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डिजिटल दुनिया बदल रही बच्चों का दिमाग, सोचने के बजाय अब खोजने पर जोर 

कभी बच्चों की उंगलियों में चाक और पेंसिल की पकड़ होती थी। कागज़ पर उतरती उनकी लिखावट सिर्फ अक्षर नहीं बनाती थी — वह कल्पनाओं को आकार देती थी, सोच को दिशा देती थी। लेकिन अब वही उंगलियां स्क्रीन पर स्क्रॉल करती हैं, सोचने से पहले सर्च करती हैं, और लिखने की जगह टाइप करने लगी हैं। सवाल उठता है — क्या डिजिटल दुनिया बच्चों का दिमाग तेज बना रही है या उन्हें पूर्वनिर्मित बुद्धि (Pre-fabricated Intelligence) का उपभोक्ता बना रही है?

 

लिखावट और सोच का रिश्ता कमज़ोर पड़ा

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और आईआईटी दिल्ली के एक संयुक्त अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि बीते दस वर्षों में बच्चों के ‘हैंडराइटिंग-टू-थिंकिंग लिंक’ में लगभग 40% की कमी आई है। यह वही जैविक संबंध है जिसके तहत हाथ से लिखना मस्तिष्क के फ्रंटल कॉर्टेक्स और हिप्पोकैम्पस को सक्रिय करता है — वही हिस्से जो स्मृति, रचनात्मकता और तर्कशक्ति के लिए जिम्मेदार होते हैं।

 

आईआईटी दिल्ली की न्यूरोकॉग्निटिव साइंस विभाग की प्रोफेसर डॉ. मीरा वशिष्ठ कहती हैं — “लिखना केवल भाषा का नहीं, एक शारीरिक अनुभव का हिस्सा है। जब बच्चा अपने हाथ से अक्षर बनाता है, तो वह विचार से जुड़ता है। लेकिन जब वही शब्द टाइप किया जाता है, तो दिमाग उसे एक इनपुट कमांड समझता है, विचार नहीं।”

 

पढ़ने की गहराई घट गई

फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी में प्रकाशित एक रिपोर्ट ‘The Vanishing Library Mind’ के अनुसार, 12 से 18 वर्ष के छात्रों में डीप रीडिंग का औसत समय 72% घट गया है।

पहले जहां एक छात्र किसी विषय पर औसतन 27 मिनट एकाग्र रहता था, अब यह घटकर सिर्फ 4.5 मिनट रह गया है।

 

शोधकर्ताओं का मानना है कि इंटरनेट ने जानकारी तक पहुंच तो आसान कर दी है, पर विचार की गहराई घटा दी है। बच्चे अब तथ्यों को समझने या याद रखने के बजाय सिर्फ “खोजने” पर निर्भर हो गए हैं— ज्ञान अब अनुभव नहीं, सुविधा बन गया है।

 

व्यवहारिक जीवन पर असर

ऑक्सफोर्ड के न्यूरोसाइंटिस्ट प्रो. मार्क हेस्किन्स के अनुसार, बच्चों की सचेत सोचने की क्षमता (Conscious Thinking Capacity) में गिरावट का मतलब सिर्फ अकादमिक कमजोरी नहीं, बल्कि व्यावहारिक जीवन कौशलों का ह्रास भी है।

वे कहते हैं — “जब मस्तिष्क लगातार गूगल या एआई जैसे बाहरी स्रोतों पर निर्भर होने लगता है, तो वह समस्याओं को ‘महसूस’ करने की बजाय बस ‘सॉल्व करने का कमांड’ ढूंढता है। इससे आत्मनिर्णय, सहानुभूति और धैर्य जैसे गुण कमजोर पड़ने लगते हैं।”

 

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की 2024 रिपोर्ट ‘The Cognitive Costs of Digital Dependence’ के मुताबिक, 13–18 वर्ष के छात्रों में समस्या समाधान (Problem Solving) और भावनात्मक नियंत्रण (Emotional Regulation) की क्षमता में 28% की गिरावट आई है।

 

डॉ. रश्मि नायर (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज) कहती हैं— “डिजिटल माध्यम ने बच्चों को अधिक सूचित बनाया है, लेकिन कम अनुभवी। वे सब जानते हैं, पर जीवन के छोटे फैसले — जैसे दोस्ती निभाना, असफलता झेलना या आत्मविश्वास से बोलना — अब उतने सहज नहीं रहे।”

 

डिजिटल निर्भरता ने बच्चों को ज्ञान की दृष्टि से तेज, पर व्यवहार की दृष्टि से अस्थिर बना दिया है। अब वे सोचने से पहले क्लिक करते हैं — और यही उनका स्वभाव बन गया है।

 

दिमाग को नहीं मिली नई दिशा

एमआईटी मीडिया लैब की हालिया रिपोर्ट ‘The Outsourced Brain’ बताती है कि चैटजीपीटी जैसे एआई प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले 14–22 वर्ष के युवाओं में प्राकृतिक तर्क क्षमता (Natural Reasoning Ability) में 22% की गिरावट देखी गई है। हालांकि, उनकी सिंथेटिक इंटेलिजेंस — यानी पहले से मौजूद जानकारियों को जोड़ने और प्रस्तुत करने की क्षमता — में बढ़ोतरी हुई है।

 

एमआईटी के न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जोनाथन बेल्स के शब्दों में — “हम एक नए प्रकार के दिमाग देख रहे हैं — ऐसा दिमाग जो जानता है कहां से खोजें, पर यह नहीं जानता कि क्यों सोचें।”

 

अगर कभी कोई बच्चा फिर से कागज़ पर अपना नाम लिखे, तो शायद वह सिर्फ नाम न लिखे — वह अपने भीतर की सोच, संवेदना और कल्पना से फिर जुड़ जाए। क्योंकि मशीनें हमें सोचने में मदद कर सकती हैं, पर सोचने का एहसास सिर्फ इंसान ही सीख सकता है।

 

एडइनबॉक्स टीम

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