
– कनिष्का
भारत की महिलाएं आज विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित यानी STEM के क्षेत्र में एक नया इतिहास लिख रही हैं। वे चुपचाप लेकिन बेहद साहसिक ढंग से उस पारंपरिक ‘बहू-नोमिक’ संस्कृति को तोड़ रही हैं, जिसने उन्हें सदियों से घर की चारदीवारी, विवाह और मातृत्व तक सीमित कर दिया था। आज भारतीय महिलाएं इन दीवारों को गिरा रही हैं और खासकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसे उन्नत क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति से साबित कर रही हैं कि प्रतिभा किसी लिंग की मोहताज नहीं होती।
“बहू-नोमिक” सोच: परंपरा की जंजीरें
‘बहू-नोमिक’ शब्द ‘बहू’ और ‘इकोनॉमिक’ के मेल से बना है। यह शब्द आज सोशल मीडिया पर उस वास्तविकता को दर्शाता है जिसमें शादीशुदा महिलाओं की मेहनत को “बिना वेतन वाले श्रम” के रूप में देखा जाता है। परंपरागत भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका को घर तक सीमित रखा गया — जल्दी विवाह, घर संभालना और परिवार की सेवा को ही उनका लक्ष्य माना गया। शिक्षा भी सिर्फ उतनी दी जाती थी, जितनी एक गृहिणी या शिक्षिका के लिए आवश्यक समझी जाती थी।
लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, महिलाओं से अपेक्षाएं भी बदल गईं। अब उनसे न सिर्फ परिवार संभालने बल्कि घर की आर्थिक ज़िम्मेदारी उठाने की भी उम्मीद की जाती है। पहले जहां महिलाओं पर दहेज का बोझ था, वहीं अब उन पर घर, दफ्तर, बच्चों और यहां तक कि बिजली बिल और ईएमआई बांटने का दबाव है। यह “दोहरी जिम्मेदारी” आधुनिक बहू-नोमिक सोच का परिणाम है — जहां महिलाएं कमाने वाली भी हैं और देखभाल करने वाली भी।
सामाजिक बदलाव और शिक्षा में अंतर
भारत में महिलाओं की स्थिति पर विदेशी आक्रमणों और सांस्कृतिक बदलावों का भी असर पड़ा। इससे एक गहरी सामाजिक संरचना बनी जिसने महिला शिक्षा और रोजगार में बड़ा अंतर पैदा किया, खासकर इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी जैसे पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में। विज्ञान और तकनीक में कदम रखने वाली महिलाएं अक्सर उपेक्षा का शिकार रहीं, उन्हें न तो प्रोत्साहन मिला और न ही संस्थागत समर्थन।
STEM में बढ़ती महिलाएं: नई दिशा की ओर
आज भारत की स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, देश में 43% STEM स्नातक महिलाएं हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक प्रतिशतों में से एक है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों की लड़कियां अब विज्ञान और गणित जैसे विषयों में आगे आ रही हैं। यह बदलाव सरकारी योजनाओं, छात्रवृत्तियों और माता-पिता की बदली सोच से संभव हुआ है।
हालांकि, एक सच्चाई यह भी है कि इनमें से केवल 27% महिलाएं ही STEM सेक्टर में नौकरी पा रही हैं। इसके पीछे कार्यस्थल पर भेदभाव, विवाह और मातृत्व का दबाव, कठोर कार्य संस्कृति और वही पुरानी बहू-नोमिक मानसिकता है, जो महिला से उम्मीद करती है कि वह सब कुछ संभाले — घर भी और नौकरी भी।
लेकिन भारतीय महिलाएं अब इन सीमाओं को चुनौती दे रही हैं। वे अपनी ताकत और इच्छाशक्ति के बल पर AI, रोबोटिक्स, बायोटेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में नया मुकाम बना रही हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता में महिलाओं की बढ़ती भूमिका
भारत का भविष्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI पर आधारित है, और इस क्षेत्र में महिलाएं अब अहम योगदान दे रही हैं। पहले जहां यह क्षेत्र पूरी तरह पुरुषों के वर्चस्व में था, अब महिलाएं शीर्ष पदों पर पहुंच रही हैं, नए एल्गोरिद्म विकसित कर रही हैं और ऐसे स्टार्टअप्स चला रही हैं जो समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान दे रहे हैं — जैसे स्वास्थ्य जांच, भाषा अनुवाद और रोजगार सृजन।
इन महिलाओं का योगदान केवल तकनीकी नहीं बल्कि मानवीय भी है। वे AI की नैतिकता और नीतियों को अधिक समावेशी और संवेदनशील दृष्टिकोण से आकार दे रही हैं।
शिक्षा, नीति और अवसर: पाइपलाइन को जोड़ना
महिलाओं की STEM भागीदारी बढ़ाने के लिए देशभर में विश्वविद्यालयों, उद्योगों और सरकार ने मिलकर विशेष शिक्षा कार्यक्रम शुरू किए हैं। AI, मशीन लर्निंग और डेटा साइंस जैसे विषयों में अब अधिक महिलाएं दाखिला ले रही हैं। इन पहलों का मकसद है “लीकी पाइपलाइन” को बंद करना — यानी STEM शिक्षा के बाद करियर में महिलाओं की घटती संख्या को रोकना।
संगठनिक बदलाव: लैंगिक अंतर मिटाने की पहल
कई संस्थान अब महिलाओं के लिए लचीले कार्य घंटे, बेहतर मातृत्व अवकाश, सुरक्षित कार्यस्थल और मेंटॉरशिप प्रोग्राम्स लागू कर रहे हैं। समाज स्तर पर भी लैंगिक रूढ़ियों को चुनौती दी जा रही है। शिक्षा में प्रयोग आधारित STEM लर्निंग को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि लड़कियां भी समान भागीदारी निभा सकें। सरकारी योजनाएं जैसे अटल इनोवेशन मिशन और राष्ट्रीय अविष्कार अभियान इस दिशा में ठोस कदम हैं।
महिला वैज्ञानिकों का उभार: नई प्रेरणा
STEM में महिलाओं का बढ़ता योगदान केवल पेशेवर नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का प्रतीक है। ये महिलाएं “बहू-नोमिक” सोच को तोड़ते हुए महिला सशक्तिकरण की नई परिभाषा गढ़ रही हैं — जहां महिला का अर्थ है बुद्धिमत्ता, आत्मनिर्भरता और महत्वाकांक्षा।
वे अपने समुदायों के लिए रोल मॉडल बन रही हैं, परिवारों को बेटियों की शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक कर रही हैं और नई पीढ़ी को यह सिखा रही हैं कि सपने किसी लिंग पर निर्भर नहीं होते। उनकी उपलब्धियां यह साबित करती हैं कि विविधता नवाचार को बढ़ाती है, और लैंगिक समानता केवल नैतिक मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय विकास की रणनीति है।
STEM से आगे: आर्थिक स्वतंत्रता की ओर
अब महिलाएं केवल विज्ञान या तकनीक तक सीमित नहीं हैं। वे व्यवसाय, उद्यमिता और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी अपना प्रभुत्व स्थापित कर रही हैं। जहां पहले घर का काम “बिना मूल्य का श्रम” माना जाता था, वहीं अब महिलाएं अपने योगदान को मान्यता और उचित पारिश्रमिक दिलाने की दिशा में काम कर रही हैं।
यह बदलाव न सिर्फ पुरानी धारणाओं को तोड़ रहा है, बल्कि महिलाओं के श्रम के मूल्य को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। अब महिलाएं भुगतान वाले करियर और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाकर समान अवसर और समान सम्मान की दिशा में समाज को आगे बढ़ा रही हैं।
“बहू-नोमिक” से “बायस-फोबिक” समाज तक
भारत अब उस निर्णायक दौर में है जहां वह STEM के क्षेत्र में लैंगिक समानता की ओर बढ़ रहा है। भले ही समाज के कुछ हिस्से अभी भी पुरानी परंपराओं से जकड़े हुए हैं, लेकिन भारतीय महिलाएं विज्ञान, इंजीनियरिंग और तकनीक में अपनी जगह बना कर उस सोच को बदल रही हैं।
वे न सिर्फ लैब में प्रयोग कर रही हैं बल्कि भारत का तकनीकी भविष्य गढ़ रही हैं। यह परिवर्तन यह दर्शाता है कि महिलाओं का सशक्तिकरण अब समानता का नहीं, बल्कि विकास का प्रश्न बन चुका है।
जैसे-जैसे महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, प्रेरणा दे रही हैं और नेतृत्व कर रही हैं — वे पुरानी सीमाओं को तोड़कर एक नया भारत बना रही हैं, जहां हर महिला बड़े सपने देख सके और उससे भी बड़ा हासिल कर सके।
About the author:
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Kanishka, a versatile content writer and acclaimed poetess from Jabalpur, Madhya Pradesh, combines her passion for creativity with a strong commitment to education. Beyond crafting compelling narratives, she is dedicated to enlightening readers by sharing insights and knowledge they often don’t encounter elsewhere. She has been featured in several national and international online magazines, and anthologies. Her talent and dedication to literature have earned her two national records— one for composing the longest reverse poem and another for compiling an all-female anthology that celebrates women’s voices. Her love for storytelling, philosophies, and mythologies fuels her mission to inspire and educate, shaping minds through the power of words and knowledge. |
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