Edinbox Hindi
इलाज करने वाले डॉक्टर खुद बीमारियों की चपेट में, नई स्टडी में सामने आई स्वास्थ्य तंत्र की चिंताजनक तस्वीर

क्या भारत 2047 तक वैश्विक शिक्षा मानचित्र पर अपनी खोई जगह वापस पा सकेगा?

क्या भारत 2047 तक वैश्विक शिक्षा मानचित्र पर अपनी खोई जगह वापस पा सकेगा?

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है—हजारों कॉलेज, सैकड़ों विश्वविद्यालय और हर साल निकलने वाले लाखों छात्र। लेकिन यह विशाल संरचना एक बुनियादी सवाल का सामना कर रही है: इतने बड़े तंत्र के बावजूद भारत की कोई भी यूनिवर्सिटी दुनिया की शीर्ष सूची में क्यों नहीं पहुंच पाती?

यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि दो हजार साल पहले यही भूमि वैश्विक शिक्षा का केंद्र थी। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय न सिर्फ भारत की बल्कि पूरी दुनिया की बौद्धिक धरोहर थे। आज स्थिति बिल्कुल उलट है—विदेशों में पढ़ने जाने वाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है, जबकि भारत की यूनिवर्सिटीज वैश्विक रैंकिंग की दौड़ में पीछे छूटती जा रही हैं।

मूल समस्या हमारे विश्वविद्यालयों की गहराई में छिपी है: रिसर्च की कमी, फंडिंग की सीमाएं, अकादमिक स्वतंत्रता का अभाव और वैश्विक दृष्टि की कमी। यह सच है कि भारत रिसर्च पेपर बहुत प्रकाशित करता है, लेकिन उनका असर दुनिया के शीर्ष देशों के मुकाबले कमजोर है। इसका कारण है—कम बजट, कमजोर लैब, सीमित अवसर और फैकल्टी पर पढ़ाने का अत्यधिक दबाव। जब शोध के लिए समय और संसाधन ही न हों, तो गुणवत्ता कैसे बढ़े?

इसके अलावा, भारत का विश्वविद्यालय मॉडल अधूरा है। IIT जैसे संस्थान शानदार इंजीनियर तैयार करते हैं, लेकिन बहुविषयक शिक्षा—मेडिकल, लॉ, सोशल साइंस और पब्लिक पॉलिसी—के अभाव में वे वैश्विक मानकों के अनुरूप नहीं बन पाते। दुनिया के शीर्ष संस्थान विविध विषयों को एक साथ जोड़कर नवाचार का वातावरण तैयार करते हैं, जबकि भारत की प्रणाली अभी भी साइलो मॉडल में बंधी हुई है।

गवर्नेंस और स्वायत्तता एक और बड़ी बाधा है। बहुत से भारतीय विश्वविद्यालय प्रबंधन और नीतिगत दायरे में इतने उलझे रहते हैं कि वे तेजी से फैसले लेने में सक्षम नहीं होते। दूसरी ओर, दुनिया की अग्रणी यूनिवर्सिटीज स्वतंत्रता और लचीलेपन की वजह से वैश्विक प्रतिभाओं को आकर्षित करती हैं।

यह भी चिंताजनक है कि भारत में विदेशी फैकल्टी की उपस्थिति लगभग नगण्य है। वीजा नियम, सैलरी कैप और प्रशासनिक जटिलताएं वैश्विक टैलेंट को रोक देती हैं। ऐसे में भारतीय कैंपस अंतरराष्ट्रीय रंग से वंचित रह जाते हैं—और यह रैंकिंग में सीधा नुकसान पहुंचाता है।

बावजूद इसके, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। कुछ निजी विश्वविद्यालयों का उभरना—जैसे अशोका, ओपी जिंदल और अमृता—यह संकेत देता है कि बेहतर ढांचा मिले तो भारतीय संस्थान वैश्विक रफ्तार पकड़ सकते हैं। इन्हें मिली स्वायत्तता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की स्वतंत्रता ने इन्हें तेजी से आगे बढ़ने दिया है।

अब सवाल यह नहीं कि भारत पीछे क्यों है, बल्कि यह है कि भारत 2047 तक आगे कैसे बढ़ सकता है? NEP 2020 ने दिशा तो दिखाई है—बहुविषयक शिक्षा, रिसर्च पर जोर और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता की ओर कदम बढ़ाए गए हैं। लेकिन केवल नीतियां काफी नहीं होंगी। भारत को शोध में बड़ा निवेश, फैकल्टी विकास, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विश्वविद्यालयों के आधुनिक पुनर्गठन की ओर साहसिक कदम उठाने होंगे।

अगर भारत ने यह चुनौती स्वीकार की, तो 2047 में देश सिर्फ आर्थिक महाशक्ति नहीं, बल्कि बौद्धिक नेतृत्व की भूमिका भी निभा सकता है। लेकिन अगर लेटलतीफी जारी रही, तो दुनिया आगे निकल जाएगी और भारत वही सवाल दोहराता रहेगा—हमारी यूनिवर्सिटीज शीर्ष पर क्यों नहीं पहुंचतीं?

भारत के पास समय है, युवा प्रतिभा है और मौके भी हैं। अब जरुरत है एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और शोध-प्रधान शैक्षिक दृष्टि की—तभी भारत अपनी खोई वैश्विक शैक्षणिक विरासत को दोबारा हासिल कर सकेगा।

रईस अहमद 'लाली'

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed