
अदालतों में फॉरेंसिक रिपोर्ट अक्सर वैज्ञानिक सटीकता की छवि के साथ पेश की जाती हैं। जब केमिकल एग्जामिनर या फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) यह निष्कर्ष देती है कि खून का मिलान हुआ, डीएनए मेल खाता है या कोई पदार्थ अभियोजन के पक्ष को मजबूत करता है, तो इन निष्कर्षों को अंतिम सत्य मान लेने की प्रवृत्ति बन जाती है। लेकिन Najeeruddin v. State of U.P. में Allahabad High Court के फैसले ने स्पष्ट किया है कि ऐसा दृष्टिकोण कानूनी रूप से जोखिम भरा हो सकता है।
यह निर्णय एक महत्वपूर्ण अंतर को रेखांकित करता है, जिसे हर सेशन जज को समझना जरूरी है—स्वीकार्यता (admissibility), विश्वसनीयता (reliability) और निष्पक्षता (fairness) तीन अलग-अलग कानूनी कसौटियां हैं। किसी फॉरेंसिक रिपोर्ट को Section 293 CrPC के तहत साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन केवल स्वीकार्यता यह साबित नहीं करती कि रिपोर्ट पूरी तरह विश्वसनीय है या आरोपी के खिलाफ उसका निष्पक्ष उपयोग किया गया है।
यह मामला कई हत्याओं और यौन अपराध के गंभीर आरोपों से जुड़ा था। ट्रायल कोर्ट ने डीएनए और फिंगरप्रिंट रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने एक गंभीर खामी पाई—ये फॉरेंसिक रिपोर्ट आरोपी के Section 313 CrPC के तहत बयान दर्ज होने के बाद पेश की गई थीं और बाद में उन्हें आरोपी के सामने नहीं रखा गया। इससे आरोपी को इन महत्वपूर्ण साक्ष्यों पर सफाई देने या उन्हें चुनौती देने का मौका नहीं मिला।
अदालत ने माना कि यह चूक निष्पक्ष ट्रायल के सिद्धांतों का उल्लंघन है। सेक्शन 313 CrPC केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक अहम सुरक्षा उपाय है, जो यह सुनिश्चित करता है कि आरोपी हर उस परिस्थिति पर अपनी बात रख सके, जो उसके खिलाफ जाती है। अगर कोई फॉरेंसिक रिपोर्ट बाद में सामने आती है, तो आरोपी को दोबारा बुलाकर उसका बयान लेना जरूरी है।
फैसले का एक और अहम पहलू यह है कि स्वीकार्यता और साक्ष्य की वास्तविक अहमियत (evidentiary value) एक जैसी नहीं होती। फॉरेंसिक लैब केवल दिए गए सैंपल की जांच करती है, लेकिन यह नहीं बता सकती कि सैंपल सही तरीके से इकट्ठा किया गया था या नहीं, उसे सुरक्षित रखा गया था या नहीं, या उसका अपराध से सीधा संबंध है या नहीं। इन सभी तथ्यों को अभियोजन पक्ष को स्वतंत्र रूप से साबित करना होता है।
इस मामले में अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा। सैंपल की चेन ऑफ कस्टडी स्थापित नहीं की गई, सैंपल लेने वाले अधिकारी को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया और जब्त किए गए सामान को अदालत में ठीक से प्रस्तुत या पहचान नहीं कराया गया। नतीजतन, हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद होने के बावजूद इन फॉरेंसिक रिपोर्टों की कोई वास्तविक कानूनी अहमियत नहीं रह जाती—उन्हें “बेकार कागज” के समान माना जा सकता है।
सेशन जजों के लिए इस फैसले से स्पष्ट संदेश मिलता है कि फॉरेंसिक साक्ष्यों पर भरोसा करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि साक्ष्य सही तरीके से जुटाए गए हों, उनकी चेन ऑफ कस्टडी सुरक्षित हो और उनका आरोपी से स्पष्ट संबंध स्थापित हो। इसके साथ ही आरोपी को हर साक्ष्य पर अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
फैसले में यह भी चेतावनी दी गई है कि जल्दबाजी में ट्रायल पूरा करना उचित नहीं है। त्वरित न्याय महत्वपूर्ण है, लेकिन निष्पक्षता और साक्ष्य की विश्वसनीयता की कीमत पर नहीं, खासकर उन मामलों में जहां सजा बेहद कठोर हो सकती है।
अंततः यह फैसला आपराधिक न्याय प्रणाली के एक बुनियादी सिद्धांत को दोहराता है—फॉरेंसिक विज्ञान तभी मजबूत साक्ष्य बनता है, जब उसकी कानूनी नींव ठोस हो। फॉरेंसिक रिपोर्ट कोई शॉर्टकट नहीं है, बल्कि एक ऐसा साक्ष्य है जिसे सावधानी से परखा, सही तरीके से साबित और निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत किया जाना जरूरी है।




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