
अब निजी स्कूलों के बर्खास्त शिक्षक अपने मुद्दों को लेकर सीधे दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला लेते हुए हजारों शिक्षकों को राहत दी है। जस्टिस सी हरीशंकर और जस्टिस सुधीर कुमार जैन की बेंच ने एक अल्पसंख्यक स्कूल के बर्खास्त शिक्षक की याचिका पर यह आदेश जारी किया।
बेंच ने कहा कि बर्खास्त शिक्षक की इच्छा पर निर्भर करेगा कि वह चाहे तो दिल्ली स्कूल न्यायाधिकरण (डीएसटी) का दरवाजा खटखटाएं या सीधा हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करें। दिल्ली स्कूल शिक्षा नियम के अनुसार, निजी स्कूल के शिक्षक को बर्खास्तगी की स्थिति में डीएसटी में ही याचिका दायर करनी पड़ती थी, जिससे मामला लम्बे समय तक डीएसटी में ही अटका रहता था।
इसको लेकर बर्खास्त शिक्षक हर्षपाल सिंह नेगी ने अपने वकील खगेश झा और शिखा शर्मा बग्गा के माध्यम से हाईकोर्ट का रुख किया था। वकील ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष दलील पेश करते हुए कहा कि डीएसटी एक शक्तिहीन न्यायाधिकरण है। यहां यदि कोई शिक्षक अपनी शिकायत लेकर पहुंचता है तो कई साल बर्बाद हो जाते हैं। बावजूद इसके डीएसटी अपने आदेश का पालन कराने में भी सक्षम नहीं है। ऐसे में निजी शिक्षकों के लिए डीएसटी सिवाय समय बर्बादी के और कुछ नहीं है।
निजी स्कूल के शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले पांच सदस्यीय अनुशासनात्मक समिति द्वारा जांच अनिवार्य है, लेकिन इस मामले में बर्खास्त शिक्षक ने दावा किया कि उसके खिलाफ जांच के लिए बैठाई गई अनुशासनात्मक समिति में महज चार सदस्य थे।
शिक्षक हर्षपाल सिंह नेगी का कहना था कि उसे गलत तरीके से बर्खास्त किया गया। हाईकोर्ट की सिंगल जज बेंच ने उसकी याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि प्रावधान के मुताबिक, उसे अपने मामले को लेकर पहले डीएसटी जाना होगा। इस फैसले को डिवीजन बेंच के समक्ष चुनौती दी गई। इस मामले में नेगी के वकील ने डीएसटी को लेकर विस्तृत दलीलें पेश कीं। इसके बाद डिवीजन बेंच ने निजी स्कूलों के शिक्षकों की शिकायत के लिए उचित मंच नहीं होने के तथ्य पर विचार किया। साथ ही इस मामले में हाईकोर्ट के कई पूर्व फैसलों को भी देखा, जिसके बाद सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर करने का अधिकार दे दिया।




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