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भारतीय छात्रों की विदेश शिक्षा पर खर्च में बड़ी गिरावट, 7 साल का न्यूनतम स्तर

भारतीय छात्रों द्वारा विदेश में उच्च शिक्षा के लिए भेजे जाने वालेे पैसे में इस वर्ष गहरी गिरावट दर्ज की गई है। Reserve Bank of India (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी-जून 2025 में “विदेश अध्ययन” श्रेणी में भेजी गई राशि लगभग 1.16 अरब डॉलर रही, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में लगभग 22 % कम है। यह सात वर्षों में इस प्रकार का न्यूनतम स्तर है। 

 

विश्लेषकों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे मुख्यतः दो कारण हैं — एक तो प्रमुख अध्ययन गंतव्यों (जैसे United States, Canada, United Kingdom और Australia) में वीजा-नियमों का सख्त होना, और दूसरा भारतीय घरेलू परिवारों द्वारा खर्च में अधिक सतर्कता अपनाना। 

 

विशेष रूप से, अगस्त 2025 में विदेश शिक्षा के लिए भेजी गई राशि लगभग 0.32 अरब डॉलर रही, जो अगस्त 2024 की तुलना में 24 % कम है — इस प्रकार यह अगस्त महीने में 2017 के बाद का सबसे कम आंकड़ा बन गया है। 

 

दूरगामी अर्थ यह है कि भारतीय विद्यार्थी अब पारंपरिक महंगे गंतव्यों के बजाय यूरोप, रूस, जर्मनी जैसे विकल्पों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं, जहाँ पढ़ाई-लागत अपेक्षाकृत कम है। 

 

प्रभाव और चुनौतियाँ:

– विदेश अध्ययन की योजना बनाने वाले छात्रों एवं उनके परिवारों को अब अधिक मूल्य-जागरूकता दिखानी पड़ रही है।

– शिक्षा ऋण-बाजार में दबाव बढ़ा है क्योंकि विदेश पढ़ाई का खर्च कम होने से लोन-उधार का प्रवाह भी प्रभावित हो रहा है। 

– घरेलू उच्च शिक्षा संस्थानों-और विदेश विकल्पों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है, जिससे नीति निर्माताओं के समक्ष नए विकल्प सुझाने की जरूरत सामने आएगी।

– महंगे गंतव्यों से पलायन के कारण उन देशों में भारत से आने वाले छात्रों की संख्या कम हो सकती है, जिसका दीर्घकालीन प्रभाव भी देखा जाना चाहिए।

विदेश में शिक्षा का आकर्षण कायम है, लेकिन खर्च की प्रवृत्ति में स्पष्ट बदलाव आ गया है। अब यह समय है कि छात्र-परिवार, एजेंट और नीति-निर्धारक इस बदलते परिदृश्य को समझें और अपनी रणनीति उसी अनुरूप बनाएं। इस प्रवृत्ति को एक संकेत के रूप में लिया जा सकता है कि कैसे वैश्विक और घरेलू कारक मिलकर विदेश अध्ययन की दिशा बदल रहे हैं।

 

 

 

Asmita Sarkar

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