
बाल दिवस के अवसर पर एडइनबॉक्स ने शिक्षा जगत के अनुभवी और विचारशील शिक्षक डॉ. राकेश सिंह से विशेष बातचीत की। दो दशकों से अधिक समय से शिक्षण क्षेत्र में सक्रिय डॉ. सिंह ने न केवल बच्चों के सीखने के तरीकों को करीब से देखा है, बल्कि समय के साथ उनमें आए बदलावों को भी गहराई से समझा है।
इस साक्षात्कार में उन्होंने आधुनिक शिक्षा व्यवस्था, तकनीक के प्रभाव, जिज्ञासा और भावनात्मक बुद्धिमत्ता के महत्व पर अपने अनुभव साझा किए। उनका मानना है कि आज की शिक्षा केवल अंकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि बच्चों में सोचने, सवाल करने और जीवन से जुड़कर सीखने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।
- पिछले दो दशकों की शिक्षण यात्रा में आपने छात्रों के सीखने और सोचने के तरीके में सबसे बड़ा बदलाव क्या देखा है?
– पिछले दो दशकों में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि बच्चे अब केवल शिक्षक केंद्रित नहीं रहे। वह सिर्फ जानकारी ग्रहण करने वाले नहीं, बल्कि सवाल करने वाले और नई नई चीजों को आजमाने वाले या कहें कि खोज करने वाले बन गए हैं।
पहले सीखना “शिक्षक से छात्र” तक की रेखीय प्रक्रिया थी, अब यह एक सह-निर्माण (co-construction) की प्रक्रिया बन गई है। बच्चे अब दृश्य, श्रव्य, और डिजिटल माध्यमों से समान रूप से सीखते हैं और सीखने को अपने संदर्भ से जोड़ने की कोशिश करते हैं।
- क्या तकनीक ने आज के विद्यार्थियों को वास्तव में सशक्त बनाया है या उन्हें पहले से ज़्यादा विचलित कर दिया है?
– तकनीक ने उन्हें निश्चित रूप से अलग रूप में सशक्त भी किया है और चुनौतीपूर्ण स्थिति में भी डाला है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि शिक्षक तकनीक को कैसे मार्गदर्शन के साथ उपयोग में लाते हैं।
सिर्फ स्क्रीन नहीं, बल्कि सोच के विकास के लिए तकनीक का उपयोग तब सार्थक होता है जब बच्चे निर्माणात्मक, संवादात्मक और आलोचनात्मक सोच से जुड़ते हैं — न कि केवल उपभोग करने वाले बनते हैं।
- अगर आपको पुराने शिक्षा प्रणाली से एक चीज़ वापस लाने का मौका मिले, तो वह क्या होगी और क्यों?
– मैं ‘धीरे लेकिन गहन और सहज रूप से सीखने की संस्कृति’ को वापस लाना चाहूँगा।
पहले सीखने में समय, आत्ममंथन और अभ्यास का स्थान था। आज की तेज़ रफ़्तार प्रणाली में “परिणाम” केंद्र में है, “प्रक्रिया” नहीं।
सीखना तभी गहरा होता है जब बच्चे को गलतियाँ करने, सोचने और अनुभव करने की स्वतंत्रता दी जाए। उसमें अधिक रूप से वह स्वयं सम्मिलित हो।
- बच्चों की जिज्ञासा को ज़िंदा रखने का सबसे बड़ा राज़ क्या है?
– बच्चों की जिज्ञासा को जीवित रखने का सबसे बड़ा रहस्य है — ‘प्रश्न पूछने की अनुमति’।
जब हम बच्चों से कहते हैं — “यह सवाल अच्छा है, चलो मिलकर खोजते हैं” — तब सीखने की लौ जलती है। बच्चों के साथ आत्म खोज के साथ यह सीखना अलग प्रकार का होता है। जिसमें जिज्ञासा हर रूप में और हर स्तर पर बनी रहती है।
जिज्ञासा तब जीवित रहती है जब शिक्षक उत्तर देने से पहले बच्चों को खोजने, कल्पना करने और सोचने की जगह देते हैं।
- जब आपने पढ़ाना शुरू किया था, तब “अच्छे छात्र” की परिभाषा और आज की परिभाषा में क्या अंतर आया है?
– पहले “अच्छा छात्र” वह था जो अनुशासित, उत्तरदायी और अंक लाने वाला होता था।
आज “अच्छा छात्र” वह है जो समझने, साझा करने, और समाज से जुड़ने वाला है। साथ में कुछ नया करने वाला भी है। लीक से हटकर… अच्छा छात्र अब सिर्फ ‘किताब का ज्ञाता’ नहीं, बल्कि ‘जीवन का अन्वेषक’ है। एक तरह से स्टार्ट अप वाला…
- क्या आपको लगता है कि भारत के स्कूल और कक्षाएँ वैश्विक बदलाव की रफ़्तार के साथ पर्याप्त तेज़ी से विकसित हो रहे हैं?
– कई विद्यालयों में सकारात्मक परिवर्तन दिख रहे हैं — बाल-केंद्रित दृष्टिकोण, समावेशिता, कला-एकीकृत शिक्षा इत्यादि। लेकिन, यह परिवर्तन असमान रूप से फैला हुआ है। विद्यालयों के बीच संसाधनों को लेकर एक गहरी खाई है। जिसको पाटे बिना संवैधानिक लक्ष्यों को भी पूरा करना मुश्किल है।
शहरों में गति है, पर ग्रामीण और सरकारी विद्यालयों में अभी भी संरचनात्मक व दृष्टिकोणगत बदलाव की आवश्यकता है। हमें स्कूलों को “पाठ्यक्रम-केंद्रित” से “जीवन-केंद्रित” बनाना होगा।
- ऐसे दौर में जब छात्र ऑनलाइन ज़्यादा और ऑफलाइन कम सीखते हैं, शिक्षक खुद को कैसे प्रासंगिक बनाए रख सकते हैं?
– शिक्षक को आज ज्ञान के स्रोत से बढ़कर सीखने के सहयात्री की भूमिका निभानी होगी। उनका कार्य अब “सिखाना” नहीं, बल्कि “सोचने और जोड़ने” में सहायता करना है।
यदि शिक्षक बच्चों के अनुभव, डिजिटल स्पेस और भावनाओं को समझकर सीखने का वातावरण बनाएँ, तो वे सदैव प्रासंगिक रहेंगे — क्योंकि मानवीय स्पर्श को कोई तकनीक प्रतिस्थापित नहीं कर सकती।
एआई के प्रयोग को लेकर सावधानी बरतनी होगी। शिक्षा में चिंतन पक्ष को बढ़ाना होगा, नहीं तो यह सोचने की प्रक्रिया पर सबसे बढ़ा संकट सिद्ध होगी।
- क्या आज के समय में छात्रों की सफलता के लिए भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) शैक्षणिक बुद्धिमत्ता (Academic Intelligence) से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है?
– निश्चित रूप से। 21वीं सदी में सफलता का आधार केवल ‘क्या जानते हैं’ नहीं, बल्कि ‘कैसे व्यवहार करते हैं और कैसे महसूस करते हैं’ पर है।
भावनात्मक बुद्धिमत्ता ही बच्चों को संवेदनशील, सहानुभूतिशील और सहयोगी नागरिक बनाती है। अकादमिक बुद्धिमत्ता आपको नौकरी दिला सकती है, पर भावनात्मक बुद्धिमत्ता आपको मानवता से जोड़ती है।
- अभिभावक और शिक्षक आज क्या कर सकते हैं ताकि बच्चों में प्रतिस्पर्धा से ज़्यादा जिज्ञासा को बढ़ावा दिया जा सके?
– हमें तुलना नहीं, संवाद की संस्कृति विकसित करनी होगी।
बच्चों से पूछें — “तुमने आज क्या नया देखा या सीखा?” न कि “कितने नंबर आए?”
अभिभावक और शिक्षक यदि बच्चों को प्रश्न करने, असफल होने, और दोबारा प्रयास करने का साहस देंगे, तो जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी।
- अगर आपको भविष्य की आदर्श कक्षा को परिभाषित करना हो, तो वह कैसी दिखेगी?
– भविष्य की आदर्श कक्षा वह होगी जहाँ दीवारें नहीं, विचारों की खुली जगहें होंगी। जहाँ बच्चे अपनी गति से सीखेंगे, समूह में सोचेंगे, और तकनीक उनके हाथ में सृजन का औज़ार होगी, न कि केवल मनोरंजन का या उनके सोचने के विकल्प का।
वहाँ शिक्षक मार्गदर्शक, सह-शिक्षार्थी और प्रेरक होंगे। दोनों की सीखने और सिखाने की यात्रा साथ साथ समांतर चल रही होगी। ऐसी कक्षा में शिक्षा सिर्फ भविष्य की तैयारी नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव होगी। जीवन को देखने का , जीने का और उससे सीखने का।
निष्कर्ष:
बाल दिवस के इस अवसर पर डॉ. राकेश सिंह के विचार हमें याद दिलाते हैं कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम या परीक्षा तक सीमित नहीं हो सकती। सच्ची शिक्षा वह है जो बच्चे की जिज्ञासा को जीवित रखे, संवेदनशीलता को पोषित करे और सोचने की स्वतंत्रता दे।
डॉ. सिंह की दृष्टि में भविष्य का शिक्षण वही होगा जहाँ शिक्षक और छात्र एक साथ सीखेंगे — जीवन से, अनुभवों से और संवाद से। यह साक्षात्कार न केवल शिक्षकों और अभिभावकों के लिए, बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए भी एक प्रेरणा है कि वे ऐसी शिक्षा व्यवस्था गढ़ें जो बच्चों को केवल सफल नहीं, बल्कि सहानुभूतिशील और विचारशील नागरिक बनाए।




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