
मेडिकल साइंस ने पिछले कुछ वर्षों में जबरदस्त प्रगति की है। जिन बीमारियों को पहले असाध्य माना जाता था, आज उनके प्रभावी इलाज उपलब्ध हैं। एचआईवी अब दवाओं के जरिए कंट्रोल किया जा सकता है और कैंसर के उपचार में आई नई तकनीकों ने मरीजों की जीवन-आशा बढ़ाई है। कोरोना महामारी के दौरान टीकों का तेजी से विकास स्वास्थ्य जगत की बड़ी उपलब्धि माना गया।
वैज्ञानिक लगातार ऐसी क्रॉनिक बीमारियों के आसान, सुरक्षित और किफायती इलाज पर काम कर रहे हैं। इसके बावजूद, आज भी कई सामान्य और तेजी से फैलने वाली बीमारियां ऐसी हैं, जिनका कोई निश्चित इलाज मौजूद नहीं है। डॉक्टर केवल इनके लक्षणों को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं।
डेंगू: इलाज नहीं, केवल लक्षणों का नियंत्रण
डेंगू भारत में हर साल लाखों लोगों को प्रभावित करता है। यह एडीज मच्छर के जरिए फैलने वाला वायरल संक्रमण है। तेज बुखार, शरीर में दर्द और प्लेटलेट्स में तेजी से गिरावट इसके प्रमुख लक्षण हैं। अभी तक डेंगू को जड़ से खत्म करने वाली कोई दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।
उपचार में मुख्य रूप से पैरासिटामोल, अधिक पानी पीने और पौष्टिक आहार की सलाह दी जाती है। गंभीर मामलों में प्लेटलेट्स की निगरानी जरूरी होती है।
चिकनगुनिया: दर्दनाक लेकिन लाइलाज
डेंगू की तरह चिकनगुनिया का भी कोई विशेष इलाज नहीं है। यह भी संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलता है। तेज बुखार के साथ जोड़ों में होने वाला तीव्र दर्द इसकी पहचान है।
डॉक्टर मरीज को आराम, दर्द निवारक दवाएं और हाइड्रेशन की सलाह देते हैं। फिलहाल चिकनगुनिया से बचाव के लिए कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।
रेबीज: लक्षण शुरू होने के बाद 100% जानलेवा
रेबीज दुनिया की सबसे खतरनाक वायरल बीमारियों में से एक मानी जाती है। यह आम तौर पर संक्रमित कुत्ते या अन्य जानवरों के काटने से फैलती है।
सबसे गंभीर बात यह है कि एक बार लक्षण दिखने के बाद इसका कोई इलाज नहीं है और यह लगभग 100% जानलेवा होती है। शुरुआत में बुखार और कमजोरी दिखती है, लेकिन बाद में यह दिमाग को प्रभावित कर देती है और मरीज में पानी का डर विकसित हो जाता है।
रेबीज से बचाव का एकमात्र तरीका है—काटने के तुरंत बाद वैक्सीन लगवाना।
अल्जाइमर: याददाश्त छीनने वाली बीमारी
अल्जाइमर एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जो मुख्य रूप से 60 साल से अधिक उम्र के लोगों को प्रभावित करती है। इस बीमारी में दिमाग की कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं, जिससे याददाश्त और सोचने की क्षमता कमजोर होती जाती है।
अल्जाइमर को पूरी तरह ठीक करने का कोई इलाज नहीं है। मौजूदा दवाएं केवल इसके लक्षणों की गति को धीमा करने में मदद करती हैं।
मल्टीपल स्क्लेरोसिस: शरीर का ही बड़ा हमला
मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम ही दिमाग और रीढ़ की हड्डी की नसों को नुकसान पहुंचाने लगता है। इसके कारण कमजोरी, थकान, दृष्टि संबंधी समस्याएं और चलने-फिरने में दिक्कत जैसे लक्षण सामने आते हैं।
हालांकि कुछ दवाएं बीमारी की गति को धीमा कर सकती हैं, लेकिन अभी तक इसका कोई स्थाई इलाज नहीं है।
मेडिकल साइंस ने कई असंभव लगने वाली बीमारियों को काबू में किया है, लेकिन डेंगू, चिकनगुनिया, रेबीज, अल्जाइमर और मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी कई बीमारियां आज भी लाइलाज श्रेणी में आती हैं। इनसे बचने का सबसे प्रभावी तरीका जागरूकता और रोकथाम ही है।




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