
केंद्र सरकार ने बजट 2026 में शिक्षा को लेकर जो संकेत दिए हैं, वे यह साफ करते हैं कि अब इस क्षेत्र को हाशिये पर रखने का दौर खत्म हो रहा है। शिक्षा बजट को 1.28 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1.39 लाख करोड़ रुपये करना केवल आंकड़ों की बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि यह उस सोच का प्रतीक है, जिसमें देश की मजबूती की नींव शिक्षा को माना जा रहा है। करीब 11 हजार करोड़ रुपये की सीधी बढ़ोतरी यह बताती है कि सरकार मानती है—अगर भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनना है, तो इसकी शुरुआत क्लासरूम से ही होगी।
इस बजट का एक सकारात्मक पहलू यह है कि सरकार की सोच अब केवल किताबी पढ़ाई तक सीमित नहीं रही। स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा, डिजिटल क्लासरूम, स्किल डेवलपमेंट, रिसर्च और नई शिक्षा नीति तक, हर स्तर पर सुधार की बात की जा रही है। खास तौर पर स्किल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेक्नोलॉजी और जॉब-रेडी छात्रों पर दिया गया जोर इस बात का संकेत है कि शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की कोशिश हो रही है। यह बदलाव समय की मांग भी है, क्योंकि आज की अर्थव्यवस्था डिग्री से ज्यादा कौशल को महत्व देती है।
हालांकि, जब भारत के शिक्षा बजट की तुलना वैश्विक स्तर पर की जाती है, तो तस्वीर थोड़ी जटिल नजर आती है। अमेरिका का शिक्षा बजट करीब 82.4 बिलियन डॉलर, यानी लगभग 7.5 लाख करोड़ रुपये है। यह भारत के मौजूदा बजट से कई गुना अधिक है। अमेरिका शिक्षा, रिसर्च, शिक्षक प्रशिक्षण और एडवांस टेक्नोलॉजी पर खुलकर निवेश करता है, जिसका नतीजा यह है कि वहां की यूनिवर्सिटीज—MIT, हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड—दुनिया में अग्रणी बनी हुई हैं। साफ है कि बड़े निवेश का सीधा असर गुणवत्ता पर पड़ता है।
चीन का उदाहरण भी दिलचस्प है। वहां का शिक्षा बजट भारत के आसपास ही बताया जाता है, लेकिन फर्क प्राथमिकताओं का है। चीन स्किल और वोकेशनल एजुकेशन पर ज्यादा ध्यान देता है और योजनाबद्ध तरीके से बजट का इस्तेमाल करता है। यही वजह है कि मैन्युफैक्चरिंग और तकनीकी कौशल में चीन आज वैश्विक ताकत बना हुआ है। रूस का शिक्षा बजट भारत से अधिक है और वहां प्रति छात्र खर्च भी ज्यादा है, क्योंकि आबादी कम है। इसका असर यह है कि रूस विज्ञान और तकनीक जैसे क्षेत्रों में आज भी मजबूत स्थिति में है।
दक्षिण एशिया की बात करें तो भारत और पाकिस्तान के बीच का अंतर साफ दिखता है। जहां भारत शिक्षा पर लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहा है, वहीं पाकिस्तान का शिक्षा बजट महज कुछ हजार करोड़ रुपये तक सीमित है। यह तुलना दिखाती है कि भारत इस क्षेत्र में अपने पड़ोसियों से काफी आगे है, लेकिन केवल आगे होना ही पर्याप्त नहीं है।
असल सवाल यह है कि बढ़े हुए बजट का इस्तेमाल कैसे किया जाएगा। अगर यह पैसा केवल इमारतों, घोषणाओं और कागजी योजनाओं तक सीमित रह गया, तो इसका असर जमीन पर कम दिखेगा। जरूरत इस बात की है कि स्कूलों की गुणवत्ता सुधरे, शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण मिले, रिसर्च को वास्तविक समर्थन मिले और छात्रों को ऐसे कौशल मिलें, जो उन्हें रोजगार के काबिल बना सकें।
बजट 2026 ने शिक्षा के लिए एक सकारात्मक संदेश जरूर दिया है। अब चुनौती यह है कि इस बढ़े हुए खर्च को सही दिशा और प्रभावी क्रियान्वयन के साथ जोड़ा जाए। तभी शिक्षा सच में देश को मजबूत बनाने का आधार बन पाएगी, न कि सिर्फ बजट भाषणों का आकर्षक हिस्सा।




Add comment