
दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध विभागों व कॉलेजों के प्रिंसिपलों को सर्कुलर जारी कर निर्देश व अनुरोध किया गया है कि वे ऐसे अभ्यर्थियों की पूर्ण जानकारी दें जहाँ पिछले पाँच वर्षों में जिन विषयों में सहायक प्रोफेसरों की स्थायी नियुक्तियों के समय एससी/एसटी, ओबीसी, अनरिजर्व, ईडब्ल्यूएस व पीडब्ल्यूडी श्रेणी के अभ्यर्थियों को उनके पदों पर चयन समिति द्वारा नॉट फाउंड सूटेबल ( NFS ) किया गया है। बता दें कि फोरम व एससी/एसटी शिक्षक संगठनों ने कुलपति को शिकायत की थी कि दिल्ली विश्वविद्यालय में चल रही सहायक प्रोफेसर के पदों पर स्थायी नियुक्तियों में एससी/एसटी व ओबीसी कोटे के अभ्यर्थियों को काफी संख्या में नॉट फाउंड सूटेबल किया गया है। कुलपति ने तुरंत संज्ञान लेते हुए कॉलेजों से इस संदर्भ में जानकारी मांगी है कि एससी/एसटी, ओबीसी, अनरिजर्व, ईडब्ल्यूएस व पीडब्ल्यूडी के कितने अभ्यर्थियों को नॉट फाउंड सूटेबल किया गया।
फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस के चेयरमैन डॉ.हंसराज सुमन ने बताया है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को शिकायत की गई थी दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध विभागों व कॉलेजों में सहायक प्रोफेसर की नियुक्तियों में एससी/एसटी / ओबीसी व पीडब्ल्यूडी के अभ्यर्थियों को नॉट फाउंड सूटेबल किया जा रहा है । कुलपति द्वारा तुरंत संज्ञान लेते हुए कॉलेजों को सर्कुलर जारी कर यह निर्देश व अनुरोध किया गया तथा इसकी सम्पूर्ण जानकारी मांगी गई है कि पिछले पाँच वर्षों में कॉलेज द्वारा कितने पदों को भरा गया है , कितने पदों पर एससी /एसटी /ओबीसी, पीडब्ल्यूडी, ईडब्ल्यूएस व अनरिजर्व के अभ्यर्थियों को नॉट फाउंड सूटेबल किया गया है। सर्कुलर में विशेष रूप से एससी/एसटी व ओबीसी के अभ्यर्थियों का अलग से आंकड़े मांगे गए हैं। डॉ. हंसराज सुमन के अनुसार डीयू में कॉलेजों की संख्या 79 है, इसमें 6 कॉलेज अपने को अल्पसंख्यक मानते हैं जहाँ केंद्र सरकार की आरक्षण नीति को स्वीकार नहीं करते । दिल्ली सरकार के अंतर्गत 12 कॉलेज आते हैं जो पूर्ण वित्त पोषित है इनमें पिछले दस वर्षों से शैक्षिक व गैर- शैक्षिकपदों पर नियुक्ति नहीं हुई है। उन्होंने बताया है कि यहाँ पर लगभग 600 शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति की जानी है, इनमें सबसे ज्यादा पद आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों के बनते हैं ।
उन्होंने बताया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के विभागों व कॉलेजों में पिछले दो साल से सहायक प्रोफेसरों की स्थायी नियुक्तियों की प्रक्रिया चल रही है। इस दौरान लगभग पाँच हजार पदों पर स्थायी नियुक्ति की गई है। बता दें कि नियुक्तियों से पूर्व कॉलेज प्रशासन ने इन पदों को भरने से पहले स्क्रीनिंग व स्कूटनी की प्रक्रिया को अपनाया था। जो अभ्यर्थी यूजीसी नियमानुसार पूर्ण योग्यता रखते थे, उन्हें ही साक्षात्कार में बुलाया गया। चयन समिति में सभी वर्गों के विषय विशेषज्ञों के अलावा एससी/एसटी/ओबीसी कोटे के ऑब्जर्वर को शामिल किया गया था, बावजूद इसके आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों को नॉट फाउंड सूटेबल किया गया।
डॉ. सुमन ने बताया है कि विभिन्न विभागों में सहायक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर के पदों पर लगभग 50 फीसदी एससी/एसटी, ओबीसी व पीडब्ल्यूडी के अभ्यर्थियों को नॉट फाउंड सूटेबल किया गया है। उनका कहना है कि एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर में काफी योग्यता रखने के साथ-साथ उनके पास वर्षो का लंबा शिक्षण अनुभव होने के बाद भी उन्हें नॉट फाउंड सूटेबल किया गया। डॉ.सुमन ने बताया है कि जिस चयन समिति ( सलेक्शन कमेटी ) में एससी /एसटी ऑब्जर्वर ने अपने अधिकार व पद का सही इस्तेमाल नहीं किया उन्हीं विभागों में एससी/एसटी , ओबीसी व पीडब्ल्यूडी के पदों पर नॉट फाउंड सूटेबल हुआ है । उनका कहना है कि चयन समिति में ऑब्जर्वर की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, अगर वह अपने पद का सही इस्तेमाल करते तो आरक्षित सीटों पर कदापि नॉट फाउंड सूटेबल नहीं हो सकता क्योंकि पूरे देशभर से आरक्षित श्रेणी के योग्य अभ्यर्थी साक्षात्कार में आ रहे हैं बावजूद उन्हें अयोग्य ठहराया जा रहा है?
डॉ.सुमन ने कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह से मांग की है कि जिन विभागों व कॉलेजों में एससी / एसटी व ओबीसी श्रेणी के अभ्यर्थियों को नॉट फाउंड सूटेबल किया गया है उनकी जांच कराने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन एक कमेटी गठित करें । कमेटी में दिल्ली विश्वविद्यालय के बाहर से सेवानिवृत्त प्रोफेसर ,यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय से एक-एक सदस्य के अलावा डीओपीटी/लायजन ऑफिसर हो । यह कमेटी यह भी जांच करे कि इन पदों पर कितने उम्मीदवार साक्षात्कार के समय उपस्थित हुए, कितने अनुपस्थित, चयन समिति की मिनट्स में किस आधार पर इन अभ्यर्थियों को नॉट फाउंड सूटेबल किया गया है। साथ ही क्या आरक्षित श्रेणी के ऑब्जर्वर ने अपना विरोध दर्ज मिनट्स में कराया है या नहीं ? इसकी जांच के बाद कमेटी सम्पूर्ण जानकारी मीडिया को दे ताकि पता चल सके कि आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों को ही नॉट फाउंड सूटेबल क्यों किया जाता है।




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