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फॉरेंसिक पत्रकारिता: जर्नलिज़्म में जासूसी की शुरुआत

हर दिन पत्रकारों को ऐसे सवालों से जूझना पड़ता है जो कभी आसान होते हैं, तो कभी बेहद जटिल या दिमाग घुमा देने वाले। पहले पत्रकार वही कहानी सुनाते थे जो उन्होंने देखा या सुना होता था। लेकिन आज के समय में फेक न्यूज और डीपफेक की बाढ़ के कारण केवल तथ्यों को पेश करना काफी नहीं है। एक अच्छे पत्रकार को अब एक जासूस की तरह सोचना होगा – सतह के नीचे छिपे सच को उजागर करना होगा। यही है फॉरेंसिक पत्रकारिता की असली पहचान।

फॉरेंसिक पत्रकारिता क्या है?
मान लीजिए आपको एक जिगसॉ पजल दिया गया है, लेकिन उसके आधे टुकड़े गायब हैं और कुछ गलत रंग में रंगे हुए हैं। फॉरेंसिक पत्रकार ऐसे ही अधूरी और गलत जानकारी से जुड़ी खबरों को जोड़ते हैं। वे नए तथ्य खोजते हैं, उनकी पुष्टि करते हैं और यह भी पता लगाने की कोशिश करते हैं कि अगर कोई धोखाधड़ी हुई है तो उसके पीछे कौन था।

असल में, वे विज्ञान, तकनीक और तेज़ जांच क्षमताओं की मदद से यह समझने की कोशिश करते हैं कि असल में हुआ क्या था।

फॉरेंसिक पत्रकार किन उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं?
जिस तरह शेरलॉक होम्स अपनी आवर्धक शीशे और पाइप के बिना अधूरा था, वैसे ही फॉरेंसिक पत्रकार कुछ खास उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं:

डिजिटल फॉरेंसिक: वे यह पता लगाते हैं कि कोई वायरल तस्वीर या वीडियो असल में कहां से आया।

ऑडियो-वीडियो विश्लेषण: वे ऑडियो और वीडियो में किसी भी तरह की गड़बड़ी या छेड़छाड़ की जांच करते हैं।

कानूनी ज्ञान: उन्हें मीडिया कानून और नैतिकता की जानकारी होती है, इसलिए ज़रूरत पड़ने पर उनके सबूत कोर्ट में भी मान्य होते हैं।

तथ्य जांच (फैक्ट-चेकिंग): वे हर सूचना की पुष्टि करते हैं ताकि कोई भी जानकारी बिना प्रमाण के न मानी जाए।

भारत में फॉरेंसिक पत्रकारिता क्यों बढ़ रही है?
भारत में डिजिटल दुनिया का तेजी से विस्तार हो रहा है, लेकिन इसके साथ ही फेक न्यूज भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है। हर दिन सोशल मीडिया पर सच्ची और झूठी दोनों तरह की खबरें तेज़ी से फैलती हैं। ऐसे में आम लोगों के लिए असली और नकली में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।

यहीं पर फॉरेंसिक पत्रकारिता सच्चाई की एक कसौटी बनकर सामने आती है। यह निर्दोषों को गलत खबरों के जाल से बचाती है और पुलिस को अपराध सुलझाने में मदद करती है।

उदाहरण के लिए, जब कोई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है, तो एक फॉरेंसिक पत्रकार उसे आगे बढ़ाने से पहले उसकी पूरी जांच करता है – ऑडियो में कोई बदलाव है या नहीं, वीडियो किस जगह और समय का है आदि। सारी जांच के बाद ही वह खबर प्रकाशित होती है।

अगर आप बनना चाहते हैं न्यूज़रूम के शेरलॉक
अगर पहेलियाँ सुलझाना आपको रोमांचित करता है और आप समाज पर असर डालना चाहते हैं, तो फॉरेंसिक पत्रकारिता आपके लिए एक शानदार करियर हो सकता है। नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज़ यूनिवर्सिटी (NFSU) और JECRC जैसे कुछ निजी विश्वविद्यालय अब ऐसे कोर्स प्रदान कर रहे हैं जो पत्रकारिता और फॉरेंसिक साइंस के बीच की खाई को पाटते हैं। ये कोर्स आपको झूठी खबरें पकड़ना, स्रोतों की विश्वसनीयता जांचना और नई तकनीक का इस्तेमाल करना सिखाते हैं।

भविष्य है उज्ज्वल – अगर आप हैं एक खोजी पत्रकार
फॉरेंसिक पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है – ईमानदारी की उस दुनिया में जहां हर सेकंड हजारों झूठ फैल रहे हों। कुशल फॉरेंसिक पत्रकारों की मांग बढ़ रही है।

तो अगर आप पत्रकारिता में एक जासूस की भूमिका निभाने को तैयार हैं, तो यही सही समय है। रहस्य तो चारों ओर बिखरे पड़े हैं – क्या आप उन्हें सुलझाने वाले बनेंगे?

अगर हाँ, तो करियर काउंसलिंग के लिए हमसे संपर्क करें या GMCET देकर अपने करियर की शुरुआत करें।

Asmita Sarkar

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