
कोटा अब किसी परिचय का मोहताज नहीं है। कोटा ख्यात हो चुका है। कोचिंग के लिए। और एक कत्लगाह के रूप में भी। सपनों के कत्लगाह के रूप में। लाखों लाख छात्र हर साल यहां इंजीनियर और डॉक्टर बनने का ख्वाब लिए नीट और जेईई की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने आते हैं। कुछ के ख्वाब पूरे होते हैं तो कइयों के ख्वाब चकनाचूर हो जाते हैं। ख्वाबों के बिखरने के इस अंदेशे से हर साल कई छात्र दुनिया से दूर भी चले जाते हैं। लेकिन फिर भी किसी को कोई फिक्र नहीं होती। किसी छात्र की खुदकुशी की खबरें अखबारों-मीडिया में आती हैं, कुछ मातमपुर्सी होती है और फिर सब सामान्य। ओटीटी पर ‘कोटा फैक्ट्री’ नामक फेमस सीरीज कोटा के इसी सच को उद्घाटित करता है। अब तक इसके दो सीजन आ चुके हैं और दोनों को ही दर्शकों की खूब सराहना मिली। लोगों को लगा कि कोई तो है जो एक महत्वपूर्ण सवाल को संबोधित कर रहा है। वर्ना छात्रों के सपनों के सहारे कमाई करने वाले संस्थान तो फैक्टरी में तब्दील हो चुके हैं।
बहरहाल नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘कोटा फैक्ट्री’ के सीजन 3 का ट्रेलर रिलीज हो चुका है और 20 जून को यह रिलीज होने वाला है। यंग आॅडियंस के लिए बढ़िया कंटेंट बनाने वाले टीवीएफ की इस सीरीज में शुरू से ही कोटा में पढ़ाई करने वाले बच्चों का स्ट्रगल देखने को मिला है। अब नए सीजन के साथ जीतू भैया (जितेंद्र कुमार) के किरदार को भी बच्चों के साथ स्ट्रगल करते देखा जाएगा। जाहिर है यह संघर्ष फैक्टरी में बदल गए कोटा की काली तस्वीर को उजागर करेगा। यूं ही नहीं इसके ट्रेलर में कहा गया है- ‘कोटा फैक्ट्री बन चुका है।’
ट्रेलर की शुरूआत जीतू भैया के इंटरव्यू से होती है। ‘जीत की तैयारी’ नाम के पॉडकास्ट शो पर जीतू भैया बच्चों के सेलेक्शन को लेकर बात कर रहे हैं। शो में वह मोड़ आ गया है, जब वैभव (मयूर मोरे), बालमुकुंद उर्फ मीणा (रंजन राज), उदय (आलम खान) संग कोटा में आईआईटी की तैयारी कर रहे बच्चों का रिजल्ट आने वाला है और इसके बाद उन्हें प्लेसमेंट के लिए धक्के खाने हैं। इस बारे में बात करते हुए जीतू भैया कहते हैं कि ‘हमें सक्सेसफुल सेलेक्शन के साथ-साथ सक्सेसफुल प्रेपरेशन को भी सेलिब्रेट करना चाहिए। जीत की तैयारी नहीं, तैयारी ही जीत है भाई।’
स्वाभाविक है कि इन पंक्तियों के माध्यम से उन लाखों छात्रों के दुखों पर फाहे फेरने की कोशिश की गई है, जो कोटा आते हैं ढेर सारे अरमानों के साथ लेकिन मिलती है असफलता। तमाम तैयारियों के बावजूद। लेकिन क्या रैंक में आकर इंजीनियर, मेडिकल में प्रवेश ही सफलता है? नहीं, जी-जान से तैयारी करने वाले भी सफल हैं। यानी जीतू भैया बच्चों को एक बार फिर अपने अंदाज में मोटिवेट करने वाले हैं।
‘कोटा फैक्ट्री’ के सीजन 3 में दर्शकों के सामने कोटा का सच आने वाला है। जीतू भैया के मुंह से। और वह ये कि हम भूल जाते हैं कि आईआईटी-जी के ये एस्पिरेंट्स असल में सिर्फ 15-16 साल के बच्चे हैं। उनकी अपनी फीलिंग्स है, अपनी आदतें हैं, अपनी चाहतें हैं। वैभव के किरदार की फ्रस्ट्रेशन को आप देखेंगे, जो एडमिशन को लेकर परेशान है। बच्चों को इस सीजन में बड़ी मुश्किलों का सामना करना होगा। एजुकेशन सिस्टम के ‘टू फैक्टर आॅथेंटिकेशन’ को तोड़ते हुए उन्हें जी पास कर अपने और अपने मां-बाप के सपने को पूरा करना है। मीणा और उदय भी जीत की तैयारी में लगे हैं। देखना होगा कि फैक्ट्री बन चुके में कोटा में किसकी नैया पार होती है।
इस सीरीज में ‘पंचायत 3’ से सबका दिल जीत चुके सचिव जी एक बार फिर खासकर उन बच्चों और पैरेंट्स के लिए आंखें खोलने वाला है जो इस वक्त या आनेवाले समय में जेईई और नीट जैसी परीक्षा पास करने के लिए जी-तोड़ मेहनत किया करते हैं। देश में करोड़ों बच्चे जेईई और नीट का सपना संजोकर इसके लिए तैयारी में जुटते हैं और इनके लिए कोटा में मौजूद टॉप इंस्टिट्यूशंस किसी फैक्ट्री के तर्ज पर काम करते हैं। कहानी है उन्हीं स्टूडेंट्स को तैयारी कराने वाले जीतू भैया की जो वहां पहुंचने वाले स्टूडेंट्स के लिए बेहद खास हैं।
ट्रेलर को देखकर ही समझ में आ जाता है कि कोटा में बच्चों के कॉम्पिटिशन को लेकर इंस्टिट्यूशंस में भी किस तरह की मारामारी होती है। वहां हर आॅर्गेनाइजेशन स्टूडेंट्स की फैक्ट्री की तरह काम करते हैं, लेकिन जीतू भैया का पढ़ाने और बच्चों को डील करने का अंदाज अलग है। इसे लेकर उनपर सवाल भी उठते हैं, जिसका बहुत ही तगड़ा जवाब है उनके पास। उनसे पूछा जाता है कि इन बच्चों के लिए जीतू भैया क्यों? जीतू सर क्यों नहीं? तब जितेंद्र कोटा में आने वाले छात्रों के मेंटल स्टेटस को लेकर बातें करते हैं। वह कहते हैं, ‘मैम, क्या है कि कोटा में बच्चों के लिए सबकुछ होता है पर ये लोग सिर्फ जेईई करने वाले नहीं हैं। हमलोग भूल जाते हैं कि ये लोग 15-16 साल के बच्चे हैं। उनमें दुनियाभर की इनसिक्योरिटी है। अगर टीचर डांट दे तो बुरा मान जाते हैं। दोस्त ने कुछ कहा तो वह उनको बुरा लग जाता है। ये बच्चे हर चीज को सीरियसली लेते हैं। उनकी जिम्मेदारी लेना बहुत बड़ी बात है जो ‘जीतू सर’ नहीं संभाल पाएंगे।’
टेस्ट सीरीज की टेंशन, रैंक का प्रेशर लेकर बच्चों को तराशने वाला कोटा, बिल्कुल फैक्ट्री की तरह नजर आ रहा है। हालांकि, जीतू भैया की फिलॉसफी जरा हटकर है। उन्हें स्टूडेंट्स से मतलब है और वो अपने हर स्टूडेंट्स के साथ जीतू भैया बनकर लगातार मेहनत करते हैं जिनका एक ही फंडा है- सपना नहीं, लक्ष्य बोलो। सपना देखा जाता है और लक्ष्य अचीव किया जाता है।




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