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Major Change for Those Pursuing MBBS Abroad: Only English-Medium Degrees Now Valid in India

विदेश से MBBS करने वालों के लिए बड़ा बदलाव: अब केवल इंग्लिश मीडियम डिग्री ही भारत में मान्य

Major Change for Those Pursuing MBBS Abroad: Only English-Medium Degrees Now Valid in India

मेडिकल शिक्षा से जुड़ी नीतियों में बड़े बदलाव के तहत National Medical Commission (NMC) ने साफ कर दिया है कि अब विदेश से केवल इंग्लिश मीडियम में की गई MBBS डिग्री ही भारत में मान्य होगी। यह फैसला उन हजारों भारतीय छात्रों को सीधे प्रभावित करेगा, जो Russia, China और मध्य एशिया के कई देशों में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं, जहां अक्सर पढ़ाई स्थानीय भाषाओं में कराई जाती है।

नई गाइडलाइन के अनुसार, अगर किसी छात्र ने नॉन-इंग्लिश मीडियम में मेडिकल डिग्री हासिल की है, तो उसे भारत में मान्यता नहीं मिलेगी। ऐसे में ये छात्र न तो यहां प्रैक्टिस कर पाएंगे और न ही आगे लाइसेंसिंग की प्रक्रिया में शामिल हो सकेंगे। NMC का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता को एक समान बनाना और यह सुनिश्चित करना है कि छात्रों को वही ट्रेनिंग मिले, जो भारतीय क्लिनिकल और अकादमिक मानकों के अनुरूप हो।

इस फैसले का असर व्यापक होने की संभावना है। हर साल बड़ी संख्या में भारतीय छात्र सीमित सीटों और निजी मेडिकल कॉलेजों की ऊंची फीस के कारण विदेश का रुख करते हैं। इनमें से कई छात्र ऐसे प्रोग्राम चुनते हैं, जहां पहले एक साल स्थानीय भाषा सीखनी पड़ती है और फिर उसी भाषा में पढ़ाई होती है। नए नियम के बाद अब यह रास्ता जोखिम भरा हो सकता है।

NMC ने विदेशी मेडिकल संस्थानों की निगरानी भी कड़ी कर दी है। समीक्षा प्रक्रिया के तहत खासकर Uzbekistan के कुछ विश्वविद्यालयों को चिन्हित किया गया है और कुछ को चेतावनी या “ब्लैकलिस्ट” श्रेणी में रखा गया है। छात्रों को सलाह दी गई है कि एडमिशन लेने से पहले संस्थान की मान्यता और स्थिति की अच्छी तरह जांच कर लें।

विदेश में पढ़ाई चुनने के पीछे सबसे बड़ा कारण खर्च भी रहा है। भारत के निजी मेडिकल कॉलेजों में MBBS की फीस जहां 1 करोड़ रुपये से ज्यादा तक पहुंच सकती है, वहीं Russia या China जैसे देशों में यही कोर्स 20 से 25 लाख रुपये में पूरा हो जाता है। हालांकि, नए नियम के बाद छात्र इन विकल्पों पर दोबारा सोचने को मजबूर हो सकते हैं, खासकर जहां इंग्लिश मीडियम की गारंटी नहीं है।

इस बदलाव का एक अहम असर लाइसेंसिंग प्रक्रिया पर भी पड़ेगा। नॉन-इंग्लिश मीडियम से पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए भारत में क्वालिफाइंग एग्जाम देना मुश्किल हो सकता है, जिससे उनके लिए देश में डॉक्टर के तौर पर करियर बनाना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सरकार के उस रुख को दिखाता है, जिसमें मेडिकल शिक्षा में गुणवत्ता को प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि, इसके साथ यह चिंता भी सामने आई है कि सीमित सीटों और कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते विदेश जाने वाले छात्रों के विकल्प अब और सीमित हो सकते हैं।

फिलहाल, जो छात्र विदेश में MBBS करने की योजना बना रहे हैं, उन्हें कोर्स की भाषा, संस्थान की मान्यता और नियमों के अनुपालन की पूरी जांच करने की जरूरत है। NMC का संदेश साफ है कि अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के रास्ते अब राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ही होने चाहिए, तभी करियर में निरंतरता और विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सकती है।

 

 

 

 

Asmita Sarkar

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