
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) द्वारा अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वी वाम छात्र संगठन प्रोग्रेसिव स्टूडेंट फोरम (पीएसएफ) पर लगाए गए प्रतिबंध का विरोध किया है और कहा है कि शिक्षा संस्थानों को विचारों की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक भागीदारी का केंद्र होना चाहिए।
एबीवीपी ने कहा कि छात्र समूह पर अचानक और निराधार प्रतिबंध लगाने से उस संगठन में बड़े पैमाने पर अशांति फैल सकती है। यह कार्रवाई भविष्य में छात्र परिषद के चुनावों की ईमानदारी पर गंभीर असर डाल सकती है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
एबीवीपी ने कहा कि वह मानती है कि शिक्षा संस्थानों को वैचारिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक भागीदारी का गढ़ होना चाहिए। विभिन्न छात्र संगठनों की मौजूदगी स्वस्थ संवाद को बढ़ावा देने और छात्र समुदाय के विभिन्न दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
एबीवीपी की सचिव निधि गाला ने कहा, टीआईएसएस द्वारा छात्र संगठनों पर अचानक और अन्यायपूर्ण प्रतिबंध लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर सीधा हमला है। वहीं, टीआईएसएस में एक अन्य वाम छात्र संगठन डेमोक्रेटिक सेक्युलर स्टुडेंट्स फोरम (डीएसएसएफ) ने कहा कि छात्र संगठन पर प्रतिबंध लगाने से संस्थान की पहचान पर सीधा हमला हुआ है। डीएसएसएफ ने एक बयान में कहा कि छात्र संगठन हमेशा सुनिश्चित करते हैं कि सभी छात्रों की आवाजें सुनी जाएं और कैंपस एक स्वस्थ लोकतांत्रिक सक्रियता की जगह बना रहे।
गौरतलब है कि टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस) ने 19 अगस्त को छात्र संगठन प्रोग्रेसिव स्टुडेंट्स फोरम (पीएसएफ) पर प्रतिबंध लगा दिया था। संस्थान ने एक पन्ने का नोटिस जारी कर कहा था, ‘यह समूह (पीएसएफ) ऐसी गतिविधियों में शामिल रहा है जो संस्थान के कामकाज में बाधा डालती हैं, संस्थान को बदनाम करती हैं, हमारे समुदाय के सदस्यों को नीचा दिखाती हैं और छात्रों और शिक्षकों के बीच विभाजन पैदा करती हैं।’
संस्थान का दावा है कि यह छात्र संगठन कैंपस में ‘अवैध रूप से’ काम कर रहा था।संस्थान ने पीएसएफ पर छात्रों को उनके ‘लक्ष्यों’ से गुमराह करने का भी आरोप लगाया है।




Add comment