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India's higher education institutions are becoming new laboratories for water conservation

भारत के उच्च शिक्षण संस्थान बन रहे जल संरक्षण की नई प्रयोगशाला, AI और स्मार्ट तकनीकों से तैयार हो रहे टिकाऊ समाधान

India's higher education institutions are becoming new laboratories for water conservation

तेजी से बढ़ते शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और मीठे पानी की बढ़ती मांग के कारण भारत में जल संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। इस चुनौती से निपटने के लिए अब देश के उच्च शिक्षण संस्थान (HEIs) केवल शिक्षा और शोध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जल संरक्षण के नए और टिकाऊ मॉडल विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

देश के कई प्रमुख संस्थान अपने परिसरों में स्मार्ट वाटर मीटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल वाटर ऑडिट, वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting), अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण (Wastewater Recycling) और डेटा आधारित निगरानी प्रणाली का उपयोग कर रहे हैं। इन तकनीकों की मदद से न केवल परिसर में पानी की बचत हो रही है, बल्कि ऐसे मॉडल भी तैयार किए जा रहे हैं जिन्हें शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है।

IIT Guwahati ने विकसित किया जल संरक्षण का प्रभावी मॉडल

IIT Guwahati के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अरूप के. शर्मा के अनुसार, संस्थान ने Ecological Management Practices (EMP) की अवधारणा विकसित की है। यह परियोजना केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय और जल शक्ति मंत्रालय के सहयोग से तैयार की गई थी।

EMP मॉडल का उद्देश्य जलग्रहण क्षेत्रों (Watersheds) में अधिक से अधिक वर्षा जल को जमीन के भीतर पहुंचाना है, ताकि सतह से बहकर पानी की बर्बादी कम हो और भूजल स्तर बेहतर हो सके। इससे मिट्टी का कटाव, बाढ़ और जल हानि जैसी समस्याओं को भी कम करने में मदद मिलती है।

इस मॉडल को गुवाहाटी महानगर विकास प्राधिकरण (GMDA) और राज्य के मृदा संरक्षण विभाग ने गुवाहाटी के चार जलग्रहण क्षेत्रों में लागू किया। विशेष रूप से गरभांगा क्षेत्र में किए गए पायलट प्रोजेक्ट में मिट्टी के बहाव (Sediment Yield) में करीब तीन गुना कमी दर्ज की गई और भूजल स्तर में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला।

चाय बागानों के लिए तैयार किया गया SARMA मॉडल

प्रो. शर्मा ने बताया कि उनकी टीम ने Sustainable Approach of Rainwater Management and Application (SARMA) नामक एक नई प्रणाली भी विकसित की है, जिसे असम के कुछ चाय बागानों में सफलतापूर्वक लागू किया गया।

इस मॉडल में एक ही तालाब को दो हिस्सों में बांटा जाता है। पहले हिस्से में मानसून के दौरान एकत्रित वर्षा जल को संग्रहित कर सर्दियों में ड्रिप सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है, जबकि दूसरा हिस्सा अतिरिक्त वर्षा जल को अस्थायी रूप से रोककर बाढ़ के खतरे को कम करने का काम करता है।

शोधकर्ताओं ने स्थानीय वर्षा के कई वर्षों के आंकड़ों और क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन कर प्रत्येक स्थान के लिए अलग-अलग डिजाइन तैयार किए।

BITS Pilani का ‘Campus to Community’ मॉडल बना मिसाल

BITS Pilani के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर रविकुमार गुंटू का कहना है कि भारत के पास दुनिया के कुल मीठे पानी का केवल लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि यहां 1.4 अरब से अधिक आबादी रहती है। विभिन्न राष्ट्रीय आकलनों के अनुसार देश के करीब 60 करोड़ लोग पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं और वर्ष 2030 तक पानी की मांग उपलब्ध संसाधनों से कहीं अधिक हो सकती है।

उन्होंने बताया कि BITS Pilani ने Campus-to-Community मॉडल अपनाया है। संस्थान में अपनाई गई जल संरक्षण तकनीकों को आसपास के क्षेत्रों तक पहुंचाया गया है। गहरे रिचार्ज कुओं और सोक पिट्स के माध्यम से पिलानी, चंद्रावती और रागरवास जैसे क्षेत्रों में भूजल स्तर सुधारने में मदद मिली है।

संस्थान हर वर्ष एक करोड़ लीटर से अधिक पानी का संरक्षण और भूजल रिचार्ज करता है। इसके अलावा प्रतिदिन लगभग 1.5 मिलियन लीटर (MLD) उपचारित अपशिष्ट जल का दोबारा उपयोग किया जाता है। जागरूकता अभियान, तकनीकी प्रशिक्षण और सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से 15 हजार से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिला है।

तकनीक से ज्यादा बड़ी चुनौती उसका प्रभावी संचालन

विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण में सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि उसका प्रभावी संचालन और सभी पक्षों के बीच समन्वय है।

IIT Kharagpur के निदेशक प्रो. सुमन चक्रवर्ती के अनुसार, किसी भी स्मार्ट जल प्रबंधन प्रणाली की सफलता तभी संभव है जब प्रशासन, इंजीनियर, छात्र और उपयोगकर्ता उसके आंकड़ों पर भरोसा करें और उनका नियमित उपयोग करें।

IIT Kharagpur अपने परिसर में डिजिटल वाटर मॉनिटरिंग सिस्टम, GIS आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर मैपिंग, डेटा एनालिटिक्स, वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल उपचार और पुन: उपयोग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है। इससे पानी की खपत का अनुमान लगाने, संभावित समस्याओं की पहले से पहचान करने और जल वितरण को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल रही है।

AI और सैटेलाइट तकनीक से हो रही बेहतर जल निगरानी

देश के कई उच्च शिक्षण संस्थान अब Artificial Intelligence (AI), Machine Learning (ML), Satellite Remote Sensing, Geospatial Analytics और वैज्ञानिक मॉडलिंग की मदद से बाढ़ की भविष्यवाणी, भूजल आकलन और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं।

इन तकनीकों के जरिए शुरुआती चेतावनी प्रणाली (Early Warning System), भूजल पुनर्भरण का आकलन और जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए सटीक निर्णय लेना आसान हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालयों में सफल साबित हो रही ये तकनीकें भविष्य में नगर निकायों, उद्योगों और ग्रामीण जल योजनाओं में भी आसानी से लागू की जा सकती हैं।

कृषि विश्वविद्यालय भी निभा रहे अहम भूमिका

जल संरक्षण की दिशा में कृषि विश्वविद्यालय भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (TNAU) और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने ड्रिप सिंचाई, मिट्टी की नमी मापने वाले सेंसर, स्वचालित फर्टिगेशन सिस्टम और सैटेलाइट आधारित कृषि सलाह जैसी तकनीकों को अपनाकर पानी की खपत में 30 से 50 प्रतिशत तक कमी लाने के सफल परिणाम दिखाए हैं। इन तकनीकों से फसल उत्पादन और किसानों की आय दोनों में सकारात्मक प्रभाव देखा गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत माइक्रो इरिगेशन और रिमोट सेंसिंग तकनीकों में वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति रखता है। अब आवश्यकता इन नवाचारों को बेहतर प्रशासन, सामुदायिक भागीदारी और व्यापक स्तर पर अपनाने की है।

शिक्षा से तैयार हो रही जल संरक्षण की नई सोच

जल संरक्षण केवल तकनीक का विषय नहीं, बल्कि जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन का भी हिस्सा है। यही कारण है कि कई विश्वविद्यालय अब अपने पाठ्यक्रमों में जल संरक्षण को शामिल कर रहे हैं। साथ ही छात्रों को आधुनिक जल प्रबंधन तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

छात्रों द्वारा संचालित वाटर ऑडिट, सस्टेनेबिलिटी क्लब और सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम जिम्मेदार जल उपयोग की संस्कृति विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षा, तकनीक और समुदाय एक साथ काम करें, तो भारत आने वाले वर्षों में जल सुरक्षा की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा सकता है।

 

 

Asmita Sarkar

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