
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने किशोरों द्वारा विवाह करने और फिर कोर्ट से सुरक्षा की मांग करने के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता जताई है। कोर्ट ने इसे एक “चिंताजनक प्रवृत्ति” बताया है, जो गंभीर परिणामों से भरी हुई है, जिनमें पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत संभावित आरोप भी शामिल हैं।
इस मामले में कोर्ट ने पहले ही उत्तराखंड के बाल अधिकार कल्याण सचिव, चंद्रेश यादव को तलब किया था, जो गुरुवार, 3 जुलाई को अदालत के समक्ष पेश हुए।
सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने सचिव चंद्रेश कुमार को निर्देश दिया कि वे दो सप्ताह के भीतर एक समग्र योजना तैयार करें और पेश करें, जिसका उद्देश्य पॉक्सो एक्ट की गंभीरता को लेकर जनजागरूकता फैलाना और कम उम्र में हो रहे विवाहों की समस्या को संबोधित करना है।
नैनीताल हाईकोर्ट की खंडपीठ—जिसमें मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा शामिल हैं—ने एक ऐसे ही मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “यह प्रवृत्ति चिंताजनक है और इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।”
मामला एक 19 वर्षीय युवक से जुड़ा था, जिसने अपनी उम्र की एक लड़की से विवाह किया और फिर लड़की के परिवार से सुरक्षा के लिए अदालत की शरण ली।
कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है, जिसमें याचिकाकर्ता अक्सर किशोर होते हैं। अदालत ने यह स्वीकार किया कि जीवनसाथी चुनने का अधिकार प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन यह भी कहा कि कम उम्र में विवाह करने से किशोरों में जिम्मेदारी का भाव विकसित नहीं हो पाता।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कई मामलों में ऐसे विवाह गंभीर परिणामों का कारण बनते हैं। इसमें उन उदाहरणों का उल्लेख किया गया, जहां विवाह के बाद लड़की के माता-पिता उसे नाबालिग बताकर युवक पर पॉक्सो के तहत मामला दर्ज करवा देते हैं, जिससे युवक को कड़ी सजा होती है और लड़की अकेली और असहाय रह जाती है।
कोर्ट ने टिप्पणी की, “कई मामलों में लड़की विवाह के बाद मां बन जाती है, लेकिन फिर उसके पति को पॉक्सो के तहत जेल भेज दिया जाता है या दोनों के बीच परिपक्वता के बाद अलगाव हो जाता है, जिससे बच्चा बेसहारा हो जाता है। ऐसे हालात अन्य अपराधों को भी बढ़ावा देते हैं।”
इस चिंताजनक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए कोर्ट ने शिक्षा सचिव चंद्रेश कुमार को विशेष रूप से निर्देश दिया कि वे दो सप्ताह के भीतर एक ऐसी योजना तैयार करें, जिससे माता-पिता सहित आमजन को पॉक्सो कानून की गंभीरता के बारे में संवेदनशील किया जा सके और वे अपने बच्चों को सही दिशा दे सकें।
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि ये जागरूकता अभियान शिक्षा विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, आंगनवाड़ी केंद्रों, स्थानीय प्रशासन और पैरा-लीगल स्वयंसेवकों के माध्यम से जमीनी स्तर पर लागू किए जाएं।
इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि नाटकों और लघु फिल्मों जैसे रचनात्मक तरीकों से युवाओं को प्रभावी रूप से संवेदनशील बनाया जाए।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तब होगी जब यह प्रस्तावित योजना पेश की जाएगी।




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