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भारत में बढ़ता डायबिटीज और लिवर रोग का खतरा: नई रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य

भारत में बढ़ता डायबिटीज और लिवर रोग का खतरा: नई रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य

भारत में बढ़ता डायबिटीज और लिवर रोग का खतरा: नई रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य

भारत में टाइप-2 डायबिटीज अब सिर्फ शुगर लेवल बढ़ने तक सीमित बीमारी नहीं रही है। हाल ही में द लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि डायबिटीज मरीजों में लिवर संबंधी बीमारियों का जोखिम तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर चार में से एक टाइप-2 डायबिटीज मरीज लिवर फाइब्रोसिस से जूझ रहा है, जबकि करीब 70 प्रतिशत मरीजों के लिवर में फैट जमा हो चुका है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह बीमारी अक्सर बिना किसी लक्षण के बढ़ती रहती है और समय रहते जांच न होने पर सिरोसिस या लिवर फेल होने तक पहुंच सकती है।

अध्ययन में बताया गया है कि टाइप-2 डायबिटीज के साथ जुड़ा लिवर रोग पहले की तुलना में कहीं अधिक आम और गंभीर हो चुका है। खासकर लिवर फाइब्रोसिस, जिसमें लिवर के टिश्यू में घाव बनने लगते हैं, इसे स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। भारत जैसे देश में, जहां डायबिटीज के मरीजों की संख्या दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही है, यह चुनौती और भी गंभीर हो जाती है।

रिपोर्ट में मेटाबोलिक डिसफंक्शन-असोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जिसे पहले फैटी लिवर डिजीज के नाम से जाना जाता था। यह स्थिति तब पैदा होती है जब मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस और अन्य मेटाबोलिक गड़बड़ियों की वजह से लिवर में अत्यधिक फैट जमा होने लगता है। शुरुआत में यह साधारण स्थिति लगती है, लेकिन समय के साथ सूजन बढ़ती है और फिर फाइब्रोसिस का रूप ले लेती है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि हर 20 में से एक डायबिटीज मरीज में सिरोसिस का खतरा पाया गया है, जो लिवर की स्थायी और गंभीर क्षति का संकेत है।

क्यों छूट जाती है लिवर की जांच

लिवर की बीमारियों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इनके शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। मरीज दर्द, थकान या किसी असामान्य परेशानी को महसूस नहीं करता, जिससे जांच की जरूरत समझ में नहीं आती। दूसरी तरफ डायबिटीज के इलाज में फोकस ब्लड शुगर नियंत्रण पर रहता है। आंखों, किडनी और नसों की नियमित जांच तो हो जाती है, लेकिन लिवर की जांच अक्सर नजरअंदाज हो जाती है। यही वजह है कि बीमारी देर से पकड़ में आती है।

समय पर पहचान से बच सकती है गंभीर स्थिति

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि फाइब्रोसिस को शुरुआती चरण में पहचान लिया जाए, तो स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है। वजन नियंत्रण, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और शुगर मैनेजमेंट जैसे कदम सिरोसिस या लिवर फेल होने के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं। समय पर जांच और इलाज से लिवर को होने वाले स्थायी नुकसान से बचाव किया जा सकता है।

अब आसान और सुरक्षित जांच तकनीकें उपलब्ध

आज लिवर की स्थिति जानने के लिए आधुनिक और सुरक्षित तकनीकें मौजूद हैं, जिनमें न तो सर्जरी की जरूरत होती है और न ही किसी तरह का दर्द होता है। विशेष स्कैनिंग तकनीक के माध्यम से लिवर की कठोरता मापी जाती है, जिससे फाइब्रोसिस के स्तर का पता चलता है। यह प्रक्रिया तेज है, सुरक्षित है और नियमित जांच के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

भारत में बढ़ते डायबिटीज के मामलों के बीच यह रिपोर्ट एक गंभीर चेतावनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि डायबिटीज की नियमित जांच में लिवर की जांच को भी शामिल किया जाए, ताकि बीमारी को शुरुआती चरण में ही रोका जा सके।

Asmita Sarkar

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