
संसदीय स्थायी समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि वर्तमान में शिक्षा के लिए दी जाने वाली सरकारी छात्रवृत्तियां आज के खर्चों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त हैं। समिति ने सिफारिश की है कि इन छात्रवृत्तियों की राशि की नियमित समीक्षा की जाए ताकि महंगाई के अनुरूप आवश्यक सुधार किए जा सकें।
छात्रवृत्तियों की राशि में वृद्धि की जरूरत
समिति ने अपनी रिपोर्ट “2025-26 के लिए ग्रांट्स की मांग” को सोमवार को संसद में प्रस्तुत किया। रिपोर्ट में कहा गया है, “छात्रों को दी जाने वाली वार्षिक छात्रवृत्ति राशि वर्तमान खर्चों के मुकाबले अपर्याप्त है।” समिति ने शिक्षा मंत्रालय और अन्य संबंधित संस्थाओं के साथ मिलकर छात्रवृत्ति योजनाओं की समीक्षा करने की सिफारिश की ताकि इनका लाभ अधिकतम छात्रों तक पहुंच सके।
रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि कई कल्याणकारी योजनाओं के लिए बजट आवंटन और वास्तविक खर्च के बीच असमानता बनी हुई है। 2025-26 के लिए ₹14,164.42 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया था, लेकिन कई योजनाओं को पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं मिली, जिससे उनकी पहुंच और प्रभाव सीमित हो गया।
बड़ी राशि अव्ययित पड़ी, फंड के उपयोग में अनियमितता
समिति ने यह भी पाया कि कई योजनाओं के लिए धन का उपयोग उचित तरीके से नहीं किया जा रहा है। फरवरी 2025 तक सिंगल नोडल एजेंसी (SNA) खातों में ₹2,779.32 करोड़ की राशि अव्ययित पड़ी थी, जबकि पिछले वर्ष यह राशि ₹5,055.93 करोड़ थी।
राज्य सरकारों द्वारा प्रस्तावों और उपयोग प्रमाणपत्रों में देरी के कारण यह समस्या बनी हुई है। समिति ने मंत्रालय से आग्रह किया है कि वह राज्य सरकारों के साथ समन्वय स्थापित कर इस प्रक्रिया में तेजी लाए ताकि छात्रवृत्तियों और अन्य योजनाओं का लाभ छात्रों को समय पर मिल सके।
निगरानी तंत्र मजबूत करने की जरूरत
रिपोर्ट में मंत्रालय और कार्यान्वयन एजेंसियों के बीच पारदर्शिता और समन्वय की कमी पर भी चिंता जताई गई है। समिति का मानना है कि राज्य सरकारों पर निर्भरता के कारण योजनाओं के कार्यान्वयन में असंगतता और देरी हो रही है।
समिति ने सिफारिश की है कि एक मजबूत निगरानी तंत्र बनाया जाए, जिससे फंड वितरण और योजनाओं की प्रगति की प्रभावी निगरानी हो सके। डेटा संग्रहण प्रक्रिया में सुधार किया जाए और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए। समर्पित परियोजना निगरानी इकाइयां स्थापित की जाएं, जिससे केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय हो और योजनाओं के कार्यान्वयन में आने वाली समस्याओं का त्वरित समाधान किया जा सके।
कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ाने की सिफारिश
समिति ने पाया कि 2022-23 में सामाजिक न्याय मंत्रालय ने ₹6,410.09 करोड़ और 2023-24 में ₹7,830.26 करोड़ खर्च किए, लेकिन कई योजनाओं में धन का उचित उपयोग नहीं हुआ।
इसके अलावा, समिति ने प्रधानमंत्री आवास योजना (PM-AJAY), SHRESHTA, NAMASTE और PM-VISVAS जैसी प्रमुख योजनाओं के दिशा-निर्देशों में बार-बार किए जा रहे बदलावों की भी आलोचना की। समिति ने मंत्रालय से आग्रह किया है कि किसी भी नीति में बदलाव से पहले सभी हितधारकों से परामर्श लिया जाए।
वेंचर कैपिटल फंड (VCF) बंद करने के फैसले पर आपत्ति
रिपोर्ट में अनुसूचित जातियों (SCs) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) के लिए उद्यमिता को बढ़ावा देने वाली योजना वेंचर कैपिटल फंड (VCF) को 31 मार्च तक समाप्त करने के फैसले पर भी आपत्ति जताई गई। समिति ने भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) के अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि इस योजना को जारी रखा जाना चाहिए, क्योंकि यह पहली पीढ़ी के उद्यमियों के लिए महत्वपूर्ण है।
समिति की प्रमुख सिफारिशें
1. छात्रवृत्तियों की राशि की नियमित समीक्षा कर महंगाई के अनुरूप वृद्धि की जाए।
2. बजट आवंटन और वास्तविक खर्च के बीच असमानता को दूर किया जाए।
3. फंड वितरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
4. राज्य सरकारों के साथ समन्वय बढ़ाकर अव्ययित राशि का उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
5. वेंचर कैपिटल फंड (VCF) जैसी योजनाओं को बंद करने के बजाय जारी रखा जाए।
रिपोर्ट में सरकार को सुझाव दिया गया है कि छात्रवृत्ति योजनाओं और अन्य कल्याणकारी कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में तेजी लाई जाए, ताकि इनके लाभार्थियों को समय पर और प्रभावी तरीके से सहायता मिल सके।




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