
दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के अंडरग्रेजुएट एडमिशन फॉर्म 2025-26 को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। डीयू टीचर्स एसोसिएशन (DUTA), एकेडमिक काउंसिल और एग्जीक्यूटिव काउंसिल के कई सदस्यों ने फॉर्म में दर्शाए गए “सांप्रदायिक और जातिवादी पूर्वाग्रहों” पर कड़ी आपत्ति जताई है। शिक्षकों का कहना है कि फॉर्म के ‘मातृभाषा’ विकल्प में ‘मुस्लिम’ को एक भाषा के रूप में दर्शाया गया है, जबकि संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त भाषा ‘उर्दू’ को सूची से बाहर रखा गया है। इसके साथ ही ‘बिहारी’ को एक भाषा के रूप में दिखाया जाना क्षेत्रीय पूर्वाग्रह को उजागर करता है।
विवाद का एक और पहलू जातिसूचक शब्दों का प्रयोग भी है। फॉर्म में ‘मोची’ और ‘चमारी’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर शिक्षकों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (DTF) के बैनर तले कई प्रोफेसरों ने डीयू के कुलपति योगेश सिंह को पत्र लिखते हुए कहा कि ‘मुस्लिम’ को मातृभाषा के तौर पर दिखाना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि यह एक खास समुदाय को सीमित और कलंकित करने की कोशिश है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे ‘उर्दू’ को एक धर्म विशेष से जोड़ने की गलत धारणाएं फैल सकती हैं।
इसके अलावा, शिक्षकों ने एडमिशन फॉर्म में उपजाति (सब-कास्ट) से जुड़ी जानकारियां मांगे जाने को अनावश्यक और संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन की श्रेणी में बताया है।
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए डीयू ने अपने आधिकारिक एक्स (पूर्व ट्विटर) हैंडल से स्पष्टीकरण जारी किया है। विश्वविद्यालय ने लिखा, “डीयू एडमिशन फॉर्म में हुई अनजानी त्रुटि के लिए हम खेद प्रकट करते हैं। यह पूरी तरह से अनजाने में हुई गलती थी और इसका कोई गलत उद्देश्य नहीं था। कृपया विश्वविद्यालय के समावेशी और सौहार्दपूर्ण वातावरण को दूषित न करें।”
हालांकि, शिक्षकों ने विश्वविद्यालय के इस स्पष्टीकरण को खारिज करते हुए कहा कि यह केवल एक ‘क्लेरिकल मिस्टेक’ नहीं हो सकती। उन्होंने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जाए, जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई हो और विश्वविद्यालय सार्वजनिक रूप से माफी मांगे।




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