
केरल विश्वविद्यालय परिसर सोमवार को उस वक्त तनावपूर्ण और घटनापूर्ण बन गया, जब निलंबन रद्द होने के बाद रजिस्ट्रार के. एस. अनिल कुमार ने दोबारा कार्यभार संभाल लिया। विश्वविद्यालय सिंडिकेट ने उनका निलंबन रविवार को रद्द किया था, जबकि कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल ने 2 जुलाई को उन्हें निलंबित किया था। यह कार्रवाई उस कार्यक्रम से जुड़ी थी जिसमें राज्यपाल आर. वी. अर्लेकर ने भाग लिया था और कार्यक्रम स्थल पर ‘भारत माता’ की भगवा ध्वज वाली तस्वीर लगाई गई थी।
अनिल कुमार ने कुलपति के निलंबन आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन सिंडिकेट के फैसले के बाद उन्होंने याचिका वापस ले ली और प्रशासनिक पदभार फिर से ग्रहण कर लिया। हालांकि, इस बीच कुलपति द्वारा नियुक्त किए गए नए रजिस्ट्रार पहले से ही दफ्तर में मौजूद थे।
नियुक्ति पर टकराव: सिंडिकेट बनाम कुलपति
एलडीएफ समर्थित सिंडिकेट सदस्य शिजू खान ने कहा कि विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत रजिस्ट्रार की नियुक्ति और निलंबन का अधिकार केवल सिंडिकेट को है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुलपति ने नियमों का उल्लंघन किया और रजिस्ट्रार को अपनी बात रखने का अवसर भी नहीं दिया। शिजू खान ने साफ कहा कि राज्यपाल को रजिस्ट्रार के खिलाफ कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि यह अधिकार अधीनस्थ अधिकारियों तक ही सीमित है।
अंतरिम कुलपति ने किया फैसले से इनकार
कुलपति के विदेश दौरे के चलते कार्यभार संभाल रहीं अंतरिम कुलपति सिजा थॉमस ने सिंडिकेट की बैठक का बहिष्कार करते हुए उसके फैसले को मानने से इनकार कर दिया। इसके चलते विश्वविद्यालय प्रशासन में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई।
राजनीतिक संग्राम और छात्र संगठनों का विरोध
विश्वविद्यालय परिसर में CPI(M) की छात्र इकाई एसएफआई और युवा संगठन डीवाईएफआई ने राज्यपाल और कुलपति के खिलाफ बैनर-पोस्टर लगाए। इनमें कुलपति को आरएसएस की वेशभूषा में दिखाया गया।
विपक्ष का हमला: शिक्षा को बना दिया राजनीतिक अखाड़ा
विधानसभा में विपक्ष के नेता वी. डी. सतीशन ने राज्य सरकार पर केरल की उच्च शिक्षा व्यवस्था को “राजनीतिक युद्धभूमि” में बदलने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार और राजभवन के बीच टकराव के कारण विश्वविद्यालयों में अस्थिरता बढ़ रही है। सतीशन ने चेतावनी दी कि शिक्षा की गिरती गुणवत्ता के चलते छात्र राज्य छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
उन्होंने दोनों पक्षों से अपील की कि वे शिक्षा को राजनीति से दूर रखें, वरना इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा।




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