
भारत में विश्वविद्यालयों का दायरा जिस तेज गति से फैल रहा है, उस रफ़्तार से स्थायी और अर्थपूर्ण नौकरियों के अवसर नहीं बढ़ पा रहे हैं। हर साल लाखों युवा डिग्री लेकर निकलते हैं, उम्मीदें भी बड़ी होती हैं, लेकिन रोजगार तक पहुंचने का रास्ता उतना आसान नहीं होता। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023–24 में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में बेरोज़गारी दर 10.2% रही। यह साफ संकेत है कि शिक्षा से रोजगार तक का सफर आज भी देश के बड़े युवा वर्ग के लिए अनिश्चित बना हुआ है। वैश्विक स्तर पर भारत के युवा रोजगार को लेकर किए गए आकलन भी इसी चुनौती और शिक्षा से रोजगार तक के बेहतर रास्ते की जरूरत को रेखांकित करते हैं। ऐसे समय में विश्वविद्यालयों की भूमिका सिर्फ पढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकती। उन्हें छात्रों को नौकरी ढूंढने के साथ-साथ नौकरी लायक भी बनाना होगा।
यहीं उद्यमिता (Entrepreneurship) की भूमिका सामने आती है। इसे अब कुछ चुनिंदा छात्रों का शौक या केवल बिज़नेस स्कूल तक सीमित विषय मानकर नहीं टाला जा सकता। उद्यमिता एक ऐसी व्यावहारिक क्षमता है, जिसे हर छात्र—चाहे वह किसी भी विषय का हो—सीख सकता है। असली लक्ष्य सिर्फ फाउंडर तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे ग्रेजुएट बनाना है जो समस्याओं को पहचानें, उनके समाधान विकसित करें, ग्राहकों के साथ परखें, लागत और कीमत समझें, टीम बनाएं और जो काम करे उसे आगे बढ़ाएं। आज की अर्थव्यवस्था में यही सबसे जरूरी कौशल है।
नीति साफ है, जरूरत है ज़मीन पर अमल की
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और शिक्षा मंत्रालय की नेशनल इनोवेशन एंड स्टार्टअप पॉलिसी (2019) दोनों ही उच्च शिक्षा संस्थानों को नवाचार और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने का स्पष्ट संदेश देती हैं। स्टार्टअप इनक्यूबेशन सेंटर, उद्योग से साझेदारी, बौद्धिक संपदा की व्यवस्था और स्टार्टअप सपोर्ट को एक सिस्टम के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया है।
लेकिन सिर्फ नीति बना देने से कैंपस संस्कृति नहीं बदलती। इसके लिए ऐसा ऑपरेटिंग मॉडल चाहिए, जिसमें नेतृत्व प्रयास करने की अनुमति दे, पढ़ाने का तरीका “बनाने” को महत्व दे और इंफ्रास्ट्रक्चर शुरुआती जोखिम को कम करे।
उद्यमिता एक विभाग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए
आज भी कई विश्वविद्यालय उद्यमिता को केवल मैनेजमेंट या बिज़नेस स्टडीज़ तक सीमित मानते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि लॉ, मीडिया, डिज़ाइन, कृषि, विज्ञान या मानविकी के छात्र खुद को इससे अलग समझते हैं। जबकि भारत में आने वाले समय की उद्यमिता सिर्फ टेक स्टार्टअप तक सीमित नहीं होगी। टिकाऊ व्यवसाय, कृषि आधारित समाधान, किफायती हेल्थकेयर, शिक्षा नवाचार, क्रिएटिव इंडस्ट्री और स्थानीय सेवाओं में बड़े अवसर हैं।
इसका सीधा समाधान है—हर छात्र के लिए उद्यमिता के रास्ते खोलना। इंटरडिसिप्लिनरी एंटरप्रेन्योरशिप माइनर, क्रेडिट-बेस्ड वेंचर प्रोजेक्ट और समस्या-समाधान स्टूडियो जैसे मॉडल इस दिशा में प्रभावी कदम हो सकते हैं। अंतिम वर्ष का वेंचर प्रोजेक्ट, अगर सही मार्गदर्शन और मूल्यांकन के साथ हो, तो वह पारंपरिक प्रोजेक्ट रिपोर्ट से कहीं ज्यादा उपयोगी साबित हो सकता है।
कक्षा से बाहर शुरू होती है सही सीख
उद्यमिता किताबों से नहीं सीखी जाती। यह अनिश्चितता, फील्ड एक्सपोजर और लगातार कोशिश से आती है। जब छात्र किसी शहर, जिले या समुदाय की वास्तविक समस्या पर काम करते हैं, तो सीखने का अनुभव बदल जाता है। कचरा प्रबंधन, ट्रांसपोर्ट, हेल्थ या शिक्षा जैसे क्षेत्रों में काम करते हुए वे समझते हैं कि तकनीक से ज्यादा जरूरी भरोसा, व्यवहार और संचालन है।
भारत जैसे देश के लिए “एंगेज्ड यूनिवर्सिटी” की अवधारणा खास मायने रखती है, जहां विश्वविद्यालय स्थानीय समुदाय और संस्थाओं के साथ मिलकर सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान विकसित करें। यह सामाजिक जिम्मेदारी के साथ-साथ भविष्य की उद्यमिता की मजबूत जमीन भी तैयार करता है।
इनक्यूबेटर सिर्फ कमरा नहीं, एक सिस्टम है
कई कैंपस इनक्यूबेशन सेंटर का उद्घाटन तो कर देते हैं, लेकिन बाद में वे खाली पड़े रहते हैं। वजह साफ है—इनक्यूबेशन फर्नीचर नहीं, एक पूरी प्रक्रिया है। इसमें प्री-इनक्यूबेशन, मेंटर नेटवर्क, कानूनी और IP सपोर्ट, प्रोटोटाइप सुविधा, सीड फंड, निवेशकों तक पहुंच और स्पष्ट संस्थागत नीतियां शामिल होती हैं।
IIT मद्रास, IIT बॉम्बे और IIM अहमदाबाद जैसे संस्थानों के उदाहरण बताते हैं कि जब इनक्यूबेशन को सिस्टम की तरह चलाया जाता है, तब ही बड़े नतीजे सामने आते हैं। सीख यह नहीं कि हर विश्वविद्यालय IIT या IIM बने, बल्कि यह कि हर विश्वविद्यालय एक भरोसेमंद उद्यमिता प्लेटफॉर्म बन सकता है।
IIC और AIM: पहले से मौजूद राष्ट्रीय ढांचा
हर संस्थान को सब कुछ शून्य से बनाने की जरूरत नहीं है। Institution’s Innovation Council (IIC) और Atal Innovation Mission (AIM) जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम पहले से मौजूद हैं। सही उपयोग होने पर ये कैंपस में नवाचार का मजबूत आधार बन सकते हैं।
नेतृत्व और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा का महत्व
अधिकांश छात्र इसलिए झिझकते हैं क्योंकि उद्यमिता उन्हें सामाजिक रूप से जोखिम भरी लगती है। यहां नेतृत्व का संदेश निर्णायक होता है। जब विश्वविद्यालय नेतृत्व असफलता को सीख मानता है और प्रयास को सम्मान देता है, तभी छात्र आगे आते हैं।
प्रेरणा नहीं, कौशल सिखाइए
केवल मोटिवेशनल टॉक्स से कंपनियां नहीं बनतीं। इसके लिए ग्राहक समझ, बाजार विश्लेषण, प्राइसिंग, बिक्री, कानूनी समझ और टीम लीडरशिप जैसे ठोस कौशल चाहिए। माइक्रो-क्रेडेंशियल और हाइब्रिड लर्निंग इस दिशा में प्रभावी हो सकते हैं।
मूल्यांकन बदलेगा तो व्यवहार बदलेगा
जब प्रोटोटाइप, डेमो-डे और पिच को परीक्षा की जगह दी जाती है, तो कक्षा स्टूडियो बन जाती है। भारत जैसे देश में यह बेहद जरूरी है, जहां “समय बर्बाद करने” का डर गहरा होता है।
सस्टेनेबिलिटी: भविष्य की उद्यमिता
ऊर्जा, पानी, कचरा, आजीविका और जलवायु से जुड़े क्षेत्र केवल नीति के मुद्दे नहीं, बल्कि बड़े व्यावसायिक अवसर हैं। जब कैंपस खुद living lab बनते हैं, तब टिकाऊ उद्यमिता व्यवहारिक बनती है।
विश्वविद्यालय बनें समाधान की फैक्ट्री
भारत को हर छात्र से फाउंडर बनने की उम्मीद नहीं है, लेकिन हर ग्रेजुएट का venture-capable होना जरूरी है। नीतियां मौजूद हैं, ढांचे मौजूद हैं। अब जरूरत है संस्कृति और संचालन में बदलाव की।
जब ऐसा होगा, तब विश्वविद्यालय नौकरी का इंतजार करने की जगह समाधान तैयार करने के केंद्र बन जाएंगे। युवा और महत्वाकांक्षी भारत के लिए यही अगला रास्ता है।
(लेखक एडइनबॉक्स के चीफ मेंटर हैं और कोलकाता स्थित टेक्नो इंडिया ग्रुप के साथ निदेशक के रूप में कार्यरत हैं, साथ ही समूह की कोलकाता आधारित यूनिवर्सिटी के प्रमुख सलाहकार भी हैं।)




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