
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग यानी NCPCR ने केंद्र और सभी राज्यों की सरकारों को पत्र लिखते हुए कहा है कि मदरसों को फंड देना बंद कर दिया जाए। साथ ही इन्हें भंग करने की भी अपील की है। आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों और प्रशासकों को निर्देश जारी किया है। यह निर्देश ‘धर्म के संरक्षक या अधिकारों के उत्पीड़क: बच्चों के संवैधानिक अधिकार बनाम मदरसे’ शीर्षक वाली रिपोर्ट से जुड़ा है। रिपोर्ट में मदरसों द्वारा बच्चों के शैक्षिक अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव और उनकी ऐतिहासिक भूमिका पर चर्चा की गई है।
इस रिपोर्ट में 11 अध्याय हैं। यह रिपोर्ट मदरसों की ऐतिहासिक भूमिका और बच्चों के शैक्षिक अधिकारों पर उनके प्रभाव पर चर्चा करती है। NCPCR ने सिफारिश की है कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मदरसों को मिलने वाली सरकारी फंडिंग बंद कर दी जाए। मदरसा बोर्ड को भी बंद कर देना चाहिए।
बाल आयोग ने कहा है कि मदरसे में न तो बच्चों को बेसिक शिक्षा मिलती है और न ही उनको मिड डे मील की सुविधा का कोई फायदा होता है। रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार की एक योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2019-20 में मदरसों को शिक्षा के लिए 120 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिससे मान्यता प्राप्त मदरसों को सहायता प्राप्त हो।
दरअसल, बाल आयोग की तरफ से कहा गया कि मदरसा बोर्ड RTE यानी शिक्षा के अधिकारी के कानून का पालन तक नहीं करते हैं। आयोग ने यह भी कहा है कि मदरसों का पूरा फोकस केवल धार्मिक शिक्षा के पर ही रहता है, जिससे बच्चों को जरूरी शिक्षा नहीं मिल पाती है। बाल आयोग द्वारा उठाई गई मांगों में कहा गया कि मदरसों से गैर-मुस्लिम बच्चों को हटाया जाए। संविधान के आर्टिकल 28 के मुताबिक, माता-पिता की सहमति के बिना किसी बच्चे को धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती। बाल आयोग ने कहा है कि एक संस्थान के अंदर धार्मिक और औपचारिक शिक्षा एक साथ नहीं दी जा सकती है।
एनसीपीसीआर के अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने कहा कि यह भी सिफारिश की गई है कि सभी गैर-मुस्लिम बच्चों को मदरसों से निकालकर आरटीई अधिनियम, 2009 के अनुसार बुनियादी शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूलों में दाखिला दिलाया जाए।
उन्होंने कहा है कि साथ ही, मुस्लिम समुदाय के बच्चे जो मदरसा में पढ़ रहे हैं, चाहे वे मान्यता प्राप्त हों या गैर-मान्यता प्राप्त, उन्हें औपचारिक स्कूलों में दाखिला दिलाया जाए और आरटीई अधिनियम, 2009 के अनुसार निर्धारित समय और पाठ्यक्रम की शिक्षा दी जाए। इस मामले में बीजेपी की सहयोगी जेडीयू और टीडीपी ने इस मुद्दे पर कुछ बोलने से दूरी बनाई है।
बाल आयोग की इस रिपोर्ट के बाद से राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है. कई विपक्षी दल बीजेपी को इसका जिमेदार ठहरा रहे है। लेकिन देखना ये होगा कि क्या सरकार बाल आयोग कि इस सिफारिश को पूरा करती है या नही।




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