
अमेरिका लंबे समय से भारतीय छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का सबसे लोकप्रिय गंतव्य रहा है। हर साल हजारों छात्र बेहतर शिक्षा, शोध के अवसर और वैश्विक करियर की उम्मीद लेकर वहां पढ़ने जाते हैं। लेकिन हाल में सामने आए एक अध्ययन ने संकेत दिया है कि अब यह रास्ता पहले जितना आसान नहीं रहा।
अमेरिकी मीडिया मंच The Chronicle of Higher Education द्वारा अमेरिकी विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के आधार पर किए गए विश्लेषण में बताया गया है कि पिछले वर्ष अमेरिका में पढ़ने आने वाले विदेशी छात्रों की संख्या में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट विशेषज्ञों की उम्मीद से कहीं अधिक बताई जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय छात्रों को मिलने वाले स्टूडेंट वीजा की संख्या भी काफी कम हुई है।
फॉल इनटेक से पहले वीजा में बड़ी कमी
अध्ययन में सामने आया कि मई से अगस्त 2025 के बीच अमेरिका ने लगभग 97 हजार कम F-1 Student Visa जारी किए। यही वह समय होता है जब फॉल सेमेस्टर में पढ़ाई शुरू करने वाले छात्र वीजा के लिए आवेदन करते हैं।
2024 के इसी समय की तुलना में यह संख्या करीब 36 प्रतिशत कम है। इससे पहले विश्वविद्यालयों के एक शुरुआती सर्वे में नए विदेशी छात्रों के दाखिले में लगभग 17 प्रतिशत गिरावट का अनुमान लगाया गया था। लेकिन अब सामने आए नए आंकड़े इस गिरावट को कहीं ज्यादा गंभीर दिखाते हैं।
भारतीय छात्रों को भी कम वीजा
अमेरिका में पढ़ने जाने वाले विदेशी छात्रों में भारतीय छात्र हमेशा बड़ी संख्या में रहे हैं। हाल के वर्षों में कई बार भारतीय छात्र वहां अंतरराष्ट्रीय छात्रों के सबसे बड़े समूह के रूप में सामने आए हैं।
इसके बावजूद ताजा आंकड़े बताते हैं कि फॉल इनटेक के दौरान अमेरिकी दूतावासों ने भारतीय छात्रों को करीब 22 हजार स्टूडेंट वीजा ही जारी किए। यह पिछले वर्षों की तुलना में 60 प्रतिशत से अधिक की गिरावट मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे यह संकेत मिलता है कि भारतीय छात्रों को भी अब वीजा प्रक्रिया में अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही कुछ छात्र अनिश्चित नीतियों के कारण अमेरिका के बजाय अन्य देशों को विकल्प के रूप में देखने लगे हैं।
वीजा कम होने की क्या वजह
विदेशी छात्रों को कम वीजा मिलने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल मई में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कुछ समय के लिए स्टूडेंट वीजा इंटरव्यू की प्रक्रिया को रोक दिया था। इसका असर वीजा जारी होने की संख्या पर पड़ा।
इसके अलावा हाल के वर्षों में अमेरिकी प्रशासन द्वारा अपनाई गई कुछ सख्त नीतियों को भी इसका कारण माना जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार पिछले साल हजारों छात्रों के वीजा रद्द किए गए थे। कुछ मामलों में मामूली कानूनी उल्लंघन, जैसे ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के कारण भी वीजा रद्द होने की घटनाएं सामने आईं।
नीतिगत बदलावों की चर्चा भी छात्रों को चिंतित कर रही है। जैसे छात्र वीजा की अवधि सीमित करने का प्रस्ताव और पढ़ाई पूरी होने के बाद काम करने के अवसरों पर संभावित प्रतिबंध। ऐसी आशंकाओं के कारण कई छात्र अब अमेरिका में पढ़ाई के फैसले पर दोबारा विचार कर रहे हैं।
विश्वविद्यालयों पर भी पड़ रहा असर
विदेशी छात्रों की संख्या में कमी का असर अमेरिकी विश्वविद्यालयों पर भी पड़ रहा है। अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्र केवल शैक्षणिक माहौल को ही समृद्ध नहीं करते, बल्कि आर्थिक रूप से भी बड़ा योगदान देते हैं।
NAFSA: Association of International Educators के अनुसार विदेशी छात्रों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगभग 43 अरब डॉलर का योगदान दिया है। यही वजह है कि कई विश्वविद्यालयों के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्र महत्वपूर्ण आय स्रोत भी होते हैं।
अब जब विदेशी छात्रों की संख्या घट रही है, तो कई कॉलेज आर्थिक दबाव महसूस कर रहे हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि अगर यह रुझान जारी रहा तो इसका असर शोध, कैंपस सुविधाओं और अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है।
आगे क्या हो सकता है
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अपनी आकर्षण क्षमता बनाए रखनी है, तो उसे छात्र-अनुकूल नीतियों पर फिर से ध्यान देना होगा। कई विश्वविद्यालय पहले ही सरकार से वीजा प्रक्रिया को आसान बनाने और अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए स्पष्ट नीतियां बनाने की मांग कर रहे हैं।
भारतीय छात्रों के लिए भी यह समय महत्वपूर्ण है। अमेरिका अब भी उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में अग्रणी है, लेकिन बदलती नीतियों और वीजा प्रक्रिया की अनिश्चितता के कारण छात्र अब विकल्पों पर भी नजर रख रहे हैं।




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