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छात्रों को आत्महत्या से बचाने की पहल,  अब राष्ट्रीय स्तर पर कराया जाएगा सर्वे 

हाल के वर्षों में चिकित्सा छात्रों के बीच बढ़ती आत्महत्या की घटनाएं और अवसाद एक कड़वी सच्चाई है और चिंता का विषय भी। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बीते महज पांच साल में ही देश में 122 छात्रों ने पढ़ाई के दौरान आत्महत्या कर ली। इसे देखते हुए ही राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) की रैगिंग विरोधी समिति द्वारा हाल ही में एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स का गठन किया गया था। मकसद था छात्रों को आत्महत्या और अवसाद से बचाना। इस कड़ी में अब देश में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर सर्वे भी कराया जाएगा। एनएमसी ने इसकी घोषणा की है।बताया है कि टास्क फोर्स ने देश के सभी मेडिकल कॉलेजों में छात्रों के साथ साथ प्रोफेसर का ऑनलाइन सर्वेक्षण करने का निर्णय लिया है।

एनएमसी के मुताबिक मेडिकल छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य चिंता का कारण है। इसके समाधान के लिए टास्क फोर्स ने एक गूगल फॉर्म तैयार किया है जिसके जरिए आगामी तीन मई तक छात्रों और सभी विभागों में कार्यरत प्रोफेसर से प्रतिक्रियाएं मांगी गई हैं। सर्वे में शामिल छात्रों और प्रोफेसर की पहचान को गोपनीय रखा जाएगा। इसे किसी भी सदस्य या कॉलेज प्रशासन के साथ साझा नहीं किया जाएगा। इसका उपयोग टास्क फोर्स अपनी रिपोर्ट में केवल विश्लेषण और सिफारिशों के उद्देश्य से करेगी।

दरअसल, टास्क फोर्स मेडिकल छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या पर मौजूदा जानकारियों और डेटा का अध्ययन करेगी, इन चुनौतियों में योगदान देने वाले कारकों का विश्लेषण करेगी और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार और आत्महत्या से बचाव के लिए साक्ष्य-आधारित रणनीतियों का प्रस्ताव करेगी। समिति उन कॉलेजों का भी दौरा करेगी जहां आत्महत्या की घटनाएं सामने आई हैं। इस टास्क फोर्स में 15 लोग शामिल है। अध्यक्ष के रूप में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो-साइंसेज (NIMHANS) के मनोचिकित्सा विभाग में प्रोफेसर डॉ. बी.एम. सुरेश शामिल हैं।

एनएमसी में एथिक्स एवं मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड के सदस्य और प्रवक्ता डॉ. योगेंद्र मलिक ने बताया कि चिकित्सा छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए देश में पहली बार एक नए विकल्प को चुना गया है। उनका कहना है कहा कि मानसिक तनाव के पीछे कई कारण हैं जिनमें लगातार 36 घंटे की ड्यूटी, अपर्याप्त आराम, वरिष्ठों के जरिये शोषण, प्रतिकूल कार्य वातावरण, समय की कमी और बर्नआउट जैसे कई कारण हैं जिनकी वजह से छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर जोखिम का सामना करना पड़ रहा है।

वहीं फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (फोर्डा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अविरल माथुर ने इसे एक सराहनीय कदम बताया है और कहा है कि इससे देश को बेहतर डॉक्टर उपलब्ध कराने की दिशा में काफी मदद मिलेगी।

बता दें कि बीते पांच साल 2018 से 2022 के बीच देश में 122 छात्रों ने पढ़ाई के दौरान आत्महत्या कर ली। इनमें 64 एमबीबीएस और 58 छात्र स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में थे। इसी अवधि यानी 2018 से 2022 के बीच में 1270 चिकित्सा छात्रों ने अलग अलग कारणों के चलते बीच समय में ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी है। पढ़ाई छोड़ने वालों में 153 एमबीबीएस और 1117 स्नातकोत्तर के छात्र थे।

 

Asmita Sarkar

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