
नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन पर 7वां अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (ICSE) समय की मांग के अनुरूप था। जब पूरी दुनिया जलवायु संकट की घड़ी के खिलाफ संघर्ष कर रही है और युवा अर्थपूर्ण नौकरियों की तलाश में हैं, तब सम्मेलन का विषय — “ग्रीन जॉब्स के लिए सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन” — एक सटीक और आवश्यक पहल के रूप में सामने आया।
मोबियस फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रदीप बर्मन ने कहा, “हमें शिक्षा को नौकरियों से जोड़ने की आवश्यकता है ताकि हमारी प्रगति विश्व के साथ कदम मिलाकर हो सके। वास्तव में, आज भी शिक्षा ही प्रगति को तेज़ करने का सबसे बड़ा साधन है।”
भारत में ग्रीन जॉब सेक्टर की वर्तमान स्थिति
भारत का हरित रोजगार क्षेत्र अभी भी बिखरा हुआ और सीमित दायरे में है। सौर ऊर्जा, ग्रीन बिल्डिंग, ईको-कृषि, कचरा प्रबंधन और सर्कुलर इकॉनमी जैसे क्षेत्रों में नौकरियों की मांग तो बढ़ रही है, लेकिन प्रशिक्षित मानव संसाधन की आपूर्ति बहुत पीछे है। स्कूलों और कॉलेजों में छात्रों को इन क्षेत्रों के करियर विकल्पों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी जाती, और व्यावसायिक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम अभी प्रारंभिक अवस्था में हैं, जिनकी पहुँच सीमित है।
ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हरित जागरूकता और कौशल अवसंरचना का भी अभाव है। हालांकि हाल के वर्षों में नीति-स्तर पर सकारात्मक पहलें बढ़ी हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नीति आयोग, और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय ने शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणालियों में सस्टेनेबिलिटी को शामिल करने के कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने पर्यावरण साक्षरता, अनुभवात्मक शिक्षा और व्यावसायिक तैयारी को प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा है, लेकिन इसका कार्यान्वयन अभी भी असमान है।
निजी और गैर-सरकारी प्रयास
सरकारी प्रयासों के साथ-साथ, निजी और गैर-सरकारी संगठनों ने भी इस दिशा में प्रयास किए हैं। मोबियस फाउंडेशन जैसी संस्थाओं ने शिक्षा को वास्तविक सस्टेनेबिलिटी चुनौतियों — विशेषकर गरीब समुदायों में — से जोड़ने वाले कार्यक्रम शुरू किए हैं। हालांकि ये पहलें अभी भी उस व्यापक पैमाने तक नहीं पहुँची हैं, जिसकी भारत को अपने रोजगार और जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यकता है।
हरित शिक्षा: आर्थिक मजबूती की आधारशिला
यह स्पष्ट है कि सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन अब केवल अतिरिक्त पहल नहीं रह सकती — इसे आर्थिक स्थिरता की मुख्य आधारशिला बनना होगा। यदि युवाओं को हरित नौकरियों के लिए व्यवस्थित रूप से तैयार नहीं किया गया, तो भारत न केवल जलवायु मोर्चे पर पिछड़ेगा बल्कि सम्मानजनक रोजगार के अवसर भी खो देगा।
जलवायु परिवर्तन और ऑटोमेशन के कारण पारंपरिक नौकरियों पर संकट बढ़ रहा है, वहीं हरित अर्थव्यवस्था नए रोजगार सृजन की क्षमता रखती है — यदि इसे सही दिशा में प्रबंधित किया जाए। भारत में ग्रीन जॉब्स के विकास के लिए तीन बड़े बदलाव आवश्यक हैं:
शिक्षा और बाज़ार का संगम:
स्कूलों, कॉलेजों और कौशल केंद्रों के पाठ्यक्रमों में हरित तकनीक, सतत विकास के तरीके और उद्यमिता कौशल को शामिल करना होगा।
समावेशिता:
युवाओं, महिलाओं और वंचित समूहों को सामुदायिक प्रशिक्षण, आउटरीच कार्यक्रमों और छात्रवृत्तियों के माध्यम से इस बदलाव का हिस्सा बनाना होगा।
उद्योग-शिक्षा सहयोग:
उद्योगों को शिक्षा संस्थानों के साथ साझेदारी कर ऐसे पेशेवरों और नवाचारकों की स्थायी श्रृंखला तैयार करनी होगी जो हरित अर्थव्यवस्था को गति दे सकें।
जागरूकता से कार्रवाई तक
ICSE जैसे उत्सव इस बात का संकेत हैं कि समाज में हरित शिक्षा की ज़रूरत को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। लेकिन केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं — अब इसे ठोस बदलाव में बदलना होगा। भारत को केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में ही नहीं, बल्कि ग्रीन इकोनॉमी के लिए तैयार कुशल जनशक्ति के निर्माण में भी विश्व का नेतृत्व करना चाहिए।
जैसे-जैसे जलवायु की घड़ी टिक-टिक कर रही है, कार्रवाई का समय अब है। “ग्रीन जॉब्स” केवल नीतिगत नारा नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की वास्तविकता बनना चाहिए —
कक्षाओं में पढ़ते छात्रों के लिए, प्रशिक्षण ले रहे युवाओं के लिए, और सतत विकास का सपना देखने वाले समुदायों के लिए।
सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन को अब सम्मेलनों और रिपोर्टों से निकलकर ज़मीनी स्तर पर एक जनआंदोलन बनना होगा।




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