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देश में कितनी हैं केंद्रीय यूनिवर्सिटी? कितने हैं दलित, आदिवासी और ओबीसी कुलपति?

देश में कितनी हैं केंद्रीय यूनिवर्सिटी? कितने हैं दलित, आदिवासी और ओबीसी कुलपति?

देश में कितनी हैं केंद्रीय यूनिवर्सिटी? कितने हैं दलित, आदिवासी और ओबीसी कुलपति?

यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में उठा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। स्वर्ण समाज से जुड़े संगठनों ने इन नियमों के खिलाफ कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन किए। इस मामले की सुनवाई 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में हुई, जहां अदालत ने यूजीसी के नए नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी। कोर्ट ने साफ कहा कि जब तक अगला आदेश नहीं आता, तब तक वर्ष 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे। साथ ही यूजीसी और केंद्र सरकार से इस पूरे मामले में जवाब भी मांगा गया है। अब इस अहम मुद्दे पर अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।

इसी बीच यह सवाल फिर चर्चा में है कि देश में केंद्रीय विश्वविद्यालयों की संख्या कितनी है और उनका ढांचा कैसा है। सरकारी आंकड़ों और उपलब्ध रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समय भारत में कुल 56 केंद्रीय विश्वविद्यालय संचालित हो रहे हैं। ये विश्वविद्यालय देश के लगभग हर हिस्से में फैले हुए हैं—उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक, पूर्वोत्तर से पश्चिमी राज्यों तक। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, असम, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, राजस्थान, पंजाब, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और सभी प्रमुख पूर्वोत्तर राज्यों में केंद्रीय विश्वविद्यालय मौजूद हैं।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों का संचालन मुख्य रूप से शिक्षा मंत्रालय के अधीन होता है, लेकिन कुछ विशेष संस्थान अन्य मंत्रालयों के तहत भी आते हैं। उदाहरण के तौर पर, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं, राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय खेल मंत्रालय से जुड़ा है, जबकि विमानन और समुद्री शिक्षा से संबंधित विश्वविद्यालय अपने-अपने मंत्रालयों द्वारा संचालित किए जाते हैं।

अगर केंद्रीय विश्वविद्यालय की परिभाषा को समझें, तो ये वे उच्च शिक्षण संस्थान होते हैं, जिनकी स्थापना संसद द्वारा बनाए गए कानून के जरिए होती है। इनका सीधा नियंत्रण केंद्र सरकार के पास रहता है। इनका बजट, प्रशासनिक ढांचा और नीतियां केंद्र सरकार तय करती है, जिससे देशभर में एक समान शैक्षणिक मानक बनाए रखने की कोशिश की जाती है।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी लंबे समय से उठता रहा है। वर्ष 2022-23 तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश की 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों के पद पर अनुसूचित जाति से केवल एक, अनुसूचित जनजाति से एक और अन्य पिछड़ा वर्ग से सात कुलपति नियुक्त थे। ये आंकड़े उच्च शिक्षा संस्थानों में विविधता और समावेशिता को लेकर जारी बहस की ओर इशारा करते हैं।

देश के प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों की बात करें तो इनमें आंध्र प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय आंध्र प्रदेश, राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय तिरुपति, राजीव गांधी विश्वविद्यालय अरुणाचल प्रदेश, असम विश्वविद्यालय, तेजपुर विश्वविद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय दक्षिण बिहार, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, नालंदा विश्वविद्यालय और डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय शामिल हैं। इसके अलावा दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भी इसी सूची का हिस्सा हैं।

अन्य प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात, गति शक्ति विश्वविद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू, केंद्रीय विश्वविद्यालय कश्मीर, केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड, केंद्रीय विश्वविद्यालय कर्नाटक, केंद्रीय विश्वविद्यालय केरल, सिंधु केंद्रीय विश्वविद्यालय लद्दाख और डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय शामिल हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, मणिपुर विश्वविद्यालय, मिजोरम विश्वविद्यालय, नागालैंड विश्वविद्यालय और उत्तर पूर्वी पहाड़ी विश्वविद्यालय महत्वपूर्ण संस्थान हैं।

इसके अलावा केंद्रीय विश्वविद्यालय ओडिशा, पांडिचेरी विश्वविद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब, केंद्रीय विश्वविद्यालय राजस्थान, सिक्किम विश्वविद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय तमिलनाडु, भारतीय समुद्री विश्वविद्यालय, अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय और त्रिपुरा विश्वविद्यालय भी केंद्रीय विश्वविद्यालयों की सूची में आते हैं। उत्तर भारत में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान भी केंद्र सरकार द्वारा संचालित किए जाते हैं।

यूजीसी के नियमों पर जारी कानूनी बहस के बीच केंद्रीय विश्वविद्यालयों की भूमिका एक बार फिर केंद्र में आ गई है। आने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का फैसला न सिर्फ नियमों की दिशा तय करेगा, बल्कि देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर भी दूरगामी असर डाल सकता है। फिलहाल, सभी की निगाहें 19 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

एडइनबॉक्स टीम

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