
ऑल इंडिया यूनिवर्सिटीज एंड कॉलेजिज एससी, एसटी, ओबीसी टीचर्स एसोसिएशन ने लखनऊ विश्वविद्यालय के 13 विभिन्न विभागों में एससी/एसटी व ओबीसी कोटे के खाली पड़े आरक्षित पदों पर प्रोफेसर ऑफ़ प्रेक्टिस के नये नियम के तहत प्रोफेसर लगाए जाने की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे आरक्षित पदों को समाप्त करने की गहरी साजिश बताया है। टीचर्स एसोसिएशन ने बताया कि नियुक्ति के नये नियम प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस से केंद्रीय, राज्य व मानद विश्वविद्यालयों में भारत सरकार के आरक्षण नीति की सरेआम अवेहलना की जा रही है। एसोसिएशन ने इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के चेयरमैन प्रोफेसर एम. जगदीश कुमार को पत्र लिखकर मांग की है कि जिन विश्वविद्यालयों के विभागों में आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों के पदों पर नियुक्ति होनी है उन पदों पर नियुक्ति के नये नियम लाकर प्रोफेसर ऑफ़ प्रेक्टिस के माध्यम से प्रोफेसर न लगाए जाएँ। इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को सभी विश्वविद्यालयों के लिए सर्कुलर जारी करना चाहिए ताकि आरक्षित पदों पर अनारक्षित श्रेणी के लिए प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के द्वारा नियुक्ति न की जाए इससे आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों के पदों का नुकसान होता है।
टीचर्स एसोसिएशन के चेयरमैन डॉ. हंसराज सुमन ने बताया है कि हाल ही में लखनऊ विश्वविद्यालय (उत्तर प्रदेश) ने अपने यहाँ 13 विभिन्न विभागों जैसे- इंजीनियरिंग साइंस, टेक्नोलॉजी, इन्टरप्रोनशिप, कॉमर्स, सोशल साइंस, मीडिया, लिटरेचर, फाइन आर्ट्स, आर्म्ड फॉरसिस, लीगल प्रोफेशन, कम्यूनिटी डेवलपमेंट, रूरल डेवलपमेंट, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन आदि विभागों में पदों को भरने के लिए विज्ञापन निकाला गया है। विभागों के द्वारा प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के माध्यम से कितने पदों पर नियुक्ति की जानी है यह भी नहीं दर्शाया है । इन पदों को भरने की अंतिम तिथि 9 दिसम्बर 2024 है। विश्वविद्यालय के अनुसार इन पदों को भरने के लिए एकेडमिक काउंसिल की 31 जुलाई 2024 को हुई मीटिंग में निर्णय लेने के बाद 9 अगस्त 2024 को इसे कार्यकारी परिषद (ईसी) में अनुमोदित किया। उसके बाद ही प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के इन पदों को विज्ञापन के माध्यम से निकाला गया है। इन पदों की सम्पूर्ण जानकारी लखनऊ विश्वविद्यालय की वेबसाइट- Rac.lkouniv@gmail.com पर तय प्रारूप में आवेदन कर सकते हैं। विज्ञापन के अनुसार इन पदों पर पार्ट टाइम व फुल टाइम नियुक्ति की जाएगी। पहले एक साल के लिए नियुक्ति दी जाएगी, उसके बाद यह अवधि बढ़ाई जा सकती है, अधिक से अधिक तीन साल तक इसे बढ़ाने का नियम बनाया गया है उसके बाद आवश्यकतानुसार इसे पुनः एक साल और बढ़ाया जा सकता है।
टीचर्स एसोसिएशन के चेयरमैन डॉ.हंसराज सुमन ने बताया है कि पिछले दिनों कुछ विश्वविद्यालयों में यूजीसी की एक योजना के तहत प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के द्वारा प्रोफेसरों की नियुक्ति की गई है। जबकि वे पद आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों के थे । प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के नियम में किसी भी तरह की शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं रखी गई है बल्कि उसके कार्य क्षेत्र की विशेषज्ञता के आधार पर चयन का नियम बनाया गया है। बता दें कि जिन विश्वविद्यालयों के विभागों में प्रोफेसर के पद एससी /एसटी व ओबीसी के बन रहे हैं उन्हीं पदों पर वहाँ के विश्वविद्यालय प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के तहत प्रोफेसरों की नियुक्ति कर रहे है। इन विश्वविद्यालयों में भारत सरकार की आरक्षण नीति की सरेआम अवहेलना की जा रही है। उनका कहना है कि यदि प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस की योजना को विश्वविद्यालयों में लागू करना है तो सबसे पहले प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के लिए रोस्टर तैयार किया जाना चाहिए। क्योंकि पिछले दो दशकों से एससी/एसटी व ओबीसी के शिक्षकों का शॉर्टफाल व बैकलॉग पदों को नहीं भरा गया है। अब उनके रिक्त पदों को भरने के लिए जब विज्ञापन दिए जा रहे हैं तो उन पर विश्वविद्यालय प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के नये नियम के तहत प्रोफेसर लगा रही है। यह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की 2006 की रोस्टर और आरक्षण संबंधी गाइडलाइंस के बिलकुल विरुद्ध है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( यूजीसी ) ने अपनी गाइडलाइन –2006 के तहत ही विश्वविद्यालयों / शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसर के पदों पर आरक्षण दिया था। लेकिन अब इन पदों को प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के द्वारा भरा जाएगा तो इन वर्गों का आरक्षण कैसे पूरा होगा ?
उन्होंने यूजीसी चेयरमैन से यह मांग की है कि वह सभी केंद्रीय, राज्य व मानद विश्वविद्यालयों के कुलपति / कुलसचिव को एक सर्कुलर जारी करे कि जब भी प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के तहत पदों का विज्ञापन निकालें, वह एससी /एसटी व ओबीसी कोटे के आरक्षण से अलग हो। यदि विश्वविद्यालयों को प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के पदों को निकालना है तो उसमें सभी वर्गों एससी/एसटी, ओबीसी व विकलांग कोटे के उम्मीदवारों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाए। साथ ही नियुक्ति करते समय शिक्षकों के रोस्टर का पालन किया जाए जिससे किसी भी वर्ग के अभ्यर्थियों को पदों की हानि न हो ।




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