
दिल्ली यूनिवर्सिटी ने अपने अंतर्गत सभी कॉलेजों से 14 अगस्त को आयोजित होने वाले केंद्र सरकार के “विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस” कार्यक्रम में भाग लेने के लिए 20-20 शिक्षकों को भेजने के लिए कहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय के इस कदम पर कई शिक्षाविदों ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे “तानाशाही फरमान” करार दिया है।
गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने “विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस” कार्यक्रम में भाग लेने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय को आमंत्रित किया था। इसके कुछ दिनों बाद विश्वविद्यालय ने प्रत्येक कॉलेज को इस कार्यक्रम के लिए 20-20 शिक्षकों को भेजने के लिए कहा है। इस निर्देश के आलोक में ही कुछ विभागों ने शिक्षकों की भागीदारी अनिवार्य कर दी है, जिसे लेकर सवाल भी उठाए जा रहे हैं।
मंत्रालय द्वारा 9 अगस्त को दिल्ली विश्वविद्यालय को भेजे गए निमंत्रण में कहा गया है कि भारत मंडपम में आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम का उद्देश्य ‘विभाजन की भयावहता को याद करना और देशवासियों में यह सर्वसम्मति पैदा करना है कि ऐसी भयावह घटनाएं दोबारा न हों।’ गृह मंत्री अमित शाह इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करने वाले हैं ।
नोट में विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों, विशेष रूप से स्नातकोत्तर अनुसंधान पाठ्यक्रमों में अध्ययनरत और स्नातक पाठ्यक्रमों के दूसरे और तीसरे वर्ष में अध्ययनरत छात्रों से भागीदारी का अनुरोध किया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस कार्यक्रम का संदेश युवाओं के बीच प्रसारित हो।
डीयू के एक प्रोफेसर का कहना है कि “पहले तो उन्होंने (प्रशासन ने) हमसे ज़्यादा से ज़्यादा छात्रों को इस कार्यक्रम में भागीदारी सुनिश्चित करने को कहा। फिर उन्होंने शिक्षकों से इसमें भाग लेने को कहा। कॉलेजों पर एक निश्चित संख्या में प्रोफेसर भेजने का दबाव है, इसलिए कुछ विभागों ने इस कार्यक्रम के लिए शिक्षकों की भागीदारी अनिवार्य कर दी है।”
प्रोफेसर ने कहा, “शिक्षकों को इसमें भाग लेने के लिए मजबूर करना मनमाना है। ऐसे आयोजनों में भागीदारी स्वैच्छिक होनी चाहिए। साथ ही, हमें नहीं पता कि कार्यक्रम की विषय-वस्तु क्या है। इससे सांप्रदायिक विचार पनप सकते हैं और हम नहीं चाहते कि हमारे छात्र इसका हिस्सा बनें।”
डीयू में इतिहास की प्रोफेसर माया जॉन ने कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों की भागीदारी के आह्वान को “तानाशाही” करार दिया।
उन्होंने कहा, इस कार्यक्रम की परिकल्पना शांति और एकजुटता बनाए रखने के प्रयासों को नज़रअंदाज़ करते हुए सुविचारित सांप्रदायिक नैरेटिव प्रदर्शित करने के लिए की गई थी।”
दिल्ली विश्वविद्यालय ने हालांकि इसपर कोई जवाब नहीं दिया है, लेकिन विश्वविद्यालय के एक अधिकारी ने कहा, “जब भी केंद्र सरकार इस तरह का कोई कार्यक्रम आयोजित करती है, तो हमें इसमें भाग लेने और तदनुसार कई शिक्षकों को भेजने के लिए कहा जाता है। फिर हम कॉलेजों से संपर्क करते हैं। इसमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए क्योंकि वे (शिक्षक) इसमें भाग ले सकते हैं और शैक्षणिक अवसरों का पता लगा सकते हैं।”
बता दें कि यह वार्षिक कार्यक्रम पहली बार 2021 में मनाया गया था, जिसमें विभाजन के दौरान लोगों को हुई हिंसा की याद दिलाई जाती है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी 7 अगस्त को एक नोटिस जारी कर कहा है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने इस विषय पर एक नाटक तैयार किया है। आयोग ने उच्च शिक्षण संस्थानों से इस नाटक को लेकर “जागरूकता फैलाने” को कहा है।




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