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दिल्ली सरकार से वित्त पोषित कॉलेजों में स्थायी नियुक्ति को लेकर डूटा का 22 अगस्त को धरना-प्रदर्शन

दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध दिल्ली सरकार से पूर्ण वित्त पोषित 12 कॉलेजों के सामने पिछले कई साल से जहाँ सैलरी, शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति न होना व पदोन्नति के बाद उनका एरियर न मिलना, समय पर मेडिकल बिल पास न होना आदि समस्याओं से शिक्षक जूझ रहे हैं। वहीं इन 12 कॉलेजों में एक दशक से शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू न होने के कारण छात्रों की शिक्षा पर असर पड़ रहा है। बता दें कि जो तदर्थ शिक्षक लंबे समय से सरकार के इन कॉलेजों में पढ़ा रहे थे इन दो सालों में वे दूसरे कॉलेजों में स्थायी होकर चले गए है। दिल्ली सरकार के 12 कॉलेजों से शिक्षकों की संख्या लगातार घट रही है और यहाँ पर स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू नहीं हो रही है। बताया जा रहा है कि 200 से अधिक शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों व दिल्ली से बाहर के विश्वविद्यालयों / कॉलेजों में हो जाने के कारण बहुत कम तदर्थ शिक्षक बचे है। स्थिति यहाँ तक पहुंच गई है कि अतिथि शिक्षकों ( गेस्ट टीचर्स )  के सहारे कॉलेज चल रहे है। फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस ने दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह से कॉलेजों में पुनः एडहॉक शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने की मांग की है ताकि छात्रों की शिक्षा पर असर न पड़े। साथ ही फोरम ने दिल्ली सरकार से शत प्रतिशत वित्त पोषित 12 कॉलेजों में भी रोस्टर रजिस्टर विश्वविद्यालय प्रशासन से पास कराकर स्थायी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू कराने की मांग की है। 

फोरम के चेयरमैन डॉ. हंसराज सुमन का कहना है कि दिल्ली सरकार का उच्च शिक्षा मॉडल एक दिखावा बनकर रह गया है। दिल्ली सरकार की फंड कटौती, निजीकरण/स्व-वित्त पोषण नीति के खिलाफ लड़ने के लिए कमर कसने का समय आ गया है। इस नीति ने दिल्ली सरकार द्वारा वित्तपोषित 12 कॉलेजों को वित्तीय दृष्टि से दयनीय स्थिति में बदल दिया है। उन्होंने बताया है कि पिछले पांच वर्षों में 50 प्रतिशत तक फंड कटौती के कारण ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि इन कॉलेजों को बंद होने का सामना करना पड़ सकता है। डीयू के ये कॉलेज 10 साल या उससे अधिक समय से शिक्षकों या गैर-शिक्षण कर्मचारियों की एक भी स्थायी नियुक्ति नहीं कर सके। जबकि डीयू के अन्य 53 कॉलेजों ने पिछले दो वर्षों में नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी कर ली है। इन कॉलेजों में लगभग 4700 शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति हो चुकी है और अभी भी नियुक्ति प्रक्रिया जारी है। उन्होंने बताया है कि अदिति महाविद्यालय , दीनदयाल उपाध्याय कॉलेज, भाष्कराचार्य कॉलेज व आचार्य नरेन्द्रदेव कॉलेज आदि कॉलेजों ने शिक्षकों के स्थायी पदों का विज्ञापन जारी कर दिया है लेकिन बाकी 8 कॉलेजों ने अभी तक रोस्टर रजिस्टर तैयार नहीं किया है और न ही विज्ञापन जारी किए है।

 डॉ. हंसराज सुमन ने बताया है कि इस शैक्षणिक सत्र में छात्रों की लगभग 50 प्रतिशत कक्षाएं प्रभावित होने या बिल्कुल भी आयोजित नहीं होने की संभावना जताई  है। उन्होंने यह भी बताया है कि इन कॉलेजों में 1512 शिक्षकों की आवश्यकता के मुकाबले केवल 824 शिक्षक (528 स्थायी और 296 तदर्थ शिक्षक) हैं।  इन कॉलेजों में गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भी यही स्थिति है, 1366 की आवश्यकता के स्थान पर  केवल 483 स्थायी और 285 संविदा कर्मचारी (कुल 728) हैं। इन कॉलेजों में प्रयोगशालाएँ, कार्यालय, पुस्तकालय, सामान्य रखरखाव आदि सभी बुरी तरह प्रभावित हैं और इन संस्थानों को चलाना भविष्य में असंभव होता जा रहा है। इन कॉलेजों में छात्र, शिक्षक, कर्मचारी सबसे अधिक प्रभावित हैं। शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं दिया जा रहा है ।  जबकि कॉलेज लगभग आधी क्षमता पर चल रहे हैं। अगर सभी शिक्षकों व कर्मचारियों की नियुक्ति समय पर होती तो सरकार अनुदान न देने के नाम पर कॉलेजों से पल्ला झाड़ लेती । उन्होंने यह भी बताया है कि शिक्षकों और कर्मचारियों को फंड की कमी के कारण लंबे समय से लंबित बकाया, मेडिकल बिल, एलटीसी आदि का भुगतान नहीं किया जाता है। समस्या विकराल होती जा रही है इसीलिए दिल्ली विश्वविद्यालय को दिल्ली सरकार द्वारा अनुचित फंड कटौती के मुद्दे पर अकादमिक परिषद व कार्यकारी परिषद की विशेष बैठक बुलाई जाने को लेकर फोरम कई बार लिख चुका है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों, कर्मचारियों व शिक्षकों की समस्याओं को देखते हुए बृहस्पतिवार को विद्वत परिषद की मीटिंग बुलाई जिसमें सरकार के कॉलेजो को लेकर निर्णय लिया गया। 

डॉ. हंसराज सुमन ने बताया है कि दिल्ली सरकार से संबद्ध पूर्ण वित्त पोषित 12 कॉलेजों के अतिरिक्त 20 अन्य कॉलेज (16 प्रातः और 4 सांध्य ) हैं जो यूजीसी के माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित हैं, लेकिन दिल्ली सरकार द्वारा उनका रखरखाव किया जाता है। इन कॉलेजों ने अपने यहाँ स्थायी शिक्षकों के नियमितीकरण की प्रक्रिया लगभग पूरी कर ली है और समय पर वेतन का भुगतान किया जा रहा है, इन कॉलेजों का लगभग सभी बकाया और देय राशि का भुगतान समय पर किया जा रहा है। हालांकि, रखरखाव के लिए दिल्ली सरकार द्वारा 5 प्रतिशत हिस्सेदारी का भुगतान न करने के कारण, ये कॉलेज अतिरिक्त बुनियादी ढांचे की कमी और उपलब्ध बुनियादी ढांचे के सामान्य रखरखाव के लिए बाट जोह रहे हैं। डॉ.सुमन का कहना है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति,  उप राज्यपाल , यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय को  कड़ा फैसला लेते हुए सरकार के इन 12 कॉलेजों को बचाएं और इन्हें यूजीसी फंडिंग के तहत लाया जाये। उनका कहना है कि  20 कॉलेज जो पहले से ही यूजीसी द्वारा वित्तपोषित हैं। यूजीसी में आने पर उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी और इनमें भी स्थायी शिक्षकों व कर्मचारियों की नियुक्ति हो सकेगी।

Asmita Sarkar

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