
DU Hostel Crisis: दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला छात्र हॉस्टल की इमारत गिरने और सात लोगों की मौत के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती रहने की जगह का सवाल एक बार फिर सामने है। दक्षिणी दिल्ली में दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास हुई इस घटना ने उन हजारों छात्रों की मुश्किलें उजागर कर दी हैं, जिन्हें कॉलेज में दाखिला मिलने के बाद कैंपस में हॉस्टल नहीं मिल पाता और उन्हें निजी PG, प्राइवेट हॉस्टल या किराए के मकान का सहारा लेना पड़ता है।
सत्य निकेतन में जिस पांच मंजिला इमारत में निजी छात्र हॉस्टल चल रहा था, वह 6 सितंबर को ढह गई थी। हादसे में सात लोगों की मौत हुई और पांच लोग घायल हुए। पुलिस जांच में इमारत में चल रहे निर्माण और मरम्मत कार्य सहित कई पहलुओं की जांच की जा रही है। हादसे के बाद दिल्ली में PG और छात्र आवासों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे हैं।
इस हादसे की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली में PG और छात्र आवासों की सुरक्षा जांच की मांग भी उठी है। दिल्ली हाईकोर्ट ने DU में पर्याप्त हॉस्टल विकसित करने से जुड़ी एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और विश्वविद्यालय को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को होनी है।
DU के 91 कॉलेज, लेकिन सिर्फ 20 में हॉस्टल
दिल्ली यूनिवर्सिटी में कुल 91 कॉलेज हैं। उपलब्ध अधिकारियों के आंकड़ों के मुताबिक इनमें करीब 20 कॉलेजों में हॉस्टल की सुविधा है, जबकि 71 कॉलेजों में छात्रों के लिए कॉलेज स्तर पर हॉस्टल उपलब्ध नहीं है। विश्वविद्यालय के नॉर्थ और साउथ कैंपस में भी मुख्य हॉस्टल हैं, लेकिन कुल मिलाकर करीब 7,000 हॉस्टल सीटें ही उपलब्ध हैं।
यह आंकड़ा DU की कुल छात्र संख्या के मुकाबले बेहद कम है। विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार DU में करीब 2.1 लाख अंडरग्रेजुएट छात्र और 34,520 पोस्टग्रेजुएट छात्र हैं। इनमें PhD स्कॉलर भी शामिल हैं। यानी विश्वविद्यालय की कुल छात्र संख्या करीब 2.5 लाख है।
ऐसे में करीब 7,000 हॉस्टल सीटें कुल छात्र संख्या का बहुत छोटा हिस्सा ही कवर करती हैं। खासकर दिल्ली से बाहर से आने वाले छात्रों के लिए यह समस्या और बड़ी हो जाती है।
2026-27 में करीब 71,600 नए UG छात्र
हॉस्टल की कमी का असर नए एडमिशन के समय सबसे ज्यादा दिखाई देता है। 2026-27 सत्र में दिल्ली यूनिवर्सिटी में करीब 71,600 नए अंडरग्रेजुएट छात्रों को दाखिला मिला है। कॉलेजों के अनुमान के मुताबिक DU के करीब आधे छात्र दिल्ली के बाहर से आते हैं। ऐसे छात्रों के लिए एडमिशन के साथ ही रहने की व्यवस्था करना जरूरी हो जाता है।
लेकिन कैंपस में उपलब्ध सीटों की संख्या इतनी कम है कि हर जरूरतमंद छात्र को हॉस्टल मिलना संभव नहीं है। यही वजह है कि यूनिवर्सिटी के आसपास निजी PG और किराए के कमरों की मांग लगातार बनी रहती है।
हॉस्टल वाले कॉलेजों में भी सीटों की कमी
जिन कॉलेजों में हॉस्टल है, वहां भी छात्रों की संख्या और उपलब्ध सीटों के बीच बड़ा अंतर है। इसका एक उदाहरण मिरांडा हाउस है। कॉलेज में करीब 5,375 छात्र हैं, जबकि हॉस्टल में लगभग 370 छात्रों के रहने की क्षमता बताई गई है। 2026-27 में फर्स्ट ईयर के छात्रों के लिए हॉस्टल की सिर्फ 90 सीटें उपलब्ध कराई गई हैं। मिरांडा हाउस की आधिकारिक हॉस्टल सीट आवंटन जानकारी भी 2026-27 के लिए 90 सीटों की पुष्टि करती है।
इसी तरह श्री वेंकटेश्वर कॉलेज में करीब 4,600 छात्र हैं, लेकिन हॉस्टल की क्षमता लगभग 150 छात्रों की है। इनमें नए छात्रों के लिए सिर्फ 50 सीटें उपलब्ध हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हॉस्टल सुविधा वाले कॉलेजों में भी बड़ी संख्या में छात्रों को निजी आवास पर निर्भर रहना पड़ता है।
हॉस्टल की कमी आज की समस्या नहीं
दिल्ली यूनिवर्सिटी में हॉस्टल की कमी लंबे समय से बनी हुई है। नवंबर 2016 में राज्यसभा में दिए गए एक लिखित जवाब में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने DU के आंकड़ों के हवाले से बताया था कि विश्वविद्यालय के पास 19 हॉस्टल थे, जिनकी कुल क्षमता 3,580 छात्रों की थी। कॉलेजों की ओर से उपलब्ध आवास को जोड़ने पर कुल क्षमता करीब 6,000 सीट तक पहुंचती थी। उस समय DU हर साल कम से कम 60,000 छात्रों को दाखिला दे रहा था।
करीब एक दशक बाद भी तस्वीर बहुत नहीं बदली है। 2026 में DU में करीब 71,600 नए UG छात्रों का प्रवेश हुआ, जबकि कुल हॉस्टल सीटें करीब 7,000 के आसपास हैं। यानी छात्रों की संख्या बढ़ने के साथ रहने की सुविधा उसी अनुपात में नहीं बढ़ी है।
हॉस्टल नहीं मिला तो PG और किराए का कमरा ही विकल्प
कैंपस में जगह नहीं मिलने के बाद छात्रों के सामने निजी आवास ही प्रमुख विकल्प बचता है। नॉर्थ कैंपस के आसपास विजयनगर और अन्य छात्र इलाकों में बड़ी संख्या में PG और किराए के कमरे हैं। वहीं साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन जैसे इलाकों में भी छात्रों के लिए निजी हॉस्टल और PG बड़ी संख्या में चलते हैं।
लेकिन निजी आवास का विकल्प हर छात्र के लिए आसान नहीं है। किराया, सिक्योरिटी डिपॉजिट, कमरे का आकार, बिजली-पानी के खर्च और मकान की स्थिति जैसी कई चीजें छात्रों के बजट पर असर डालती हैं। सबसे बड़ी चिंता सुरक्षा की है। सत्य निकेतन हादसे ने दिखाया है कि कम किराए या कॉलेज के पास रहने की सुविधा के साथ यह देखना भी जरूरी है कि जिस इमारत में छात्र रह रहे हैं, वह सुरक्षित है या नहीं।
अब सवाल सिर्फ हॉस्टल की संख्या का नहीं, सुरक्षित आवास का भी है
सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली में छात्र आवासों की सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक स्तर पर भी चर्चा तेज हुई है। दिल्ली सरकार ने PG सहित सार्वजनिक इस्तेमाल वाली इमारतों के लिए नई सुरक्षा नीति और स्ट्रक्चरल ऑडिट की दिशा में कदम उठाने की बात कही है। PG हब के रूप में पहचाने जाने वाले इलाकों में इमारतों की जांच भी प्रस्तावित है।
इस पूरी स्थिति से एक बात साफ है कि DU में हॉस्टल की समस्या केवल कमरे उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। छात्रों की संख्या के अनुपात में पर्याप्त, सस्ता और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराना भी उच्च शिक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा है। जब विश्वविद्यालय में दाखिला पाने वाले हजारों छात्रों के पास कैंपस में रहने का विकल्प नहीं होता, तो वे निजी बाजार पर निर्भर होते हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय, दिल्ली सरकार और स्थानीय निकायों के लिए चुनौती यह है कि छात्रों को सिर्फ शिक्षा का अवसर ही नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक रहने की व्यवस्था भी मिल सके।




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