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MBBS की खाली सीटें भरने के लिए निजी मेडिकल कॉलेजों ने फीस में दी 40% तक छूट, बढ़ती फीस बनी बड़ी वजह

देश के कई मेडिकल कॉलेजों में तीसरे और स्ट्रे वैकेंसी राउंड की काउंसलिंग के बाद भी MBBS की बड़ी संख्या में सीटें खाली रह गई हैं। इन सीटों को भरने के लिए कुछ निजी मेडिकल कॉलेजों ने ट्यूशन फीस में 40 प्रतिशत तक की छूट देने की पेशकश की है।

यह स्थिति मेडिकल शिक्षा में तेजी से बढ़ती सीटों और छात्रों की भुगतान क्षमता के बीच बढ़ते अंतर को दिखाती है। यहां तक कि देश के प्रतिष्ठित डीम्ड विश्वविद्यालयों को भी अपनी MBBS सीटें भरने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

इस साल ऑल इंडिया काउंसलिंग के तीसरे राउंड के बाद MBBS की 3,426 सीटें खाली रह गई थीं। यह संख्या 2025 में खाली रह गई 802 सीटों के मुकाबले पांच गुना से भी अधिक है। इसके बाद मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) ने स्ट्रे वैकेंसी राउंड के बाद तमिलनाडु, पुडुचेरी और कर्नाटक में 837 सीटें खाली होने की जानकारी दी।

इन खाली सीटों के बीच एक अहम तथ्य यह भी है कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने इस साल MBBS की 13,636 नई स्नातक सीटों को मंजूरी दी है। इससे देश में MBBS सीटों की कुल संख्या बढ़कर 1.4 लाख से अधिक हो गई है।

हॉस्टल, मेस और अन्य संस्थागत खर्चों को जोड़ने पर निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई का सालाना खर्च करीब 25 लाख से 35 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। इस हिसाब से पूरे साढ़े चार साल के पाठ्यक्रम पर लगभग 1.25 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं।

ठाणे के मेडिकल एजुकेशन काउंसलर मुजफ्फर खान के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में मंजूर की गई नई MBBS सीटों में से 75 प्रतिशत से अधिक निजी मेडिकल कॉलेजों को मिली हैं। उनका कहना है कि निम्न-मध्यम वर्ग और यहां तक कि मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए इतनी अधिक फीस देना मुश्किल हो गया है।

मेडिकल सीटें खाली रहने की सबसे बड़ी वजह महंगी फीस

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, सीटें खाली रहने की सबसे बड़ी वजह निजी मेडिकल कॉलेजों की ऊंची फीस है। उन्होंने बताया कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सभी सीटें भर जाती हैं, जबकि खाली सीटों की समस्या मुख्य रूप से निजी क्षेत्र में है।

अधिकारी का कहना है कि मेडिकल कॉलेजों और राज्यों की फीस तय करने वाली समितियों को फीस के ढांचे की दोबारा समीक्षा करनी चाहिए। NEET की न्यूनतम योग्यता सीमा कम करने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा, क्योंकि पहले से ही लाखों उम्मीदवार परीक्षा में सफल हो रहे हैं। असली चुनौती योग्य छात्रों के लिए मेडिकल शिक्षा का खर्च उठा पाना है।

सीटें खाली रहने का दबाव अब निजी मेडिकल कॉलेजों पर भी दिखने लगा है। तमिलनाडु के एक डीम्ड विश्वविद्यालय में एक उम्मीदवार ने बातचीत के बाद सालाना फीस 25 लाख रुपये से घटाकर 15 लाख रुपये करवा ली। इस तरह फीस में 40 प्रतिशत की कमी आई और साढ़े चार साल के पाठ्यक्रम का कुल खर्च 80 लाख रुपये से कम हो गया, जबकि पहले यह एक करोड़ रुपये से अधिक था।

मुजफ्फर खान के अनुसार, कुछ कॉलेज खाली सीटें भरने के लिए काउंसलरों और एडमिशन एजेंटों से संपर्क कर रहे हैं। उनका कहना है कि परिवार MBBS की एक स्नातक सीट के लिए अपनी पूरी जमा पूंजी खर्च करने से बच रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि MBBS के बाद पीजी यानी पोस्टग्रेजुएट मेडिकल पढ़ाई में भी काफी खर्च करना पड़ता है।

तमिलनाडु के शिक्षा कार्यकर्ता प्रिंस गजेंद्र बाबू का कहना है कि सीटें खाली रहना इस बात का संकेत है कि मेडिकल कॉलेज में प्रवेश की योग्यता हासिल कर लेना और वहां की फीस चुका पाना दो अलग-अलग बातें हैं। उनके मुताबिक, संस्थान शुरुआत में दाखिला लेने वाले छात्रों से पूरी फीस लेते हैं, लेकिन खाली सीटें भरने के लिए बाद में आने वाले छात्रों को छूट देते हैं। उन्होंने इसे शिक्षा के व्यावसायीकरण का उदाहरण बताते हुए कहा कि इससे योग्यता और समान अवसर का सिद्धांत प्रभावित होता है, फिर भी कई सीटें खाली रह जाती हैं।

कर्नाटक में भी पहली बार खाली रह गईं MBBS सीटें

MBBS की खाली सीटों का असर कर्नाटक में भी देखने को मिला है। राज्य में 76 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें 25 सरकारी और 51 निजी कॉलेज शामिल हैं। इन संस्थानों में MBBS की कुल 15,745 सीटें हैं। इसके बावजूद पिछले पांच वर्षों में पहली बार राज्य में 191 सीटें खाली रह गईं।

कर्नाटक परीक्षा प्राधिकरण (KEA) ने इस साल रिकॉर्ड सात राउंड की काउंसलिंग कराई। प्राधिकरण के कार्यकारी निदेशक एच. प्रसन्ना के मुताबिक, पहली बार इतने अधिक राउंड में सीटों का आवंटन किया गया है। उन्होंने बताया कि मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) अनुमति देती है तो आगे भी काउंसलिंग के अतिरिक्त राउंड आयोजित किए जा सकते हैं।

राज्य में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में NRI कोटे के विस्तार को भी इस स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है। इस कोटे के तहत सीटों की फीस करीब 25 लाख रुपये सालाना है, जबकि निजी मेडिकल कॉलेजों में मैनेजमेंट कोटे की फीस 30 लाख से 45 लाख रुपये सालाना तक पहुंच जाती है।

कर्नाटक के चिकित्सा शिक्षा निदेशालय ने NEET-UG की न्यूनतम योग्यता सीमा घटाने की मांग को लेकर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) से संपर्क किया है। फिलहाल सामान्य वर्ग के लिए यह न्यूनतम पर्सेंटाइल 50 है। योग्यता सीमा कम करने का उद्देश्य प्रवेश के लिए पात्र उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाना है। हालांकि, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी का कहना है कि इससे फीस वहन करने की समस्या दूर नहीं होगी।

राजीव गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज, कर्नाटक के कुलपति डॉ. भगवान बीसी का कहना है कि मैनेजमेंट कोटे की अधिक फीस के कारण बड़ी संख्या में उम्मीदवार MBBS की सीटों से दूर हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि करीब 24 लाख छात्र 1.4 लाख मेडिकल सीटों के लिए प्रवेश परीक्षा देते हैं। इनमें से बेहतर रैंक हासिल करने वाले छात्रों को सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीट मिल जाती है, लेकिन बाकी उम्मीदवारों के लिए निजी कॉलेजों की मैनेजमेंट कोटे की फीस चुकाना आसान नहीं होता।

मेडिकल शिक्षा की बढ़ती लागत पर उठे सवाल

MBBS की सीटें बढ़ने के बावजूद उनका खाली रहना मेडिकल शिक्षा की पहुंच और खर्च से जुड़ा बड़ा सवाल खड़ा करता है। एक तरफ देश में डॉक्टरों की जरूरत को देखते हुए मेडिकल सीटों की संख्या बढ़ाई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ निजी कॉलेजों की ऊंची फीस के कारण कई योग्य छात्र दाखिला नहीं ले पा रहे हैं।

ऐसे में केवल मेडिकल सीटों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। फीस को परिवारों की आर्थिक क्षमता के अनुरूप बनाना और निजी मेडिकल शिक्षा को अधिक किफायती करना भी जरूरी है।

Raish Ahmed

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