
जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में पीएचडी प्रवेश में मुस्लिम छात्रों के लिए 50% आरक्षण को लेकर विवाद गहरा गया है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस मामले पर सरकार पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार मुस्लिम उच्च शिक्षा के अवसरों को कमजोर कर रही है।
ओवैसी का आरोप
ओवैसी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने एक अल्पसंख्यक संस्थान के तौर पर पीएचडी में 50% सीटें मुस्लिम छात्रों के लिए आरक्षित रखी थीं। लेकिन अब सरकार ने इस नियम का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम उच्च शिक्षा पहले ही संकट का सामना कर रही है, और 2020-21 में लगभग 1.8 लाख मुस्लिम छात्रों की संख्या में गिरावट आई थी। ओवैसी ने मौलाना आज़ाद फ़ेलोशिप का जिक्र करते हुए यह भी आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने इसे खत्म कर दिया, जिससे मुस्लिम छात्रों को शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से पिछड़ेपन का सामना करना पड़ रहा है।
आरक्षण नीति में बदलाव और असर
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आरक्षण नीति के तहत 30% सीटें मुस्लिम छात्रों के लिए, 10% मुस्लिम महिलाओं के लिए, और 10% मुस्लिम ओबीसी और एसटी के लिए आरक्षित थीं। हालांकि, कई विभाग इस आरक्षण नीति को ठीक से लागू नहीं कर पाए। रिपोर्ट्स के अनुसार, एजेके मास कम्युनिकेशन एंड रिसर्च सेंटर में मुस्लिम उम्मीदवारों की मौजूदगी के बावजूद चार में से सिर्फ एक सीट मुस्लिम छात्रों को दी गई। इसी तरह, कल्चर, मीडिया और प्रशासन केंद्र में सात में से केवल एक सीट, इतिहास विभाग में 12 में से दो और मनोविज्ञान विभाग में 10 में से दो सीटें ही मुस्लिम छात्रों को दी गईं।
कब हुआ बदलाव?
इस बदलाव की शुरुआत अक्टूबर 2024 से हुई जब नए वाइस चांसलर मज़हर आसिफ ने एक ऑर्डिनेंस में मामूली बदलाव किया। यह बदलाव तब तक किसी की नजर में नहीं आया जब तक कि पीएचडी प्रवेश में इसका असर नहीं दिखने लगा।
यह विवाद अब शिक्षा क्षेत्र में एक नई बहस का कारण बन चुका है, जिसमें मुस्लिम छात्रों के लिए आरक्षण नीति के भविष्य को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।




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