
मुजफ्फरनगर के एक दिहाड़ी मजूदर के बेटे ने आईआईटी की एंट्रेंस परीक्षा पास कर ली। इसके बाद उसे आईआईटी की सीट भी अलॉट हो गई, लेकिन एडमिशन की राह में उसकी गरीबी आ गई। मजदूर पिता फीस का इंतजाम नहीं कर पाया। 17 हजार 500 रुपये की फीस ना भर पाने के कारण उसका आईआईटी में दाखिली नहीं हो सका। समय से फीस ना भर पाने के कारण उसकी सीट कैंसल कर दी गई। इस मामले में झारखंड के कानूनी सेवा प्राधिकरण में याचिका दाखिल की गई लेकिन उसने यह कह कर याचिका पर कार्यवाही से इनकार कर दिया कि मामला उसके अधिकार क्षेत्र का नहीं हैं। अब सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पहुंचा है। छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर की है, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसे हिम्मत बंधाते हुए कहा कि परेशान मत हो, कुछ करते हैं !
बार एंड बेच वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को इस मामले की सुनवाई की गई। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान छात्र की परेशानी सुनी। पीठ के सामने याचिकाकर्ता छात्र ने बताया कि वह यूपी के मुजफ्फरनगर जिले का रहने वाला है। उसके पिता दिहाड़ी मजदूर का काम करते हैं। छात्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने आईआईटी एंट्रेंस एग्जाम क्लियर कर लिया था। इसके बाद उसे झारखंड के आईआईटी धनबाद में सीट अलॉट की गई। उसके पिता समय से फीस के पैसे का इंतजाम नहीं कर सके। बाद में सिस्टम में तकनीकी खराबी और फीस का इंतजाम न कर पाने की वजह से 24 जून को एडमिशन लिस्ट से उसका नाम काट दिया गया।
याचिका दायर करने वाले छात्र की दास्तान सुनकर चीफ जस्टिस चंद्रचूड ने उससे सहानुभूति जताई। चीफ जस्टिस ने छात्र को दिलासा देते हुए कहा कि उसकी आईआईटी की कक्षाएं 3 महीने पहले शुरू हो चुकी हैं लेकिन वो चिंता न करे। इस बारे में वे कुछ करते हैं। उन्होंने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता की सामाजिक पृष्ठभूमि का भी ध्यान रखा जाना चाहिए, इसलिए हम नोटिस जारी करना और उसके प्रवेश का ध्यान रखना उचित समझते हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी।




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