी और हमारे प्राचीन ग्रंथों के बीच एक गहरा साझा सूत्र दिखाई देता है। श्रीमद्भगवद्गीता अपने आप में इतिहास की सबसे लंबी और परिपूर्ण काउंसलिंग सत्र है, जहाँ भगवान कृष्ण ने अर्जुन को संकट, भ्रम और भय की अवस्था से स्पष्टता और कर्म की ओर मार्गदर्शन दिया। वास्तव में, गीता को संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (CBT) का सर्वोत्तम उदाहरण कहा जा सकता है, जहाँ विचारों को चुनौती देकर व्यवहार में परिवर्तन लाया गया। वहीं EMDR जैसी आधुनिक तकनीकें अभी पूरी तरह समझी जा रही हैं उनके समानांतर सूत्र प्राचीन भारतीय शास्त्रों में खोजे जा सकते हैं। दोनों का मूल उद्देश्य एक ही है—स्व-जागरूकता (Awareness) बढ़ाना, भावनाओं (Emotions), विचारों  (Cognitions) और व्यवहार (Behaviour) को समझना तथा व्यक्ति को स्वयं के लिए सर्वोत्तम करने में सक्षम बनाना।

  1. आप महाभारत पढ़ाते भी हैं। आज के कॉरपोरेट, राजनीति और पारिवारिक जीवन में महाभारत की कौन-सी सीख सबसे ज्यादा प्रासंगिक है?

– आपके प्रश्नों की परिपक्वता और व्यापक दृष्टि मुझे वास्तव में प्रभावित करती है। महाभारत की सबसे प्रासंगिक सीख चाहे वह कॉरपोरेट हो, राजनीति हो या पारिवारिक जीवन—संघर्ष को समझने और उसे सही ढंग से प्रबंधित करने की क्षमता है। महाभारत यह नहीं सिखाता कि संघर्ष से बचा जाए, बल्कि यह सिखाता है कि संघर्ष के बीच भी विवेक, मर्यादा और उत्तरदायित्व कैसे बनाए रखा जाए। इसके साथ ही यह ग्रंथ हमें ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा देता है जिससे हम संपूर्ण ब्रह्मांडीय पारिस्थितिकी को क्षति न पहुँचाएँ। मनुष्य, समाज और प्रकृति तीनों एक सहजीवी (symbiotic) संबंध में बंधे हैं, और इस संतुलन को बनाए रखना ही महाभारत की सबसे गहरी और आज भी प्रासंगिक शिक्षा है।

  1. आप हिंदू संस्कारों को सरल और आधुनिक बनाने की बात करते हैं। आज के युवा इन्हें क्यों समझ नहीं पाते और समाधान क्या है?

– आज के युवा हिंदू संस्कारों को इसलिए नहीं समझ पाते क्योंकि सदियों की गुलामी के दौरान तथाकथित आधुनिकीकरण के नाम पर हमारी प्राचीन बुद्धि को उनसे दूर कर दिया गया। इसका दायित्व केवल युवाओं का नहीं, बल्कि पिछली पीढ़ियों का भी है, जो इस ज्ञान को सरल, प्रासंगिक और जीवंत रूप में आगे नहीं पहुँचा सकीं। वास्तव में हिंदू संस्कार आधुनिक प्रबंधन सिद्धांतों—जैसे Management by Objectives का ही गहन और व्यावहारिक रूप हैं, जहाँ जीवन के उद्देश्य स्पष्ट होते हैं। जब हम इन संस्कारों को सरल भाषा में समझेंगे और उनमें निहित वैज्ञानिकता व गौरव को पुनः स्थापित करेंगे, तब युवा स्वाभाविक रूप से उनकी ओर आकर्षित होंगे।

  1. आप कंप्यूटर एनालिटिक्स भी पढ़ाते हैं। क्या आपको लगता है कि डेटा और एआई मानव व्यवहार को पूरी तरह समझ सकते हैं?

– मैं अत्यंत साधनहीन लेकिन शिक्षित परिवार से आया हूँ, इसलिए जीवन भर स्वयं को नवीनतम ज्ञान और प्रवृत्तियों से अपडेट रखना मेरी आवश्यकता रही। इसी कारण मैं भविष्य के प्रबंधकों को डेटा एनालिटिक्स पढ़ाता हूँ। मेरा स्पष्ट मानना है कि डेटा और एआई कभी भी मानव बुद्धि का स्थान नहीं ले सकते। वे केवल मस्तिष्क पर पड़े सूचना-भार को संभाल सकते हैं, पर वही सूचना-भार आगे चलकर सूचना-अधिकता (Information overload) बन जाता है। इससे मानव व्यवहार में सूक्ष्म लेकिन गहरा परिवर्तन आता है। मुझे आशंका है कि यह परिवर्तन मानव को अधिक संवेदनशील नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अधिक पशु-सदृश, प्रतिक्रियात्मक बना सकता है। यह भले कल्पना लगे, पर इसके लक्षण हम आज ही देखने लगे हैं।

  1. स्पोर्ट्स साइकोलॉजी में आपका अनुभव क्या कहता है—मानसिक मजबूती किसी खिलाड़ी या प्रोफेशनल की सफलता में कितनी निर्णायक होती है?

– मैं स्पोर्ट्स साइकोलॉजी में प्रमाणित हूँ और अपने अनुभव के आधार पर निस्संदेह कह सकता हूँ कि मानसिक मजबूती किसी भी खिलाड़ी की सफलता का सबसे निर्णायक तत्व होती है। शारीरिक क्षमता और तकनीकी कौशल आवश्यक हैं, लेकिन वे तभी फलते हैं जब मन स्थिर, केंद्रित और दबाव सहने में सक्षम हो। मानसिक रूप से मजबूत खिलाड़ी कठिन परिस्थितियों में भी आत्मविश्वास बनाए रखते हैं और असफलता को सीख में बदलते हैं। विज़ुअलाइज़ेशन (Visualization) जैसी तकनीकें तभी वास्तविक सफलता में बदलती हैं जब उन्हें मानसिक दृढ़ता का आधार मिलता है। परिपक्व मानसिक मजबूती के बिना प्रतिभा अधूरी रह जाती है और उसी मानसिक मजबूती के साथ साधारण क्षमता भी असाधारण उपलब्धि में परिवर्तित हो सकती है।

  1. भारत में लाइव-लाइन OPGW इंस्टॉलेशन के आप अग्रणी विशेषज्ञ माने जाते हैं। तकनीकी क्षेत्र में सुरक्षा और प्रशिक्षण को आप कितना अहम मानते हैं?

– भारत में लाइव-लाइन OPGW इंस्टॉलेशन के क्षेत्र में सुरक्षा और प्रशिक्षण मेरे लिए सदैव सर्वोच्च प्राथमिकता रहे हैं। यह अत्याधुनिक तकनीक सबसे पहले जापानी विशेषज्ञों द्वारा भारत में लाई गई थी, और मुझे उस मूल टीम का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जिसने इसे भारतीय परिस्थितियों में सफलतापूर्वक लागू किया। मुझे यह श्रेय भी प्राप्त है कि भारत में पहली बार भूमिगत ऑप्टिकल फाइबर तथा पहली बार लाइव-लाइन परिस्थितियों में ट्रांसमिशन टावरों पर ऑप्टिकल फाइबर स्थापित किया गया, जिससे टेलीकॉम क्रांति को गति मिली। लाइव-लाइन OPGW इंस्टॉलेशन विश्व की सबसे खतरनाक तकनीकों में से एक है, जिसे कई विकसित देशों में अनुमति नहीं है। फिर भी, अत्यंत कठोर सुरक्षा मानकों और गहन प्रशिक्षण के बल पर भारत में हजारों किलोमीटर OPGW लाइव-लाइन कंडीशन में स्थापित किया गया। आज मैं इस क्षेत्र में भारत का नंबर-वन ट्रेनर और कंसल्टेंट हूँ और नियमित रूप से पावरग्रिड के इंजीनियरों को प्रशिक्षण देता हूँ जिस पर मुझे गहरा गर्व है।

  1. आज की भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आपको सबसे बड़ा सुधार किस स्तर पर जरूरी लगता है—कंटेंट, टीचर या माइंडसेट?

– मेरे विचार से आज की भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ा और सबसे आवश्यक सुधार शिक्षक के स्तर पर होना चाहिए। कंटेंट और माइंडसेट दोनों ही तभी प्रभावी होते हैं, जब उन्हें दिशा देने वाला एक श्रेष्ठ शिक्षक हो। मैं शिक्षक के स्थान पर गुरु शब्द का प्रयोग इसलिए करता हूँ, क्योंकि गुरु का अर्थ केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि वह होता है जो हमें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाए। गुरु विद्यार्थियों के मन में प्रश्न करने की क्षमता, आत्मविश्वास और नैतिकता का विकास करता है। एक महान गुरु विषय को केवल समझाता नहीं, बल्कि उसे जीवन से जोड़ता है और सोचने की नई दृष्टि देता है। युवाओं के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचान कर उसे निखारना गुरु का कार्य है। इसलिए सशक्त शिक्षा व्यवस्था की नींव एक जागरूक, संवेदनशील और प्रेरणादायक गुरु पर ही टिकी होती है।

  1. क्या आप मानते हैं कि योग, ध्यान और आध्यात्मिक अभ्यास मानसिक रोगों की रोकथाम में सहायक हो सकते हैं?

– हाँ, मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि योग, ध्यान और आध्यात्मिक अभ्यास मानसिक रोगों की रोकथाम में अत्यंत सहायक हैं। एक प्रमाणित योग शिक्षक और मनोवैज्ञानिक होने के नाते, तथा बचपन से अपने पिता से योग सीखकर और बाद में विश्वविद्यालय से औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि योग, ध्यान और सजगता (awareness) मानसिक स्वास्थ्य के सबसे प्रभावी उपकरण हैं। ये अभ्यास मन, शरीर और भावनाओं में संतुलन स्थापित करते हैं, तनाव, चिंता और अवसाद को कम करते हैं तथा आत्म-नियंत्रण और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करते हैं। कई मामलों में ये आधुनिक औषधीय उपचारों से भी अधिक प्रभावी होकर मानसिक रोगों की रोकथाम में सहायक सिद्ध होते हैं।

  1. आज के छात्रों के लिए आपकी सबसे अहम सलाह क्या होगी—करियर, मानसिक संतुलन और जीवन के उद्देश्य को लेकर?

– आज के छात्रों के लिए मेरी सबसे अहम सलाह यह होगी कि वे जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने का प्रयास करें। जीवन का लक्ष्य केवल करियर या भौतिक सफलता नहीं, बल्कि अपने परिवेश, प्रकृति और पूरे ब्रह्मांड के साथ सामंजस्य में रहते हुए प्रसन्नता से जीना है। जब हम बच्चे जैसी जिज्ञासा, सरलता और सीखने की भावना के साथ जीवन को देखते हैं, तब मानसिक संतुलन स्वाभाविक रूप से विकसित होता है। यदि छात्र धर्म के सही अर्थ  कर्तव्य, नैतिकता और संतुलन—और ग्रीक अवधारणा ‘यूडैमोनिया’ (Eudaimonia) अर्थात सार्थक एवं सद्गुणमय जीवन को समझ लें, तो करियर, मानसिक शांति और जीवन की दिशा अपने आप सही मार्ग पर आ जाती है।

  1. आप सामाजिक कार्यों से भी जुड़े हैं। क्या आपको लगता है कि शिक्षित वर्ग समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूलता जा रहा है?

– मैं इस प्रश्न को थोड़ा अलग दृष्टिकोण से देखता हूँ। वास्तव में, आज का शिक्षित वर्ग समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के प्रति पहले से अधिक जागरूक हो रहा है, और यही शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य भी है। शिक्षा केवल रोजगार पाने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्वों को समझने और निभाने की क्षमता विकसित करने का माध्यम है। सामाजिक कार्यों से जुड़कर व्यक्ति समाज को कुछ लौटाता है और साथ-साथ आत्मसम्मान, संवेदनशीलता तथा मानवीय मूल्यों का विकास करता है। मेरे अपने अनुभव में, सामाजिक सेवा व्यक्ति को आंतरिक संतोष देती है और उसे उद्देश्यपूर्ण व आनंदमय जीवन जीने की प्रेरणा देती है।

  1. आने वाली पीढ़ी को आप किस तरह का भारत और किस तरह का इंसान बनते देखना चाहते हैं?

– मैं आने वाली पीढ़ी में ऐसा भारत देखना चाहता हूँ जो पुनः विश्वगुरु के रूप में आध्यात्मिकता, ज्ञान और मानवीय मूल्यों का उज्ज्वल उदाहरण बने। ऐसा भारत जहाँ लोग प्रकृति के साथ पूर्ण सामंजस्य में जीवन जिएँ, जिज्ञासु हों, सजग हों और आंतरिक आनंद से परिपूर्ण हों। साथ ही, यह पीढ़ी इतनी विवेकशील और सशक्त भी हो कि वह अपनी संस्कृति, स्वतंत्रता और अस्तित्व की रक्षा कर सके। इतिहास हमें सिखाता है कि केवल शांति पर्याप्त नहीं, सुरक्षा और सजगता भी आवश्यक है। मेरा स्वप्न ऐसा इंसान है जो करुणामय हो, संतुलित हो और आवश्यकता पड़ने पर निर्भीक होकर अपने मूल्यों की रक्षा कर सके।

  1. अगर आप अपने जीवन दर्शन को एक वाक्य में कहें, तो वह क्या होगा?

– यदि मैं एक वाक्य मैं अपने जीवन को कहूँ तो कहूँगा कि मेरे जीवन दर्शन का सार यह है कि “सीखने की कोई उम्र या सीमा नहीं होती और कठोर परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है।“

  1. आप मैनेजमेंट पढ़ाते हैं। आपके अनुसार आज के समय में मैनेजमेंट केवल डिग्री है या जीवन जीने की एक कला?

– मेरे अनुसार मैनेजमेंट शिक्षा हमें यह समझने में सहायता करती है कि हम अपने जीवन और कार्यों को किस प्रकार अधिक प्रभावी, संतुलित और उद्देश्यपूर्ण ढंग से संचालित कर सकते हैं। वास्तव में हर व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर एक मैनेजर होता है—चाहे वह समय प्रबंधन हो, संसाधनों का उपयोग हो, संबंधों का निर्वाह हो या निर्णय लेना। मैनेजमेंट की पढ़ाई व्यक्ति को इन सभी पहलुओं के प्रति सजग बनाती है और उसे बेहतर तरीके से करने की दिशा दिखाती है। मैनेजमेंट की डिग्री केवल एक प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि व्यक्ति ने सीखने का सचेत प्रयास किया है और अपने कार्यों को पेशेवर ढंग से उत्कृष्टता के साथ करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसीलिए आज के समय में मैनेजमेंट केवल एक डिग्री नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है।

  1. MBA क्लासरूम में पढ़ाए जाने वाले पश्चिमी मैनेजमेंट मॉडल और भारतीय दर्शन आधारित प्रबंधन में आप क्या मूल अंतर देखते हैं?

– MBA कक्षा में पढ़ाए जाने वाले पश्चिमी मैनेजमेंट मॉडल मुख्यतः एक व्यवस्थित, मापनीय और सिद्ध ढाँचे पर आधारित होते हैं, जहाँ प्रक्रियाओं, प्रणालियों, मशीनों और मानव संसाधनों के समन्वय से भौतिक उत्पादकता, दक्षता और उपभोग में उत्कृष्टता प्राप्त करना लक्ष्य होता है। इसके विपरीत, भारतीय दर्शन-आधारित प्रबंधन समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड को एक इकाई और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के साथ देखा जाता है। यह मॉडल केवल भौतिक उन्नति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मानसिक शांति, नैतिकता और आध्यात्मिक संतुलन को भी उतना ही महत्त्व देता है। जहाँ पश्चिमी मॉडल बाह्य संरचनाओं और परिणामों को समझने पर केंद्रित है, वहीं भारतीय दर्शन आंतरिक चेतना, कर्म, उद्देश्य और आत्म-विकास को प्रबंधन का आधार मानता है। दोनों दृष्टिकोणों का संतुलन ही आज के जटिल वैश्विक परिदृश्य में प्रभावी प्रबंधन का मार्ग प्रशस्त करता है।

  1. कॉरपोरेट सीईओ रहने का आपका अनुभव मैनेजमेंट पढ़ाने के तरीके को कैसे अलग बनाता है?

– कॉरपोरेट सीईओ के रूप में मेरा अनुभव मेरे मैनेजमेंट पढ़ाने के तरीके को व्यावहारिक और प्रभावी बनाता है। एक जापानी कंपनी के सीईओ रहते हुए मुझे विभिन्न विभागों में कार्य करने और एक बहुराष्ट्रीय संगठन का नेतृत्व करने का अवसर मिला। इस हैंड्स-ऑन अनुभव के कारण मैं छात्रों को मैनेजमेंट की प्रक्रियाएँ केवल सैद्धांतिक रूप में नहीं, बल्कि वास्तविक कार्यानुभव के दृष्टिकोण से समझा पाता हूँ। इससे कक्षा अधिक जीवंत, प्रासंगिक और सीखने योग्य बनती है। यही कारण है कि आज विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस की माँग बढ़ रही है। मुझे लगता है कि भविष्य का शैक्षणिक पारिस्थितिकी तंत्र ऐसे ही अनुभवी और व्यावहारिक शिक्षकों की आवश्यकता करेगा।

  1. आपके अनुसार आज के मैनेजमेंट छात्रों की सबसे बड़ी कमजोरी और सबसे बड़ी ताकत क्या है?

– मेरे अनुसार जो छात्र गंभीरता से सीखने की प्रक्रिया में लगा है, वह कभी कमजोर नहीं हो सकता। आज के मैनेजमेंट छात्रों की सबसे बड़ी कमजोरी इन्फॉर्मेशन ओवरलोड (Information overload) है, जो उन्हें यह भ्रम दे देता है कि वे सब कुछ जानते हैं। जब छात्र यह मानने लगता है कि उसे ज्ञान हो चुका है, वहीं से सीखने की प्रक्रिया रुक जाती है। इस स्थिति को आज के समय में एआई और तेज़ कर रहा है। वहीं, आज के मैनेजमेंट छात्रों की सबसे बड़ी ताकत वे आधुनिक उपकरण हैं, जिनकी सहायता से वे कुछ ही सेकंड में लाखों लोगों तक पहुँच बना सकते हैं। यदि विनम्रता और सीखने की जिज्ञासा बनी रहे, तो यही ताकत उन्हें असाधारण बना सकती है।

  1. क्या भारतीय मैनेजमेंट एजुकेशन अभी भी सिलेबस-केंद्रित है, जबकि इंडस्ट्री स्किल्स चाहती है? इस गैप को कैसे पाटा जा सकता है?

– यह सच है कि कुछ गिने-चुने प्रबंधन संस्थानों को छोड़कर भारत में अधिकांश मैनेजमेंट एजुकेशन संस्थान अभी भी सिलेबस-केंद्रित हैं, जबकि इंडस्ट्री को कुशल और व्यावहारिक प्रोफेशनल्स की आवश्यकता है। इस कारण शिक्षा और उद्योग के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। इस गैप को पाटने के लिए अकादमिक संस्थानों द्वारा संचालित इंटर्नशिप-विशिष्ट संस्थान एक प्रभावी समाधान हो सकते हैं, जिन्हें उद्योग का सक्रिय समर्थन प्राप्त हो। इसके साथ ही शैक्षणिक संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग से वैश्विक अनुभव और व्यावहारिक कौशल छात्रों तक पहुँचाए जा सकते हैं। इससे शिक्षा अधिक प्रासंगिक, कौशल-आधारित और उद्योगोन्मुख बन सकेगी।

  1. कॉरपोरेट दुनिया में तनाव और बर्नआउट तेजी से बढ़ रहा है। क्या मैनेजमेंट शिक्षा में साइकोलॉजी को अनिवार्य किया जाना चाहिए? 

– कॉरपोरेट दुनिया में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और निरंतर दबाव के कारण तनाव और बर्नआउट तेजी से बढ़े हैं। प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों में मनोविज्ञान और संचार पहले से ही पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं, परंतु बदलते समय में यह पर्याप्त नहीं है। आज मैनेजमेंट शिक्षा को एक नए परिवर्तन की आवश्यकता है, जहाँ मानव मनोविज्ञान को कहीं अधिक गहराई और व्यापक रूप में अनिवार्य किया जाए। एआई, ऑटोमेशन और आधुनिक तकनीकों के बढ़ते उपयोग के साथ ह्यूमन माइंड स्किलिंग पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। आज का मैनेजर केवल प्रक्रियाओं या टूल्स तक सीमित नहीं रह सकता; उसे मानव मन, भावनाओं, प्रेरणा और व्यवहार को समझना अनिवार्य है। अब समय आ गया है कि मैनेजमेंट शिक्षा में मनोविज्ञान को एक आवश्यक व्यावसायिक कौशल के रूप में पढ़ाया जाए, न कि केवल मानविकी के हिस्से के रूप में।

  1. क्या भविष्य का मैनेजर डेटा और एआई पर निर्भर होगा, या मानव विवेक की भूमिका हमेशा निर्णायक रहेगी?

– मेरे दृष्टिकोण से भविष्य का मैनेजर डेटा और एआई पर अत्यधिक निर्भर होता जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। किंतु इस बढ़ती निर्भरता के साथ एक गंभीर चुनौती भी सामने आ रही है—विवेक का क्षरण। एआई और डेटा सूचना तो देते हैं, पर विवेक, अनुभव से उपजा निर्णय और संदर्भ की गहराई को पूरी तरह नहीं समझ पाते। आज मानव प्रबंधक निर्णय लेने में एआई पर बढ़ती निर्भरता के कारण अपनी स्वविवेक क्षमता को धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। सूचना-अधिभार इस समस्या को और गहरा करता है। भविष्य में एआई और डेटा का प्रभाव और बढ़ेगा, जबकि मानवीय प्राकृतिक बुद्धिमत्ता के कमजोर पड़ने की आशंका है। अब यह चुनौती वैज्ञानिकों और डेटा विशेषज्ञों के सामने है कि वे ऐसे उपकरण विकसित करें जो अनुभव-आधारित विवेक और निर्णय क्षमता को समझ सकें या कम से कम उसका अनुकरण कर सकें। तब तक मानव विवेक की भूमिका निर्णायक बनी रहनी चाहिए, अन्यथा प्रबंधन केवल गणना बनकर रह जाएगा।

एडइनबॉक्स टीम

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