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कम उपस्थिति के कारण डीयू विधि संकाय के 300 छात्रों को परीक्षा से रोका, धरने पर बैठे एबीवीपी कार्यकर्ता

दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय में कम उपस्थिति के कारण करीब 300 छात्रों को आगामी सेमेस्टर परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया है। परीक्षा शुरू होने से महज तीन दिन पहले इस फैसले ने छात्रों में आक्रोश पैदा कर दिया है। छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हुए डूसू अध्यक्ष रौनक खत्री को कम उपस्थिति के बावजूद परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दे दी है, जबकि बाकी छात्रों को इससे वंचित रखा गया।

प्रदर्शन कर रहे छात्र, डीन के इस्तीफे की मांग
इस निर्णय के विरोध में छात्र पिछले दो दिनों से विधि संकाय के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने इस कार्रवाई को छात्र विरोधी करार देते हुए डीन से तत्काल इस्तीफा देने की मांग की है। छात्रों का कहना है कि जब परीक्षा में बैठने के लिए 75 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य है, तो रौनक खत्री को किस आधार पर छूट दी गई?

तीनों सेंटरों के छात्र प्रभावित
विवाद में संकाय के तीनों प्रमुख केंद्र – कैंपस लॉ सेंटर, लॉ सेंटर-1 और लॉ सेंटर-2 – से छात्र शामिल हैं। जानकारी के अनुसार, परीक्षा से रोके गए छात्रों की उपस्थिति 40 से 60 प्रतिशत के बीच है। इन छात्रों को परीक्षा फॉर्म भरने के बावजूद तीन दिन पहले सूचना दी गई कि वे परीक्षा में शामिल नहीं हो सकेंगे।

एबीवीपी का आरोप: पक्षपातपूर्ण फैसला
एबीवीपी दिल्ली प्रदेश मंत्री सार्थक शर्मा ने आरोप लगाया कि डूसू अध्यक्ष रौनक खत्री की अप्रैल तक की उपस्थिति केवल 47 प्रतिशत थी। इसके बावजूद डीन ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति दी, जबकि अन्य छात्रों को यह राहत नहीं दी गई। संगठन ने यह भी सवाल उठाया है कि जब अन्य छात्रों को उपस्थिति की कमी के आधार पर रोका गया तो खत्री को प्रवेश पत्र कैसे जारी हुआ?

छात्रों की दो टूक मांग
छात्रों की स्पष्ट मांग है – या तो सभी छात्रों को परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी जाए या फिर डीन इस्तीफा दें। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया, तो वे आंदोलन और तेज करेंगे।

प्रशासन की चुप्पी
वहीं, विधि संकाय प्रशासन की ओर से अभी तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। छात्रों और संगठन की ओर से लगातार डीन से स्पष्टीकरण की मांग की जा रही है, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन मौन बना हुआ है।

इस मामले ने न केवल विश्वविद्यालय की परीक्षा प्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दर्शाया है कि कैसे एक समान नियम सब पर लागू न होने से छात्रों में असंतोष और अविश्वास गहराता है। आने वाले दिनों में यह विवाद और भी तूल पकड़ सकता है।

Asmita Sarkar

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