
सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका को ख़ारिज कर दिया है जिसमें कानून की डिग्री के लिए पांच वर्षीय स्नातक को स्कूल के बाद सीधे तीन साल के कानून स्नातक डिग्री पाठ्यक्रम में बदलने की मांग की गयी थी। शीर्ष अदालत ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और टिप्पणी की कि, “पांच वर्षीय एलएलबी (बैचलर ऑफ लॉ) पाठ्यक्रम “ठीक काम कर रहा है” और इसमें छेड़छाड़ करने की कोई जरूरत नहीं है।”
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ याचिकाकर्ता से सहमत नहीं हुई और यहां तक कि व्यंग्यात्मक टिप्पणी भी की कि, “आखिर तीन साल का पाठ्यक्रम क्यों है? छात्र हाई स्कूल के बाद ही (कानून की) प्रैक्टिस शुरू कर सकते हैं!… मेरे अनुसार, 5 साल भी बहुत कम है।”
पीठ ने जनहित याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए कहा, “हमें इस पेशे में आने वाले परिपक्व लोगों की जरूरत है। यह 5 साल का कोर्स बहुत फायदेमंद रहा है।”
याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील विकास सिंह का कहना था कि यूनाइटेड किंगडम में भी कानून का पाठ्यक्रम तीन साल का है और यहां मौजूदा पांच साल का एलएलबी पाठ्यक्रम “गरीबों, विशेषकर लड़कियों के लिए निराशाजनक” है।
सीजेआई ने उनकी दलीलों से असहमति जताई और कहा कि इस बार 70 प्रतिशत महिलाएं जिला न्यायपालिका में प्रवेश कर चुकी हैं और अब अधिक लड़कियां कानून अपना रही हैं।
वर्तमान में, छात्र 12वीं कक्षा के बाद पांच साल का एकीकृत कानून पाठ्यक्रम कर सकते हैं, जिसके लिए उन्हें प्रमुख राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालयों (एनएलयू) द्वारा अपनाए गए कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (सीएलएटी) को पास करना होगा। छात्र किसी भी विषय में स्नातक करने के बाद तीन साल का एलएलबी कोर्स भी कर सकते हैं।
जनहित याचिका वकील अश्वनी दुबे के माध्यम से दायर की गई थी। याचिका में दावा किया गया कि एकीकृत पाठ्यक्रम के लिए पांच साल की “लंबी अवधि” “मनमानी और तर्कहीन” थी क्योंकि यह विषय के लिए आनुपातिक नहीं थी और छात्रों पर अत्यधिक वित्तीय बोझ डालती थी।




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