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एडटेक स्टार्टअप्स दे रहे हैं भारत की शिक्षा को नया आयाम

भारत का शिक्षा क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में नवाचार का केंद्र बन चुका है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IMAI) की रिपोर्ट “इम्पैक्ट स्टडी ऑफ एडटेक्स इन इंडिया: ड्राइविंग इनोवेशन एंड क्रिएटिंग ऑपर्च्युनिटीज़” के अनुसार, भारत में लगभग 85% छात्र मानते हैं कि एडटेक प्लेटफॉर्म्स ने उनके सीखने के परिणामों में सुधार किया है।

शिक्षा क्षेत्र में एडटेक की मांग के पीछे प्रमुख कारणों में रोचक कंटेंट और उच्च गुणवत्ता वाली शैक्षणिक सामग्री शामिल हैं, लेकिन यही एकमात्र कारण नहीं हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के आगमन ने अधिकांश चर्चाओं को अपनी ओर मोड़ा है और शिक्षा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा।

इस बदलाव ने कई स्टार्टअप्स को आगे आने और समय का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया है।

AI की ताकत से सिविल सेवा की तैयारी
ऐसा ही एक स्टार्टअप है सुपरकलाम, जो सिविल सेवा परीक्षार्थियों के लिए एक AI-आधारित तैयारी प्लेटफॉर्म है।

सुपरकलाम के सह-संस्थापक विमल राठौर कहते हैं, “हम संदेह समाधान, एमसीक्यू मूल्यांकन और कंटेंट निर्माण के लिए इंसानों पर निर्भर नहीं हैं। इंसानों को प्रक्रिया से हटाकर हम सीखने के अनुभव को असीमित रूप से स्केलेबल बना रहे हैं।”

यह स्टार्टअप प्रति 1.7 लाख छात्रों पर एक शिक्षक की दर से व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्रदान करता है। भारत में लगभग 50 लाख छात्र सिविल सेवा परीक्षाओं में शामिल होते हैं और जून 2024 में सेवाओं को मॉनेटाइज करने के बावजूद सुपरकलाम में पंजीकरण बढ़ते जा रहे हैं।

कम सरकारी फंडिंग में अवसर तलाशते स्टार्टअप्स
भारत में एडटेक स्टार्टअप्स कम सरकारी शिक्षा बजट के बीच भी फल-फूल रहे हैं। PRS Legislative Research के अनुसार, केंद्र सरकार की शिक्षा क्षेत्र के लिए बजट आवंटन में लगातार गिरावट आई है, हालांकि 2023-24 में मामूली सुधार देखा गया।

जहां सरकारी खर्च स्थिर है, वहीं शिक्षकों की गुणवत्ता भी चिंता का विषय बन गई है। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, 2023-24 में प्री-प्राइमरी स्तर पर 48% शिक्षक अयोग्य हैं, जबकि प्राथमिक से माध्यमिक स्तर के 12% शिक्षकों के पास पेशेवर प्रशिक्षण नहीं है। अधिकांश एडटेक प्लेटफॉर्म कौशलवृद्धि पर केंद्रित हैं, लेकिन यह स्थिति शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की मांग कर रही है।

हालांकि सरकार ने उच्च शिक्षा संस्थानों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर ध्यान दिया है, लेकिन प्राथमिक शिक्षा, जो छात्रों की नींव है, पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया। महामारी ने K-12 शिक्षा की स्थिति को और खराब कर दिया।

भांजु: गणित में उत्कृष्टता की ओर कदम
तेलंगाना सरकार की पहल के रूप में शुरू हुआ भांजु नामक स्टार्टअप, महामारी के दौरान उभरा और अब 5 से 12 वर्ष के बच्चों की गणितीय क्षमताएं निखारने पर केंद्रित है।

भांजु के सह-संस्थापक नीलकंठ भानु कहते हैं, “हम अपनी विशेष शिक्षण पद्धति के माध्यम से बुनियादी गणित सिखाते हैं, जिससे बच्चों की अंकगणितीय गति 4 गुना बढ़ जाती है, जिससे वे स्कूल में बेहतर प्रदर्शन करते हैं और गणित का व्यवहारिक उपयोग कर पाते हैं।”

भानु के अनुसार, आज भांजु के पास 55,000 सक्रिय छात्र हैं, जिनमें से लगभग 40% अमेरिका, यूके और मध्य-पूर्व से हैं। वे कहते हैं, “ऑनलाइन शिक्षा भी उतनी ही प्रभावी है जितनी ऑफलाइन। अलग-अलग देशों के बच्चों के बीच संवाद संभव होता है, जो पारंपरिक कक्षाओं में नहीं हो पाता।”

व्यक्तिगत शिक्षण अनुभव की मांग
एडटेक स्टार्टअप्स का उभार इस बात का संकेत है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी एक बड़ी चुनौती है।

विमल राठौर, जो पहले भी शिक्षा क्षेत्र से जुड़े स्टार्टअप्स में काम कर चुके हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों की जरूरतों को समझते हैं। इसी से सुपरकलाम की व्यक्तिगत मार्गदर्शन और मासिक लक्ष्यों पर केंद्रित योजना की नींव रखी गई।

सुपरकलाम ने प्रत्येक उपयोगकर्ता के लिए एक “नज-आधारित प्रणाली” विकसित की है। हैरानी की बात यह है कि यह पूरी AI-आधारित प्रणाली केवल कुछ लोगों की टीम ने तैयार की है। प्लेटफॉर्म पर दो ही शिक्षक हैं – राठौर और अर्पिता शर्मा।

अर्पिता कहती हैं, “मैं छात्रों को उनके दैनिक लक्ष्यों को निर्धारित करने, अनुशासित रहने और ध्यान भटकाने वाले कारकों से बचने में मार्गदर्शन देती हूं। साथ ही मानसिक और भावनात्मक समर्थन भी प्रदान करती हूं।”

Y Combinator जैसे निवेशकों ने सुपरकलाम पर भरोसा जताया है। Sparrow Capital के सह-संस्थापक यश जैन कहते हैं, “अगर सुपरकलाम पारंपरिक ऑफलाइन मॉडल में होता, तो लाभप्रदता मुश्किल होती। लेकिन एक तकनीकी प्लेटफॉर्म के रूप में, इसके पास लागत लाभ हैं। हमारी ग्रोथ के मुकाबले खर्च बेहद कम रहा है।”

शिक्षा को सुलभ बनाना
2023-24 में भारत में माध्यमिक शिक्षा छोड़ने की दर 10.2% रही, जो वर्तमान शिक्षा प्रणाली के तहत 26% छात्रों को प्रभावित करती है।

इस साल के केंद्रीय बजट में शिक्षा पर अनुमानित खर्च को 12.5% बढ़ाकर ₹1.28 लाख करोड़ किया गया है। लेकिन PRS के आंकड़ों के अनुसार, 2015-16 में 19% हिस्सेदारी के मुकाबले अब शिक्षा बजट का हिस्सा घटा है। शिक्षा एक समवर्ती विषय है, जिसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल जरूरी है।

समग्र शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रम, जो प्री-स्कूल से कक्षा 12 तक के लिए फंडिंग प्रदान करते हैं, मुख्यतः राज्य सरकारों पर निर्भर करते हैं। लेकिन संसद में दिए गए हालिया उत्तर के अनुसार, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल को केंद्र से कोई फंड नहीं मिला।

हालांकि महामारी ने शिक्षा में असमानता बढ़ाई, लेकिन सुपरकलाम की AI सेवाएं और भांजु की पहलें इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय नवाचार तकनीक के माध्यम से शिक्षा को अधिक सुलभ और प्रभावी बना सकते हैं।

Asmita Sarkar

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