
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में एक महिला अपने समर्पण और प्रयासों से समाज में बदलाव की मिसाल बन चुकी हैं। गरिमा सिंह नाम की यह महिला न केवल बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रही हैं, बल्कि उनके सर्वांगीण विकास की दिशा में भी काम कर रही हैं। उनका उद्देश्य सिर्फ किताबों का ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों को बेहतर इंसान बनाना है।
शिक्षा ही सेवा का माध्यम
वर्तमान में गरिमा सिंह लगभग 35 गरीब बच्चों को बिना किसी शुल्क के पढ़ा रही हैं। उनका कहना है, “शिक्षा हमारे जीवन का सबसे अहम हिस्सा है, और जब यह जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचाई जाती है, तो यह सबसे बड़ा पुण्य है।”
वे उन बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का काम कर रही हैं जो आर्थिक तंगी या सामाजिक कारणों से स्कूल नहीं जा पाते। पढ़ाई के साथ-साथ वे बच्चों को ड्राइंग, नृत्य, भाषण कला और स्वच्छता जैसे सामाजिक विषयों पर भी जागरूक करती हैं। गरिमा बच्चों को कॉपी, किताबें, पेंसिल और यहां तक कि खाने-पीने की वस्तुएं भी अपने खर्चे से उपलब्ध कराती हैं।
पार्क बना क्लासरूम
शहर की ऑफिसर्स कॉलोनी स्थित पार्क अब इन बच्चों के लिए एक खुला ‘शिक्षा मंदिर’ बन चुका है। यहीं गरिमा सिंह रोजाना बच्चों को पढ़ाती हैं और उन्हें जीवन के मूलभूत मूल्य सिखाती हैं। खुले आसमान के नीचे चलने वाली यह कक्षा सिर्फ पढ़ाई का स्थान नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन और जिम्मेदारी का पाठशाला बन चुकी है।
संघर्षों से मिली प्रेरणा
बातचीत में गरिमा ने बताया कि उनकी प्रेरणा उनके अपने छात्र जीवन से आई। गरिमा कहती हैं, “जब मैं पढ़ती थी, तब कई ऐसे बच्चे देखे जो आर्थिक कारणों से स्कूल नहीं जा पाते थे। तभी मैंने तय किया कि आगे चलकर मैं ऐसे बच्चों के लिए कुछ जरूर करूंगी।”
शुरुआत में उन्होंने कुछ बच्चों को अकेले पढ़ाना शुरू किया, लेकिन धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए और काम का दायरा बढ़ता गया। बाद में उन्होंने अपने इस अभियान को एक संगठित रूप देते हुए ‘ज्ञानोदय कल्याण फाउंडेशन’ नाम से एक एनजीओ पंजीकृत किया।
गरिमा कहती हैं, “जब मैं बच्चों के साथ होती हूं और उन्हें कुछ नया सिखाती हूं, तो मन को सुकून मिलता है। यही सुकून मुझे आगे बढ़ने की ताकत देता है।”
बच्चों के लिए आदर्श बनीं गरिमा
गरिमा सिंह की क्लास में पढ़ने वाले बच्चे उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। एक छात्र कृष्णा सिंह ने बताया, “मैं बड़ा होकर अपनी मैम की तरह गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देना चाहता हूं। मेरा सपना है कि मैं अध्यापक बनूं और उन बच्चों को पढ़ाऊं जो स्कूल नहीं जा पाते।”
वहीं छात्रा संध्या बताती है कि आधार कार्ड न होने के कारण उसे स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाया था, “गरिमा मैम ने मुझे पढ़ाई से जोड़े रखा। अब मेरा सपना है कि मैं देश की सेवा करूं।”
समाज के लिए प्रेरणा
गरिमा सिंह का यह प्रयास सिर्फ बच्चों को शिक्षा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का एक सशक्त माध्यम बन गया है। जब लोग अपनी व्यस्त जिंदगी में उलझे हैं, ऐसे समय में गरिमा जैसी महिलाएं हाशिए पर खड़े बच्चों को मुख्यधारा में लाने का कार्य कर रही हैं।
उनका यह संदेश हर किसी को सोचने पर मजबूर करता है— “अगर हम सब अपनी थोड़ी-सी ज़िम्मेदारी निभाएं, तो कई ज़िंदगियों को रोशन किया जा सकता है।”




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