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Major Achievement for NIT Rourkela: New Bio-ink Developed for 3D Bioprinting; Aids in Bone and Cartilage Repair

NIT राउरकेला की बड़ी उपलब्धि: 3D बायोप्रिंटिंग के लिए नई बायो-इंक विकसित, हड्डी और कार्टिलेज मरम्मत में मिलेगी मदद

Major Achievement for NIT Rourkela: New Bio-ink Developed for 3D Bioprinting; Aids in Bone and Cartilage Repair

NIT राउरकेला (National Institute of Technology Rourkela) के शोधकर्ताओं ने 3D बायोप्रिंटिंग के लिए एक नई बायो-इंक विकसित कर उसका पेटेंट हासिल किया है। यह बायो-इंक हड्डियों और कार्टिलेज (उपास्थि) की मरम्मत के लिए टिश्यू जैसे ढांचे तैयार करने में उपयोगी साबित हो सकती है।

शोध टीम ने एक हाई शेप-फिडेलिटी प्रोटीन-पॉलीसैकराइड कंपोजिट बायो-इंक तैयार की है, जिसे विशेष रूप से 3D बायोप्रिंटिंग के लिए डिजाइन किया गया है। बायो-इंक ऐसे विशेष पदार्थ होते हैं जिनका उपयोग मानव ऊतकों की तरह संरचनाएं बनाने के लिए किया जाता है। यह शोध टिश्यू इंजीनियरिंग की एक बड़ी चुनौती—मजबूती, जैविक अनुकूलता और प्रिंटिंग क्षमता को एक साथ जोड़ने—को हल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

यह नवाचार Devendra Verma (एसोसिएट प्रोफेसर) के नेतृत्व में तैयार किया गया, जिसमें शोधार्थी Shreya Chrungoo और Tanmay Bharadwaj शामिल रहे। सभी शोधकर्ता संस्थान के बायोटेक्नोलॉजी और मेडिकल इंजीनियरिंग विभाग से जुड़े हैं। इस आविष्कार को ‘A High Shape-Fidelity Protein-Polysaccharide Composite Bioink for 3D Bioprinting’ शीर्षक से पेटेंट प्राप्त हुआ है।

इस बायो-इंक को तैयार करने के लिए शोधकर्ताओं ने Bovine Serum Albumin (BSA), Sodium Alginate और जिलेटिन व काइटोसन के पॉलीइलेक्ट्रोलाइट कॉम्प्लेक्स (PEC-GC) का संयोजन किया। इस मिश्रण से एक ऐसा बायोएक्टिव सिस्टम विकसित हुआ जो प्रिंटिंग के दौरान और उसके बाद भी संरचना की सटीकता बनाए रखते हुए कोशिकाओं की वृद्धि को सपोर्ट करता है।

प्रयोगशाला परीक्षणों में पाया गया कि यह बायो-इंक हड्डियों के एक्स्ट्रासेल्युलर मैट्रिक्स की तरह व्यवहार करती है, जिससे कोशिकाओं का जुड़ाव, चिपकाव और विकास बेहतर होता है। प्रिंटेड स्ट्रक्चर (स्कैफोल्ड) ने मजबूत मैकेनिकल गुण भी दिखाए, जिससे वे अपनी आकृति और कार्यक्षमता बनाए रखते हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, 2 प्रतिशत PEC-GC वाले स्कैफोल्ड में 90 प्रतिशत से अधिक सेल वायबिलिटी दर्ज की गई और इसमें हड्डी के ऊतक निर्माण व कोलेजन सिंथेसिस की भी क्षमता पाई गई।

यह विकास रीजेनेरेटिव मेडिसिन के क्षेत्र में अहम योगदान दे सकता है, क्योंकि इससे मरीज के अनुसार सटीक संरचना और जैविक कार्यक्षमता वाले स्कैफोल्ड तैयार किए जा सकेंगे। इस शोध के निष्कर्ष International Journal of Biological Macromolecules में प्रकाशित किए गए हैं।

आगे की योजना के तहत टीम पहले पशु परीक्षण करेगी, जिसके बाद क्लीनिकल स्टडी के जरिए इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जाएगा। यदि यह तकनीक सफल रहती है, तो टिश्यू इंजीनियरिंग, पर्सनलाइज्ड इम्प्लांट्स और एडवांस हेल्थकेयर ट्रीटमेंट सिस्टम में नए रास्ते खुल सकते हैं।

 

 

 

 

Asmita Sarkar

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