
Supreme Court of India ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि 2024 के क्लीनिकल ट्रायल नियमों में मौजूद कथित कमियों का विस्तृत ब्यौरा अदालत के समक्ष पेश किया जाए। ये नियम देश में वैक्सीन और नई दवाओं के क्लीनिकल ट्रायल की मंजूरी प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से लागू किए गए थे। मामले की सुनवाई P. S. Narasimha और Alok Aradhe की द्विसदस्यीय पीठ कर रही है।
मामला क्या है?
यह याचिका साल 2012 में एनजीओ Swasthya Adhikar Manch ने दायर की थी। संगठन का आरोप है कि देशभर में कई बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां बड़े पैमाने पर क्लीनिकल ट्रायल कर रही हैं, जिनमें गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना शामिल किया जाता है। याचिका के अनुसार, प्रतिभागियों को मुआवजे और सुरक्षा के मामले में कई बार नजरअंदाज किया जाता है और वे अनजाने में जोखिम में पड़ जाते हैं।
सुनवाई के दौरान क्या कहा गया?
एनजीओ की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Sanjay Parikh ने अदालत को बताया कि क्लीनिकल ट्रायल में प्रतिभागियों को शामिल करने की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और कई मामलों में गंभीर गड़बड़ियां सामने आई हैं। उनका दावा है कि विभिन्न ट्रायल्स के दौरान करीब 8,000 लोगों की मौत हुई है, जिनमें से कई परिवारों को अभी तक उचित मुआवजा नहीं मिल सका है।
वकील ने स्पष्ट किया कि याचिका 2024 के नए नियमों को चुनौती नहीं देती, बल्कि उन कमियों की ओर इशारा करती है जिन्हें दूर करना आवश्यक है, ताकि प्रतिभागियों की सुरक्षा को और बेहतर बनाया जा सके।
कोर्ट ने क्या निर्देश दिया?
पीठ ने वकीलों और संबंधित पक्षों से कहा कि अब तक उठाए गए कदमों, मौजूदा प्रक्रियाओं और नियमों की कमियों का एक संयुक्त दस्तावेज तैयार कर जमा किया जाए। अदालत इस मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को करेगी।
इससे पहले अदालत ने टिप्पणी की थी कि दवाओं और वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल अक्सर गरीब देशों में किए जाते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि भारत में होने वाले किसी भी ट्रायल का उद्देश्य भारतीय नागरिकों की मदद होना चाहिए, न कि केवल विदेशी कंपनियों के व्यावसायिक हित।
सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि क्लीनिकल ट्रायल से जुड़े नए नियम 2019 में तैयार किए गए और 2024 में लागू किए गए। सरकारी पक्ष के अनुसार, नियमों का उद्देश्य मंजूरी प्रक्रिया को तेज करना और प्रतिभागियों की सुरक्षा को बेहतर बनाना है।
सरकार ने यह भी दलील दी कि नए नियमों के लागू होने के बाद पुरानी चिंताओं का काफी हद तक समाधान हो चुका है, इसलिए मौजूदा याचिका अब प्रासंगिक नहीं रह गई।
हालांकि अदालत ने पहले कहा था कि 2013 के नियम प्रतिभागियों के अधिकारों की पर्याप्त रक्षा नहीं करते थे, जिसके बाद ही नए नियमों को मजबूती दी गई।




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