
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तेजी से आधुनिक पत्रकारिता का हिस्सा बनता जा रहा है, लेकिन अमेरिका के कई विश्वविद्यालय अब भी इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं हैं कि भविष्य के पत्रकारों को कक्षाओं में AI का इस्तेमाल कैसे करना चाहिए। यूनिवर्सिटी ऑफ कंसास की नई रिसर्च में यह बात सामने आई है।
अध्ययन के अनुसार, अलग-अलग पत्रकारिता संस्थान AI को लेकर अलग और कई बार एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत नीतियां अपना रहे हैं। कुछ संस्थान AI को अकादमिक ईमानदारी के लिए खतरा मानते हैं, जबकि कुछ सीमित और नियंत्रित उपयोग की अनुमति देते हैं। वहीं कई संस्थान इसे एक बड़े नैतिक और पेशेवर मुद्दे के रूप में पढ़ा रहे हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस असंगति के कारण छात्र यह समझने में उलझन महसूस कर सकते हैं कि मीडिया इंडस्ट्री में AI के इस्तेमाल को लेकर वास्तविक पेशेवर अपेक्षाएं क्या हैं।
अमेरिका की पत्रकारिता कक्षाओं का किया गया विश्लेषण
इस रिसर्च में अमेरिका की 15 यूनिवर्सिटीज के 60 पत्रकारिता कोर्स सिलेबस का अध्ययन किया गया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि पत्रकारिता शिक्षा में AI को किस तरह शामिल किया जा रहा है।
अध्ययन में तीन प्रमुख दृष्टिकोण सामने आए:
– AI को सीखने और पेशेवर ईमानदारी के लिए खतरा मानना
– AI को सीमित नियमों के तहत उपयोगी टूल के रूप में स्वीकार करना
– AI को नैतिक और पेशेवर चर्चा के विषय के रूप में पढ़ाना
यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ कंसास के डॉक्टोरल शोधकर्ता सैमुअल मुझिंगी ने एलिसा एपलमैन, टैमर विल्नर और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के होंग टियेन वू के साथ मिलकर किया।
रिसर्च के निष्कर्ष अकादमिक जर्नल Journalism & Mass Communication Educator में प्रकाशित किए गए हैं।
छात्रों को मिल रहे हैं अलग-अलग संदेश
शोधकर्ताओं के अनुसार, सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई बार एक ही विश्वविद्यालय के भीतर अलग-अलग प्रोफेसर AI को लेकर पूरी तरह अलग नियम अपना रहे हैं।
मुझिंगी के अनुसार, कुछ शिक्षक AI टूल्स के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाते हैं, जबकि कुछ सीमित उपयोग की अनुमति देते हैं या उसे प्रोत्साहित भी करते हैं। इससे छात्रों के बीच यह भ्रम पैदा हो रहा है कि उन्हें किस दिशा का पालन करना चाहिए।
उन्होंने कहा, “छात्रों के मन में सवाल होता है कि आखिर किस प्रोफेसर या किस क्लास की बात को ज्यादा सही माना जाए?”
शोधकर्ताओं का मानना है कि तेजी से बदलती तकनीक के बीच साझा संस्थागत दिशा-निर्देशों की कमी छात्रों को नुकसान पहुंचा सकती है।
राइटिंग कोर्स में AI को लेकर ज्यादा सख्ती
अध्ययन में यह भी सामने आया कि अलग-अलग पत्रकारिता विषयों में AI को लेकर अलग दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है।
राइटिंग आधारित कोर्स सबसे ज्यादा सख्त दिखाई दिए। इनमें AI को सीखने के लिए खतरा माना गया और कई जगह इसके इस्तेमाल को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया।
शोधकर्ताओं का कहना है कि पत्रकारिता की बुनियादी ताकत स्वतंत्र लेखन क्षमता मानी जाती है, इसलिए शिक्षक चाहते हैं कि छात्र खुद लिखने की आदत विकसित करें।
कई सिलेबस में यह स्पष्ट चेतावनी दी गई कि बिना जानकारी दिए AI द्वारा तैयार सामग्री जमा करना प्लेजरिज्म या अकादमिक बेईमानी माना जा सकता है।
वहीं डिजाइन और फोटोग्राफी कोर्स में सीमित AI उपयोग को शिक्षक की अनुमति के साथ स्वीकार किया गया।
मीडिया एथिक्स और लॉ से जुड़े कोर्स में AI को एक चर्चा और विश्लेषण के विषय के रूप में पढ़ाया गया, न कि केवल एक टूल के रूप में।
AI को टूल माना गया, लेखक नहीं
कई कोर्स छात्रों को ग्रामर सुधार, स्पेलिंग सहायता और आइडिया ब्रेनस्टॉर्मिंग जैसे कामों के लिए AI इस्तेमाल करने की अनुमति देते हैं, लेकिन पूरी तरह AI से तैयार लेखन पर रोक लगाते हैं।
साथ ही शिक्षकों ने छात्रों को AI hallucination, गलत जानकारी, तथ्यात्मक त्रुटियों और सिस्टम में मौजूद बायस जैसे जोखिमों के बारे में भी चेतावनी दी।
कुछ सिलेबस में छात्रों को असाइनमेंट में AI इस्तेमाल करने से पहले शिक्षक की अनुमति लेना भी जरूरी बताया गया।
शोधकर्ताओं के अनुसार, ये अलग-अलग नियम पत्रकारिता इंडस्ट्री में चल रही व्यापक अनिश्चितता को दर्शाते हैं, क्योंकि न्यूज संस्थान भी अभी AI के सही उपयोग को लेकर स्पष्ट रणनीति तैयार कर रहे हैं।
पत्रकारिता शिक्षकों के सामने बड़ी चुनौती
यूनिवर्सिटी ऑफ कंसास में पत्रकारिता और मास कम्युनिकेशन की एसोसिएट प्रोफेसर एलिसा एपलमैन का कहना है कि शिक्षक फिलहाल सावधानी और प्रोफेशनल तैयारी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
पत्रकारिता संस्थानों पर एक तरफ पारंपरिक रिपोर्टिंग और लेखन मानकों को बनाए रखने का दबाव है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें छात्रों को AI आधारित भविष्य के कार्यस्थलों के लिए भी तैयार करना है।
मुझिंगी ने कहा, “भले ही मुझे AI टूल्स को लेकर कुछ चिंताएं हों, लेकिन एक शिक्षक के रूप में मेरी जिम्मेदारी है कि मैं छात्रों को इनके उपयोग को समझने और आलोचनात्मक रूप से परखने में मदद करूं।”
स्पष्ट दिशानिर्देशों की बढ़ी मांग
अध्ययन के अंत में शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि पत्रकारिता संस्थानों को AI उपयोग को लेकर ज्यादा स्पष्ट और समान नीतियां बनानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि Association for Education in Journalism and Mass Communication जैसी संस्थाएं साझा फ्रेमवर्क और बेहतर दिशानिर्देश तैयार करने में मदद कर सकती हैं।
एलिसा एपलमैन का कहना है कि अब शिक्षक यह मानकर नहीं चल सकते कि छात्रों को पहले से AI की सीमाओं और सही उपयोग की समझ है, क्योंकि हर कोर्स में अलग-अलग नियम लागू हैं।
उन्होंने कहा, “इस अध्ययन से सबसे बड़ी सीख यह मिली कि शिक्षकों के लिए अपनी अपेक्षाओं को स्पष्ट करना बेहद जरूरी है।”
शोधकर्ता आगे यह भी अध्ययन करेंगे कि जब छात्रों को स्पष्ट नैतिक दिशानिर्देश दिए जाते हैं, तब वे AI टूल्स का इस्तेमाल किस तरह करते हैं, और जब नियम अस्पष्ट होते हैं तब उनका व्यवहार कैसे बदलता है।
दुनियाभर के न्यूजरूम में AI रिपोर्टिंग, एडिटिंग, रिसर्च और कंटेंट प्रोडक्शन को तेजी से बदल रहा है। ऐसे में यह अध्ययन संकेत देता है कि पत्रकारिता शिक्षा अब पिछले कई दशकों के सबसे बड़े बदलाव के दौर में प्रवेश कर रही है।




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