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Bihar Launches ‘Mera Vidyalaya, Mera Swabhiman’ Portal, Government Schools Can Now Be Adopted

बिहार में अब गोद लिए जा सकेंगे सरकारी स्कूल, BSEB ने लॉन्च किया ‘मेरा विद्यालय, मेरा स्वाभिमान’ पोर्टल

Bihar Launches ‘Mera Vidyalaya, Mera Swabhiman’ Portal, Government Schools Can Now Be Adopted

बिहार में सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक नई पहल शुरू की गई है। राज्य सरकार द्वारा हाल ही में 551 मॉडल स्कूलों की शुरुआत के बाद अब सरकारी विद्यालयों को गोद लेने की व्यवस्था भी लागू की गई है। इस उद्देश्य से बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) ने ‘मेरा विद्यालय, मेरा स्वाभिमान’ नामक डिजिटल पोर्टल लॉन्च किया है, जिसके माध्यम से लोग और संस्थाएं सरकारी स्कूलों के विकास में सीधे भागीदारी कर सकेंगी।

सरकार का दावा है कि इस पहल से स्कूलों में संसाधनों की उपलब्धता बढ़ेगी, आधारभूत सुविधाओं में सुधार होगा और छात्रों को बेहतर शैक्षणिक माहौल मिल सकेगा। हालांकि इस योजना को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस भी शुरू हो गई है।

कौन गोद ले सकेगा सरकारी स्कूल?

नई व्यवस्था के तहत सरकारी स्कूलों को गोद लेने की सुविधा केवल संस्थानों तक सीमित नहीं है। पूर्व छात्र (Alumni), आम नागरिक, गैर-सरकारी संगठन (NGO), सामाजिक संस्थाएं, कॉरपोरेट कंपनियां और विदेशों में रहने वाले भारतीय (NRI) भी इस योजना में भाग ले सकते हैं।

डिजिटल पोर्टल के जरिए इच्छुक व्यक्ति या संस्था किसी सरकारी स्कूल के विकास कार्यों में सहयोग के लिए आवेदन कर सकती है। सरकार का उद्देश्य समाज और शिक्षा व्यवस्था के बीच भागीदारी को बढ़ावा देना है, ताकि स्कूलों को अतिरिक्त सहयोग और संसाधन मिल सकें।

अब तीन साल नहीं, आजीवन भी गोद लिया जा सकेगा स्कूल

इस योजना की एक बड़ी विशेषता यह है कि स्कूल गोद लेने की अवधि को लेकर पहले की सीमाओं में बदलाव किया गया है। पहले जहां सीमित अवधि के लिए सहयोग की व्यवस्था थी, वहीं अब स्कूलों को तीन वर्ष, पांच वर्ष या आजीवन अवधि के लिए गोद लिया जा सकेगा।

बिहार में 73 हजार से अधिक सरकारी विद्यालय हैं, जिन्हें इस योजना के दायरे में शामिल किया गया है। इससे राज्य के दूरदराज क्षेत्रों के स्कूलों तक भी विकास कार्यों और संसाधनों की पहुंच बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

मॉडल स्कूलों के बाद शिक्षा सुधार की नई कोशिश

बिहार सरकार ने हाल के महीनों में 551 मॉडल स्कूलों की शुरुआत की है। इन स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम, ई-लाइब्रेरी और आधुनिक शिक्षण सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा किया गया है। अब स्कूल गोद लेने की योजना को इसी शिक्षा सुधार अभियान का अगला कदम माना जा रहा है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि योजना पारदर्शी तरीके से लागू होती है तो इससे स्कूलों के बुनियादी ढांचे, डिजिटल सुविधाओं और छात्रों के सीखने के वातावरण में सुधार हो सकता है।

योजना पर शुरू हुई राजनीतिक बहस

सरकारी स्कूलों को गोद देने की योजना को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन से जुड़े नेताओं ने इसे शिक्षा क्षेत्र में जनभागीदारी बढ़ाने वाला कदम बताया है। वहीं विपक्षी दलों ने इस योजना को लेकर कई सवाल उठाए हैं।

कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकारी विद्यालयों के विकास की जिम्मेदारी सरकार की है और ऐसी योजनाओं से निजी संस्थाओं की भूमिका बढ़ सकती है। उनका तर्क है कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि स्कूल गोद लेने के बाद प्रशासनिक जिम्मेदारी किसके पास रहेगी और निर्णय लेने की प्रक्रिया में गोद लेने वाली संस्था की भूमिका कितनी होगी।

किन सवालों के जवाब का इंतजार?

योजना की घोषणा के बाद कई महत्वपूर्ण प्रश्न चर्चा में हैं। इनमें यह शामिल है कि स्कूलों के रखरखाव और विकास कार्यों का खर्च कौन उठाएगा, सरकारी नियंत्रण किस स्तर तक बना रहेगा, और स्कूल प्रबंधन में बाहरी संस्थाओं की भूमिका कितनी होगी।

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि योजना की सफलता पारदर्शिता, स्पष्ट दिशा-निर्देश और जवाबदेही पर निर्भर करेगी। यदि इन पहलुओं को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाता है, तो यह पहल सरकारी स्कूलों के लिए सकारात्मक बदलाव ला सकती है।

क्या बदल सकती है बिहार के सरकारी स्कूलों की तस्वीर?

बिहार लंबे समय से सरकारी स्कूलों में आधारभूत सुविधाओं, संसाधनों और गुणवत्ता सुधार की चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में ‘मेरा विद्यालय, मेरा स्वाभिमान’ जैसी पहल स्कूलों को अतिरिक्त सहयोग उपलब्ध कराने का माध्यम बन सकती है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी स्कूल को गोद लेने का अर्थ उसके निजीकरण से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। योजना का मुख्य उद्देश्य सामुदायिक सहयोग और संसाधनों की भागीदारी बढ़ाना है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस पहल का वास्तविक असर छात्रों, शिक्षकों और स्कूलों की कार्यप्रणाली पर कितना पड़ता है।

 

Asmita Sarkar

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