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निरंतर प्रयास, प्रयोग, असफलताओं और आत्म-मंथन से बनता है करियर: डॉ. अमित वर्मा

निरंतर प्रयास, प्रयोग, असफलताओं और आत्म-मंथन से बनता है करियर: डॉ. अमित वर्मा

निरंतर प्रयास, प्रयोग, असफलताओं और आत्म-मंथन से बनता है करियर: डॉ. अमित वर्मा

डिजिटल मीडिया, सहभागी संचार और शिक्षा के बदलते परिदृश्य में डॉ. अमित वर्मा एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने अकादमिक शोध और व्यावहारिक अनुभव के बीच मजबूत सेतु बनाया है। मणिपाल विश्वविद्यालय जयपुर के सेंटर फॉर डिस्टेंस एंड ऑनलाइन एजुकेशन में पत्रकारिता एवं जनसंचार के एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट रजिस्ट्रार (हेल्पडेस्क) के रूप में कार्यरत डॉ. वर्मा न केवल भारत, बल्कि वैश्विक स्तर पर सहभागी और समावेशी संचार को लेकर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर मीडिया एंड कम्युनिकेशन रिसर्च (IAMCR) के पार्टिसिपेटरी कम्युनिकेशन रिसर्च सेक्शन के वाइस चेयर के तौर पर वे अंतरराष्ट्रीय विमर्श में योगदान दे रहे हैं। इसके साथ ही ‘जर्नल ऑफ कम्युनिकेशन एंड मैनेजमेंट’ और ‘हेल्थ एंड ह्यूमैनिटीज’ जैसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स के एडिटर-इन-चीफ के रूप में उनकी अकादमिक पहचान और भी सशक्त होती है।

12 वर्षों से अधिक के शैक्षणिक और उद्योग अनुभव में डॉ. अमित वर्मा ने SWAYAM जैसे राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए MOOC कोर्स विकसित किए, दर्जनों शोध लेख प्रकाशित किए, पुस्तकें लिखीं और भारतीय पेटेंट भी हासिल किए हैं। उनका शोध मीडिया साक्षरता, सामुदायिक मीडिया, डिजिटल कम्युनिकेशन और सामाजिक सशक्तिकरण में मीडिया की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करता है।

एडइनबॉक्स (Edinbox) के लिए पूजा खन्ना के साथ इस विशेष बातचीत में डॉ. अमित वर्मा ने मीडिया साक्षरता, ऑनलाइन शिक्षा, सहभागी संचार और डिजिटल युग में मीडिया पेशेवरों की बदलती जिम्मेदारियों पर अपने विचार साझा किये। प्रस्तुत है बातचीत के अंश:

  1. छात्रों और संस्थानों के साथ काम करने के अनुभव में, आपको क्या लगता है कि आज करियर बनाने को लेकर छात्रों की सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?

– सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह मान लेना है कि केवल डिग्री ही सफलता की गारंटी है। कई छात्र सोचते हैं कि किसी प्रतिष्ठित संस्थान में दाखिला मिलते ही या प्रोफेशनल कोर्स पूरा करते ही करियर अपने-आप बन जाएगा। जबकि सच यह है कि डिग्री केवल शुरुआत है, मंज़िल नहीं।

दूसरी गलतफहमी है कि सफलता जल्दी मिलती है। सोशल मीडिया ने ‘ओवरनाइट सक्सेस’ का भ्रम पैदा किया है, जिससे छात्र सीखने की प्रक्रिया को लेकर अधीर हो जाते हैं। मीडिया और कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों में करियर निरंतर प्रयास, प्रयोग, असफलताओं और आत्म-मंथन से बनता है।

मैं देखता हूँ कि छात्र पदनाम (Designation) के पीछे दौड़ते हैं, कौशलों को नहीं समझते। आज सफल करियर वही बनाता है जो लगातार सीखता, भूलता और फिर नई चीजें सीखता रहता है — न कि जो किसी तय फॉर्मूले को पकड़कर चलता है।

  1. शिक्षा को “इंडस्ट्री-ड्रिवन” कहा जाता है, फिर भी कई छात्र खुद को प्रोफेशनल दुनिया के लिए पूरी तरह तैयार महसूस नहीं करते। असल समस्या कहाँ है?

– असली समस्या इरादों की कमी नहीं, बल्कि उनके ज़मीनी स्तर पर लागू होने में है। संस्थान सचमुच चाहते हैं कि शिक्षा इंडस्ट्री की जरूरतों के अनुरूप हो, लेकिन समस्या यह है कि उद्योग अकादमिक सिस्टम से कहीं तेज़ बदलते हैं। NEP-2020 के बाद जब तक पाठ्यक्रम संशोधित होकर लागू होते हैं, तब तक इंडस्ट्री एक कदम आगे बढ़ चुकी होती है। एक बड़ी चुनौती यह है कि छात्रों को वास्तविक समस्याओं से जूझने का पर्याप्त अनुभव नहीं मिलता। कई प्रोग्राम थ्योरी पर आधारित हैं, जिनमें व्यवहारिक सीखने, चिंतन और अनुप्रयोग की कमी रह जाती है।

इंडस्ट्री-रेडी होने का मतलब सिर्फ तकनीकी ज्ञान नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति, टीमवर्क, संचार और दबाव में निर्णय लेने की क्षमता भी है। छात्रों को यह भी नहीं सिखाया जाता कि कैसे सोचना है। उन्हें बस क्या सोचना है, यह पढ़ा दिया जाता है। यही वजह है कि कार्यस्थल पर वे स्वतंत्र निर्णय लेने में संघर्ष करते हैं।

  1. आपने शिक्षा व्यवस्था को कई स्तरों से देखा है। छात्रों के बेहतर परिणामों के लिए कौन-से बदलाव तुरंत जरूरी हैं?

– पहला बड़ा बदलाव यह होना चाहिए कि शिक्षा केवल कंटेंट डिलीवरी तक सीमित न रहे, बल्कि सीखने की भागीदारी बढ़ाए। लेक्चर और परीक्षा से आगे बढ़कर चर्चा, चिंतन, प्रोजेक्ट-आधारित सीख, और मेंटरशिप को बढ़ावा देना होगा। छात्र ‘एक्टिव पार्टिसिपेंट’ बनें, सिर्फ श्रोता नहीं।

दूसरी आवश्यकता है मूल्यांकन प्रणाली में सुधार। केवल अंक और ग्रेड सीखने का पैमाना नहीं होने चाहिए। पोर्टफोलियो, प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट, सामुदायिक कार्य और इंटर्नशिप को भी वास्तविक महत्व मिलना चाहिए। तीसरी जरूरत है — फैकल्टी डेवलपमेंट में निवेश। शिक्षकों को विषय ज्ञान के साथ-साथ डिजिटल टूल्स, नई शिक्षण पद्धतियों और छात्र मनोविज्ञान में लगातार प्रशिक्षण मिलना चाहिए।

अंत में, संस्थानों को असफलता से डरने वाली संस्कृति बदलनी होगी। छात्रों को प्रयोग करने का मौका मिलना चाहिए, बिना डर के। गलतियाँ सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं, कमजोरी नहीं।

  1. AI और डिजिटल टूल्स के इस दौर में, कौन-से मानवीय कौशल अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं?

– टेक्नोलॉजी जितनी आगे बढ़ती है, मानवीय कौशल उतने आवश्यक होते जाते हैं।

Critical Thinking सबसे जरूरी कौशल है — जानकारी पर प्रश्न करना, स्रोतों की जांच करना और नैतिक निर्णय लेना।

Communication Skills — स्पष्ट अभिव्यक्ति, सक्रिय सुनना और विभिन्न संस्कृतियों के साथ सम्मानपूर्वक संवाद करना — यह मशीनें नहीं कर सकतीं।

Empathy — मानवीय भावनाओं और सामाजिक वास्तविकताओं को समझना किसी भी पेशे में अनिवार्य है।

Adaptability और Emotional Resilience — लगातार बदलते दौर में अनिश्चितता को संभालने की क्षमता ही असली सफलता तय करती है।

  1. शिक्षा में ईमानदार संवाद कितना महत्वपूर्ण है, और Edinbox जैसे प्लेटफॉर्म विश्वसनीयता कैसे बनाए रख सकते हैं?

– ईमानदार संवाद ही शिक्षा में विश्वास की नींव है। छात्र और अभिभावक दी गई जानकारी के आधार पर बड़े फैसले लेते हैं। यदि जानकारी बढ़ा–चढ़ाकर पेश की जाए, तो नुकसान लंबे समय तक रहता है।

एडइनबॉक्स (Edinbox) जैसे प्लेटफॉर्म को पारदर्शिता को प्रचार से ऊपर रखना होगा— संस्थानों, कोर्सों और करियर विकल्पों के वास्तविक पहलुओं को दिखाना चाहिए, केवल सकारात्मक पक्ष नहीं। विश्वसनीयता तभी बनती है जब प्लेटफॉर्म दावों की जांच करें, कठिन सवाल पूछें और विद्यार्थियों के हित को प्राथमिकता दें।

  1. छात्रों के सामने विकल्प, रैंकिंग और सलाह की भरमार है। वे कैसे तय करें कि किस पर ध्यान देना चाहिए?

– छात्रों को सबसे पहले खुद को समझना चाहिए। रैंकिंग या ट्रेंड के पीछे दौड़ने के बजाय उन्हें पूछना चाहिए- मुझे वास्तव में किसमें रुचि है? किस तरह का काम मुझे ऊर्जा देता है? रैंकिंग केवल संदर्भ का एक हिस्सा हों, अंतिम फैसला नहीं।

पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता, फैकल्टी, सीखने का वातावरण और प्रैक्टिकल अवसर अधिक महत्वपूर्ण हैं। साथ ही, सलाह देने वालों की संख्या कम होनी चाहिए। बहुत अधिक राय भ्रम पैदा करती है। कुछ भरोसेमंद मेंटर्स और आत्म-चिंतन कहीं ज्यादा प्रभावी होते हैं।

  1. एक शैक्षणिक लीडर और प्रशासक के रूप में आपने कौन-सी चुनौतियाँ महसूस कीं, और उन्हें कैसे संभाला?

– मेरे अनुभव में कई चुनौतियाँ दिखती नहीं, पर प्रभाव गहरा छोड़ती हैं। सबसे बड़ी चुनौती है — कई भूमिकाओं का संतुलन। शिक्षण, शोध, प्रशासन और छात्रों की सहायता — इनमें संतुलन बनाना आसान नहीं होता। इसके लिए प्राथमिकताओं की समझ, लंबे कार्यघंटे और कठिन निर्णयों की जरूरत पड़ती है।

दूसरी चुनौती है — विभिन्न हितधारकों की अपेक्षाओं का प्रबंधन। छात्र, शिक्षक और प्रशासन — सभी की प्राथमिकताएँ अलग होती हैं। ऐसे में सुनना, संवाद करना और निष्पक्ष रहना बेहद जरूरी होता है। परिवर्तन लागू करना भी एक बड़ी चुनौती है। नए सिस्टम या डिजिटल प्रक्रियाओं को सभी तुरंत स्वीकार नहीं करते।

मैंने इसका समाधान संवाद और सभी को प्रक्रिया में शामिल करके किया। इन चुनौतियों ने मेरी नेतृत्व शैली को परिपक्व बनाया। नेतृत्व पद नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, भरोसा और शैक्षणिक समुदाय की सेवा का नाम है।

  1. छात्रों के बेहतर निर्णयों में स्टोरीटेलिंग और वास्तविक अनुभवों की क्या भूमिका है?

– स्टोरीटेलिंग शिक्षा को जीवंत बनाती है। जब छात्र संघर्ष, असफलताओं और धीरे–धीरे मिली सफलताओं की वास्तविक कहानियाँ सुनते हैं, तो करियर के वास्तविक स्वरूप को समझ पाते हैं। ये कहानियाँ बताते हैं कि करियर सीधा नहीं होता, उतार–चढ़ाव से भरा होता है। सच्ची कहानियाँ डर कम करती हैं और आत्मविश्वास बढ़ाती हैं। मीडिया शिक्षा में तो स्टोरीटेलिंग समाज, संस्कृति और जिम्मेदारी की गहरी समझ देती है— जो किसी किताब में नहीं मिलती।

  1. भविष्य में शिक्षा मीडिया पोर्टल्स को किस तरह की चर्चाओं को बढ़ावा देना चाहिए?

– शिक्षा पोर्टल्स को केवल रैंकिंग और एडमिशन-केंद्रित सामग्री से आगे बढ़ना चाहिए।

उन्हें सीखने की गुणवत्ता, मानसिक स्वास्थ्य, डिजिटल एथिक्स, मीडिया साक्षरता और बदलती दुनिया में रोजगार कौशल जैसे मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए।

ग्रामीण, हाशिए पर रहने वाले और गैर-परंपरागत छात्रों की कहानियाँ भी प्रमुखता से सामने लानी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण— शिक्षा पोर्टल्स को संवाद को बढ़ावा देना चाहिए, सिर्फ जानकारी देना नहीं।

  1. यदि आपको छात्रों को एक ऐसी सलाह देनी हो जो वे कम सुनते हैं पर जिसे सुनना बहुत जरूरी है, तो वह क्या होगी?

– मेरी सलाह है कि सफल बनने की जल्दी न करें, सक्षम बनने पर ध्यान दें। सफलता क्षमता के पीछे चलती है, उल्टा नहीं। खुद को समझें, मजबूत नींव बनाएं और लगातार सीखते रहें। दूसरों से तुलना न करें — हर किसी की यात्रा अलग होती है। आज की तेज़ दुनिया में धैर्य, ईमानदारी और निरंतर विकास— ये दुर्लभ लेकिन बेहद शक्तिशाली गुण हैं। मैं इस चर्चा को जॉन डेवी के विचार से समाप्त करना चाहूँगा: “Education is not preparation for life; education is life itself.” यह कथन याद दिलाता है कि शिक्षा केवल डिग्री या नौकरी के बारे में नहीं है, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदार, संवेदनशील और जागरूक व्यक्तियों को विकसित करने की प्रक्रिया है। मैं Edinbox का धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने शिक्षा, मीडिया और छात्र सशक्तिकरण पर सार्थक संवाद का अवसर प्रदान किया। ऐसे संवाद हमें शिक्षा के भविष्य को और अधिक नैतिक, सूझबूझ भरा और प्रभावी बनाने में मदद करते हैं।

एडइनबॉक्स टीम

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