
कर्नाटक में स्कूली बच्चों का ड्रॉप ऑउट रेट एक बड़ी चिंता का विषय बनता जा रहा है। प्रदेश के कई ऐसे जिले हैं जहाँ ड्रॉप ऑउट रेट काफी अधिक है। हालांकि कर्नाटक में ड्रॉप ऑउट रेट को कम करने के लिए सरकार कई तरह के अभियान चला रही है लेकिन अभी भी कुछ ज़िलों में इसके अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ रहे। कर्नाटक के चामराजनगर जिले से ऐसी ही चिंतित करने वाली तस्वीर सामने आयी है जहां स्कूली बच्चों के उच्च ड्रॉपआउट रेट ने शिक्षा अधिकारियों के होश उड़ा दिए हैं।
गौरतलब है कि कर्नाटक का चामराजनगर जिला देश के सबसे पिछड़े जिलों में से एक है। यहाँ 128 स्कूली बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं। यह चिंताजनक है क्योंकि ज़्यादातर बच्चे पाँच तालुकों के ग्रामीण और अंदरूनी इलाकों के गाँवों से हैं। हालाँकि हाल के दिनों में जिले में कुछ बुनियादी ढाँचे का विकास हुआ है, आदिवासी बहुल इलाकों और पहाड़ी इलाकों में सरकारी स्कूलों की संख्या में वृद्धि हुई है, लेकिन बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर कम नहीं हो रही।
सबसे पिछड़े हनूर तालुक में सबसे ज़्यादा 48 स्कूली बच्चे हैं, जिन्होंने स्कूल छोड़ दिए हैं। इसके बाद चामराजनगर में 30, कोल्लेगल में 25, गुंडलूपेट में 19 और यलांदूर में 10 बच्चों ने स्कूल छोड़े हैं। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि यह संख्या 247 तक थी, लेकिन शिक्षा विभाग के प्रयासों से लगभग 100 बच्चे अपने-अपने स्कूलों में वापस लौट आए।
शिक्षकों और शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा की गई काउंसलिंग से पता चला है कि घरेलू मुद्दे और गरीबी उच्च ड्रॉपआउट दर के पीछे मुख्य कारण हैं। यह भी पाया गया कि माता-पिता ने लगभग 30 छात्रों को उनकी पढ़ाई छुड़वा दी और उन्हें अपने परिवार की आय में वृद्धि करने के लिए अपने खेतों में हाथ बंटाने के लिए मजबूर किया।
इसके अलावा, एमएम हिल्स के पहाड़ी इलाकों में स्कूल में अनुपस्थित रहने वाले बच्चों की संख्या में वृद्धि और जत्रा त्योहारों के दौरान फूलों और अगरबत्ती जैसी पूजा सामग्री बेचने के लिए मजबूर बच्चों ने अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है। शिक्षा विभाग ने ड्रॉपआउट बच्चों को वापस स्कूल लाने के प्रयास जारी रखे हैं और वे पड़ोसी जिलों में काम करने वाले उनके परिवारों पर भी नज़र रख रहे हैं। देखना शेष है कि ये प्रयास कितना सफल होते हैं।




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