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विदेश में पढ़ाई के लिए बदल रही छात्रों की पसंद, US-UK-Canada-Australia से आगे देख रहे छात्र

कई वर्षों तक विदेश में पढ़ाई का फैसला एक आसान गणित पर आधारित रहा है। छात्र ऐसे देश का चुनाव करते थे, जहां अच्छी यूनिवर्सिटी, पढ़ाई पूरी करने के बाद काम करने के बेहतर अवसर और रहने का खर्च उनकी क्षमता के भीतर हो। लेकिन 2026 में यह समीकरण तेजी से बदल रहा है।

अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे पारंपरिक चार बड़े शिक्षा केंद्रों में वीजा नियमों में सख्ती और बढ़ती महंगाई ने छात्रों को अपनी पसंद पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है। अब छात्र केवल यह नहीं देख रहे कि किस यूनिवर्सिटी में पढ़ना है, बल्कि यह भी देख रहे हैं कि किस देश और यहां तक कि किस महाद्वीप में पढ़ाई करना उनके लिए अधिक व्यावहारिक होगा।

Big Four देशों से दूरी बढ़ा रहे छात्र

अमेरिका ने 2024-25 में रिकॉर्ड 11.8 लाख अंतरराष्ट्रीय छात्रों की मेजबानी की। हालांकि, इसी अवधि में नए अंतरराष्ट्रीय छात्रों का नामांकन 7% घटा और ग्रेजुएट स्तर पर नामांकन में करीब 3% की गिरावट आई।

2025-26 सत्र में यह गिरावट और तेज हुई। नए अंतरराष्ट्रीय छात्रों के नामांकन में 17% और ग्रेजुएट छात्रों के नामांकन में 12% की कमी दर्ज की गई। जनवरी-मार्च 2026 के दौरान अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय मास्टर छात्रों का नामांकन 24% घट गया, जबकि नए अंतरराष्ट्रीय स्नातक छात्रों की संख्या में 20% की कमी आई।

कनाडा में गिरावट और ज्यादा रही। पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में नए अंतरराष्ट्रीय अंडरग्रेजुएट छात्रों की संख्या में 24% और नए अंतरराष्ट्रीय मास्टर छात्रों के नामांकन में 19% की गिरावट दर्ज की गई।

एक पहले किए गए सर्वेक्षण में कनाडा की यूनिवर्सिटियों पर इसका असर और स्पष्ट दिखाई दिया। करीब 82% कनाडाई यूनिवर्सिटियों ने अंडरग्रेजुएट छात्रों के नामांकन में कमी की जानकारी दी। औसतन यह गिरावट 36% रही। वहीं, 71% संस्थानों में पोस्टग्रेजुएट छात्रों की संख्या कम हुई और औसत गिरावट 35% रही।

ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया भी इस बदलाव से अछूते नहीं रहे। हालांकि, इन दोनों देशों में गिरावट मुख्य रूप से ग्रेजुएट स्तर पर देखने को मिली। 2026 के एक सर्वे के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया में अंतरराष्ट्रीय मास्टर छात्रों की संख्या 16% और ब्रिटेन में 15% कम हुई। इससे ब्रिटेन में मास्टर स्तर पर पहले दर्ज की गई मामूली वृद्धि का रुख भी बदल गया।

ब्रिटेन में नए अंतरराष्ट्रीय अंडरग्रेजुएट छात्रों के नामांकन में भी 11% की गिरावट दर्ज की गई।

छात्र Big Four देशों से क्यों दूर हो रहे हैं?

इस बदलाव के पीछे नीतिगत बदलाव और बढ़ता आर्थिक दबाव, दोनों प्रमुख कारण हैं। वर्ष 2026 में इन देशों ने वीजा और इमिग्रेशन नियमों में कई बदलाव किए हैं।

अमेरिका में लंबे समय से चली आ रही Duration of Status व्यवस्था को बदले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई है। इसके तहत छात्रों के रहने की अवधि को अधिक निश्चित अवधि से जोड़ने की व्यवस्था की जा रही है। पहले कुछ मामलों में यूनिवर्सिटी अधिकारी आंतरिक स्तर पर विस्तार को मंजूरी दे सकते थे, लेकिन अब ऐसे मामलों में इमिग्रेशन अधिकारियों के पास औपचारिक आवेदन की जरूरत पड़ सकती है।

अंडरग्रेजुएट छात्रों के लिए पहले साल में यूनिवर्सिटी ट्रांसफर और मेजर बदलना भी कठिन हुआ है। वहीं Curricular Practical Training (CPT) और Optional Practical Training (OPT) पर भी निगरानी और जांच बढ़ाई गई है।

बढ़ रहा आर्थिक दबाव

ब्रिटेन में छात्रों पर फीस और वीजा के लिए जरूरी आर्थिक मानकों का दबाव बढ़ा है। 8 अप्रैल 2026 से UK Study Visa की फीस £558 प्रति आवेदन हो गई, जो पहले £524 थी। इसके अलावा 2026 शैक्षणिक वर्ष के लिए छात्र वीजा में रहने के खर्च के लिए जरूरी राशि में 20% की बढ़ोतरी की गई।

अब लंदन में पढ़ने वाले छात्रों को रहने के खर्च के लिए प्रति माह £1,334 और लंदन से बाहर रहने वाले छात्रों को £1,023 प्रति माह की आर्थिक क्षमता दिखानी होती है।

कनाडा में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या में सबसे तेज गिरावट देखने को मिली है। इसका एक बड़ा कारण आवास और तेजी से बढ़ती आबादी से जुड़े दबाव को नियंत्रित करने के लिए संघीय सरकार की ओर से स्टडी परमिट पर लगाई गई सीमाएं हैं।

ऑस्ट्रेलिया ने इस मामले में अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाया है। 2024-25 में वहां अंतरराष्ट्रीय छात्रों के आवेदन घटकर करीब 4.27 लाख रह गए, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या लगभग 6 लाख थी। सरकारी नीतियों, अधिक रिजेक्शन रेट और वीजा फीस में बढ़ोतरी ने भी इसमें भूमिका निभाई। गिरावट को रोकने के लिए ऑस्ट्रेलिया ने 2026 में नए विदेशी छात्रों की सीमा 9% बढ़ाई और वीजा प्रक्रिया को तेज करने के कदम उठाए।

इसके साथ ही कई देशों में दस्तावेजों की जांच और निगरानी भी पहले से सख्त हुई है। छात्रों को अब अधिक वित्तीय प्रमाण देने पड़ सकते हैं और वीजा प्रक्रिया में अनुपालन जांच भी बढ़ी है। पढ़ाई के बाद काम करने के नियम भी लगातार बदल रहे हैं। कुछ देशों में वित्तीय जांच, सोशल मीडिया से जुड़ी जांच और प्रायोजकों की जिम्मेदारियों को लेकर निगरानी पहले से अधिक सख्त हो गई है।

बढ़ती महंगाई ने बढ़ाया खर्च

वीजा नियमों में बदलाव के साथ बढ़ती महंगाई ने भी विदेश में पढ़ाई का खर्च बढ़ा दिया है। कई प्रमुख शिक्षा केंद्रों ने अपने Proof of Funds और रहने के खर्च से जुड़े मानकों में स्थानीय महंगाई के हिसाब से बदलाव किया है। इसका मतलब है कि छात्र को वीजा के लिए योग्य साबित होने के लिए भी पहले से ज्यादा पैसे दिखाने पड़ सकते हैं।

जिन देशों की मुद्रा डॉलर या पाउंड जैसी मजबूत मुद्राओं के मुकाबले कमजोर हो रही है, वहां के छात्रों के लिए समस्या और बड़ी है। एक साल पहले तय की गई फीस और रहने के खर्च का बजट वीजा मंजूर होने तक काफी बढ़ सकता है।

अब दूसरे देशों की ओर बढ़ रहा रुझान

Big Four देशों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए परिस्थितियां कठिन होने के बीच एशिया और यूरोप के कई शिक्षा केंद्रों को इसका फायदा मिल रहा है।

आंकड़ों के अनुसार, 36% एशियाई यूनिवर्सिटियों ने अंडरग्रेजुएट छात्रों की संख्या में वृद्धि दर्ज की और इनमें औसत वृद्धि 8% रही। यूरोप की 43% यूनिवर्सिटियों में अंडरग्रेजुएट नामांकन बढ़ा और औसत वृद्धि करीब 1% रही।

क्षेत्र के एक यूनिवर्सिटी प्रशासक के अनुसार, Big Four देशों की सख्त प्रवेश नीतियों ने पूर्वी एशियाई देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या बढ़ाने का अवसर पैदा किया है।

फ्रांस इस बदलाव से लाभ उठाने वाले प्रमुख देशों में शामिल होता दिखाई दे रहा है। 2024-25 में फ्रांस में करीब 4.45 लाख अंतरराष्ट्रीय छात्र थे। अमेरिका में नामांकन घटने और नीतियों के सख्त होने के बीच फ्रांस खुद को एक वैकल्पिक शिक्षा केंद्र के रूप में पेश कर रहा है। देश का लक्ष्य 2027 तक अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या बढ़ाकर 5 लाख करना है।

वहीं जर्मनी की कम या बिना ट्यूशन फीस वाली सरकारी यूनिवर्सिटियां, सिंगापुर और हांगकांग के अंग्रेजी माध्यम के कार्यक्रम तथा तुर्की और खाड़ी देशों में विकसित हो रहे नए शिक्षा केंद्र भी छात्रों की रुचि हासिल कर रहे हैं।

कनाडा के कॉलेज और जर्मनी के कम फीस या बिना ट्यूशन फीस वाले मास्टर कार्यक्रम पश्चिमी अफ्रीका और दक्षिण एशिया में छात्रों को आकर्षित करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इन देशों में अपेक्षाकृत तेज वीजा प्रक्रिया और पढ़ाई के बाद काम के अधिक स्पष्ट विकल्प भी छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं।

खास तौर पर कमजोर अर्थव्यवस्थाओं से आने वाले छात्रों के लिए ऐसा देश जहां ट्यूशन फीस कम हो, वीजा जल्दी मिले और पढ़ाई के बाद काम के रास्ते स्पष्ट हों, अब विदेश में पढ़ाई के फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

Raish Ahmed

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