
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) के सभी प्रावधान — जिनमें शुरुआती शिक्षा पूरी होने तक किसी विद्यार्थी को कक्षा में रोकने या फेल करने पर प्रतिबंध शामिल है — सभी निजी असहायताप्राप्त स्कूलों पर भी समान रूप से लागू होते हैं।
अदालत ने राजधानी लखनऊ के एक निजी स्कूल द्वारा दो विद्यार्थियों को “कम उपस्थिति और कमजोर प्रदर्शन” के आधार पर पिछली कक्षा में रोकने के फैसले को आरटीई अधिनियम का उल्लंघन बताते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही, स्कूल को दोनों विद्यार्थियों का फिर से दाखिला देने और री-एग्जाम कराने का आदेश दिया।
मामला क्या था
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने यह फैसला दो बच्चों की ओर से उनके पिता द्वारा दायर याचिका पर सुनाया। दोनों बच्चे लखनऊ के एक आईसीएसई बोर्ड से संबद्ध निजी स्कूल में कक्षा 6 और 9 में पढ़ रहे थे। याचिकाकर्ता का कहना था कि सत्र 2024–25 की परीक्षा में कम उपस्थिति और खराब प्रदर्शन का हवाला देकर स्कूल ने दोनों को अगली कक्षा में प्रमोट नहीं किया, जो आरटीई अधिनियम की धारा 16 का सीधा उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि धारा 16 के अनुसार किसी भी बच्चे को प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक न तो पिछली कक्षा में रोका जा सकता है और न ही स्कूल से निकाला जा सकता है। वहीं, स्कूल की ओर से तर्क दिया गया कि यह अधिनियम निजी असहायताप्राप्त स्कूलों पर लागू नहीं होता, इसलिए स्कूल का निर्णय वैध है।
कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने स्कूल की यह दलील अस्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि आरटीई अधिनियम की धारा 2(एन) में परिभाषित सभी स्कूल — जिनमें निजी असहायताप्राप्त स्कूल भी शामिल हैं — इस कानून के दायरे में आते हैं। इसलिए धारा 16 का “कक्षा में रोकने पर प्रतिबंध” इन स्कूलों पर भी बाध्यकारी है।
इन टिप्पणियों के साथ, उच्च न्यायालय ने दोनों छात्रों की याचिका स्वीकार करते हुए स्कूल का निर्णय रद्द कर दिया और विद्यार्थियों को दोबारा प्रवेश और परीक्षा का अवसर देने का आदेश पारित किया।




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